Naxal News: घने जंगल, तीखे पहाड़ और पगडंडियों से आगे पसरा अबूझ इलाका—यही वह भूगोल है, जहां दशकों तक नक्सलवाद ने अपने सबसे सुरक्षित ठिकाने बनाए।
Naxal News: घने जंगल, तीखे पहाड़ और पगडंडियों से आगे पसरा अबूझ इलाका—यही वह भूगोल है, जहां दशकों तक नक्सलवाद ने अपने सबसे सुरक्षित ठिकाने बनाए। 12 फरवरी को ओएंगर के जंगल-पहाड़ क्षेत्र में चला संयुक्त सर्च ऑपरेशन इस अ²श्य युद्ध की एक अहम कड़ी साबित हुआ।
29वीं वाहिनी भारत-तिब्बत सीमा पुलिस और नारायणपुर पुलिस की टीम ने नक्सलियों के छिपे हुए विस्फोटक भंडार और हथियार बरामद कर न सिर्फ एक संभावित बड़े हमले को टाल दिया, बल्कि यह भी उजागर कर दिया कि भले ही नक्सली नेटवर्क कमजोर पड़ा हो, उसकी स्लीपर रणनीतियां अब भी सक्रिय हैं।
सुरक्षा एजेंसियों को बीते कुछ समय से ओएंगर क्षेत्र में संदिग्ध गतिविधियों के इनपुट मिल रहे थे। स्थानीय सूत्रों से मिली जानकारी के बाद संयुक्त बलों ने इलाके में सर्च और एरिया डोमिनेशन अभियान तेज किया। दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों में घंटों पैदल मार्च, ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर जोखिम भरी मूवमेंट और हर कदम पर आईईडी की आशंका- यह ऑपरेशन किसी सामान्य तलाशी अभियान से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण था। इसी दौरान जंगल की आड़ में छिपाकर रखी गई विस्फोटक सामग्री और हथियारों का जखीरा बरामद हुआ।
सुरक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, बरामद सामग्री से एक से अधिक आईईडी तैयार की जा सकती थीं, जिनका इस्तेमाल सुरक्षा बलों की गश्ती या मूवमेंट को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता था।
बरामद सामग्री में प्राइमा कॉर्ड, सेफ्टी फ्यूज, इलेक्ट्रिक वायर, आईईडी मैकेनिज्म और देशी हथियार शामिल थे। यह संकेत देता है कि नक्सली संगठन अब भी छिटपुट लेकिन घातक वारदातों की तैयारी में जुटे हैं। यह ऑपरेशन एक बड़ी त्रासदी को टालने में सफल रहा, लेकिन सुरक्षा तंत्र के सामने एक कड़वी सच्चाई भी रख गया। नक्सलवाद अब भले ही बड़े संगठित हमलों की स्थिति में न हो, पर उसकी रणनीति बदलकर हिट-एंड-रन और स्लीपर सेल आधारित हो चुकी है। यानी खतरा घटा है, खत्म नहीं हुआ।