नागौर

नागौर में जनता के 69 लाख रुपए बर्बाद, अस्पताल का एसटीपी प्लांट बना कबाड़

एनआरएचएम की ओर से बनाया गया सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट चालू होने से पहले ही नकारा, जिला अस्पताल का गंदा पानी भर रहे गड्ढ़े में, लाखों रुपए की मशीनरी व ट्रीटमेंट प्लांट कबाड़, रखरखाव के अभाव में परियोजना पर उठे सवाल, जिम्मेदार विभाग मौन
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Jun 29, 2026
अस्पताल का एसटीपी प्लांट बना कबाड़
अस्पताल का एसटीपी प्लांट बना कबाड़

नागौर. सरकारी धन की बर्बादी और बेलगाम अधिकारियों की मनमानी का सबसे बड़ा उदाहरण नागौर के जेएलएन अस्पताल में देखने को मिलेगा। यहां 69 लाख रुपए की लागत से बनाया गया सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) पिछले दो वर्षों में बिना एक दिन संचालित हुए कबाड़ हो रहा है। प्लांट के चारों तरफ बबूल की ऊंची झाड़ियां उग चुकी हैं, मशीनों पर धूल और जंग की परत चढ़ गई है। मौके से कई उपकरण और मशीनें भी गायब होने की बात सामने आ रही है।

जिला मुख्यालय के पंडित जवाहरलाल नेहरू (जेएलएन) राजकीय चिकित्सालय में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) के तहत यह एसटीपी बनाया गया था, ताकि मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य (एमसीएच) अस्पताल से निकलने वाले दूषित पानी का वैज्ञानिक तरीके से शोधन कर उसका दोबारा उपयोग किया जा सके। उपचारित पानी से अस्पताल के बगीचों और हरित क्षेत्र की सिंचाई करने तथा अतिरिक्त पानी का उपयोग कर अस्पताल के लिए आय का नया स्रोत तैयार करने की योजना थी। दुर्गंध रोकने के लिए आधुनिक रासायनिक उपचार और ब्लीचिंग सिस्टम भी लगाया गया, लेकिन यह सारी योजना उद्घाटन से पहले ही दम तोड़ रही है।

विडंबना यह है कि जिस प्लांट को पर्यावरण संरक्षण और जल संरक्षण का मॉडल बताया गया था, वह आज खुद उपेक्षा का शिकार है। अस्पताल का गंदा सीवरेज पानी अब भी पुराने तरीके से गड्ढों में छोड़ा जा रहा है ।

यह मामला एनआरएचएम और चिकित्सा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। करोड़ों रुपए की योजनाएं स्वीकृत कर निर्माण तो करा दिया जाता है, लेकिन उनके संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी तय नहीं होने से सरकारी धन का अपव्य हो रहा है।

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की कार्यशैली पर भी सवालिया खड़े

गौरतलब है कि जब एसटीपी बनकर तैयार हुआ तो एमसीएच विंग का भवन कंडम घोषित हो गया, जिसके चलते उसे खाली कराया गया। ऐसे में जिम्मेदार अधिकारियों ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि एसटीपी में एमसीएच विंग का पानी नहीं आ रहा, लेकिन वे चाहते तो जेएलएन अस्पताल भवन से निकलने वाले गंदे पानी का शोधन इस एसटीपी में कर सकते थे, लेकिन जेएलएन के गंदे पानी को आज भी खुले गड्ढ़े में भरा जा रहा है। जबकि निर्माण से पहले प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अस्पताल को स्थाई रूप से लाइसेंस देने के लिए एसटीपी बनवाने के लिए कहा, जिस पर तत्कालीन पीएमओ ने प्रस्ताव बनाकर जयपुर मुख्यालय भेजा। पीएमओ के पत्र पर चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग से एसटीपी के लिए 72 लाख रुपए की स्वीकृति जारी कर टेंडर किए गए। लेकिन दो साल से गंदा पानी खुल में छोड़ने के बावजूद लेकिन बोर्ड के अधिकारी मौन धारण हैं।

सिस्टम से सवाल

आखिर 69 लाख रुपए खर्च करने के बाद भी प्लांट चालू क्यों नहीं हुआ? यदि परियोजना अधूरी थी तो भुगतान कैसे हुआ, और यदि पूरी थी तो संचालन क्यों नहीं हुआ? दो वर्षों तक किसी अधिकारी ने इसकी सुध क्यों नहीं ली? मशीनें गायब होने तक जिम्मेदारों की नींद क्यों नहीं खुली? क्या इस लापरवाही के लिए किसी अधिकारी की जवाबदेही तय होगी या फिर यह मामला भी एमसीएच विंग की बिल्डिंग की तरह सरकारी फाइलों में दफन होकर रह जाएगा?

पत्रिका व्यू... कब तक बर्बाद करते रहेंगे जनता का धन

यह मामला केवल एक बंद पड़े एसटीपी का नहीं, बल्कि सरकारी योजनाओं की निगरानी, जवाबदेही और जनता के पैसे के प्रति संवेदनहीनता का भी है। अब देखना यह होगा कि जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होती है या फिर 69 लाख रुपए का यह प्लांट सरकारी फाइलों में सफल और जमीन पर हमेशा की तरह असफल परियोजना बनकर रह जाएगा। लंबे समय से बंद पड़े रहने के कारण मशीनों की कार्यक्षमता प्रभावित होने की आशंका भी जताई जा रही है। अस्पताल का दूषित पानी आज भी बिना उपचार के गड्ढों में छोड़ा जा रहा है, जिससे प्रदूषण और संक्रमण का खतरा बना हुआ है।

मुझे जानकारी नहीं

जेएलएन अस्पताल के लिए नया एसटीपी बनेगा। पीछे जो एसटीपी बना हुआ है, वो एमसीएच के लिए बना था। एमसीएच पुराने अस्पताल में शिफ्ट हो गया, इसलिए वो चला ही नहीं। इससे ज्यादा जानकारी मुझे नहीं है।

- डॉ. आरके अग्रवाल, पीएमओ, जेएलएन अस्पताल, नागौर

Published on:
29 Jun 2026 11:15 am