
नरसिंहपुर/करेली। ग्रामीण क्षेत्रों में खेलों को बढ़ावा देने के लिए शासन प्रशासन जो भी दावे करें लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि गांवों में खेल के मैदान नहीं है। जो शासकीय जमीन पड़ी थी उस पर विभिन्न शासकीय इमारतें बन चुकी है। गांव में प्राथमिक व माध्यमिक स्कूल हैं लेकिन उनके पास मैदान नहीं है। ऐसे में खेलों में ग्रामीण प्रतिभाओं का सामने निकलकर आना असंभव होकर रह गया है।
वहीं दूसरी ओर खेल मैदानों की कमी के चलते इन ग्रामीण खिलाडिय़ों को खलिहानों और खेतों के आसपास पड़ी खाली जगह पर अभ्यास करना पड़ रहा है। ज्ञात हो चांवरपाठा ब्लाक में 340 शासकीय स्कूल हंै। जिसमें प्राथमिक 225, माध्यमिक 84, हाई स्कूल व हायर सेकेंडरी 31 है। बाबजूद इसके इन स्कूलों में से कुछ ही ऐसे है जहां सिर्फ चंद स्कूलों में ही कहने को मैदान है।
हालांकि बीते सालों में डोभी,तेंदूखेड़ा सहित कुछ जगहों पर खेल मैदान बनाये गये है लेकिन वे सिर्फ स्थानीय स्तर के लोगों के लिए ही सहज उपलब्ध है,इन मैदानों तक दूसरे गांवों से आकर अभ्यास करने के लिए पहुंचना ग्रामीण युवाओं के लिए आसान नहीं है।
नागरिक कहते हंै कि यदि खेल के मैदान ही नहीं होंगे तो खेल कहां होंगे। यही कारण है कि गांवों में खेल प्रतिभाए दम तोड़ रही हंै। जिसके चलते समय समय पर होने वाली सरकारी और निजी खेल प्रतियोगिताओं में ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाली टीमों की सहभागिता कम नजर आती है। ग्रामीण क्षेत्रों में खेल के प्रति युवाओं, छात्रों का उत्साह लगभग खत्म ही हो गया है।
करेली ब्लाक में ऐसे दर्जनों की संख्या में गांव है जहां न तो गांव में खेलने के लिए जमीन है और न ही स्कूल के पास ही इतनी जगह है कि वहां विद्यार्थी खेल सके। छात्र विनोद पटेल कहते है कि गांव में खेल का माहौल ही समाप्त हो गया है। इसका सबसे बुरा असर सामूहिक कार्यप्रणाली पर भी पड़ा है। अब बच्चें ऐसे खेल खेलते है जिसमें अधिक बच्चों की जरूरत ही नहीं होती। जो खेल मैदान में खेले जाते थे वह लगभग बंद ही हो गए है।
इनका कहना है
खेल के लिए मैदान का होना बहुत जरूरी है। हमारे यहां खेलों पर ध्यान ही नहीं दिए जाते। छोटे मैदान बनाकर कबड्डी, वॉलीवाल जैसे खेलों के लिए मैदान तैयार कर खिलाडिय़ों को प्रोत्साहित किया जा सकता है। लेकिन इस प्रकार की सोच का अभाव है।
अमन खान किक्रेट खिलाड़ी
एक ओर खेलों को लेकर योजनाएं बनाई जाती है,वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर संसाधनों की कमी बनी रहती है। ग्रामीण क्षेत्रों में यदि युवाओं को अभ्यास के लिए सहूलियतें मिलेंगी। तभी बेहतर खेल प्रतिभाएं उभरकर सामने आयेगी। क्षेत्र के स्कूलों में भी खेल मैदानों की कमी महसूस की जाती है। प्रतिभाओं को अवसर देने के लिए संसाधनों की उपलब्धता जरूरी है,इस पर शासन को गंभीरता से ध्यान देना होगा।
सत्यप्रकाश त्यागी, शिक्षक शासकीय स्कूल डोभी