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CJP Protest पीएम नरेंद्र मोदी के खिलाफ सबसे बड़ा विरोध, जानिए किसान आंदोलन से कितना अलग है सीजेपी का प्रदर्शन

CJP Protest: नरेंद्र मोदी बतौर प्रधानमंत्री पहली बार इस स्तर का आंदोलन देख रहे हैं। पहले सीएए, एनआरसी के विरोध में और किसानों का भी आंदोलन हुआ था, लेकिन ताजा प्रदर्शन सबसे अलग है।
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Updated: 22 Jul 2026, 3:06 PM IST
Rahul gandhi sit in, rahul gandhi in custody
21 जुलाई को प्रधानमंत्री निवास के बाहर धरना दे रहे राहुल गांधी को जबरन हटाया गया। (Photo: IANS)

दिल्ली के जंतर मंतर पर चल रहा कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का आंदोलन अभी थमा नहीं है। 20 जुलाई को पुलिस ने उनका संसद मार्च रोक दिया और इससे पहले जंतर मंतर को लगभग खाली करा दिया था, लेकिन रातोंरात फिर से भीड़ जुट गई और मंच वैसे ही सज गया। पुलिस की लाठियों से घायल अनेक युवा भी बैंडेज-पट्टी लगाए ही फिर से जंतर मंतर पहुंच गए थे।

सीजेपी प्रोटेस्ट का केंद्र दिल्ली, किसान आंदोलन दिल्ली की सीमा पर

12 साल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए यह दूसरा ऐसा आंदोलन है, जिसने सरकार के लिए परेशानी खड़ी कर दी है। इससे पहले किसान आंदोलन ने सरकार की नाक में दम किया था। इस आंदोलन को पंजाब-हरियाणा के किसानों का आंदोलन समझा गया और सरकार ने उदासीन रवैया अपनाते हुए लंबे समय तक किसानों की मांगों पर ध्यान नहीं दिया था। हालांकि, बाद में प्रधानमंत्री ने माफी मांगते हुए विवादित कृषि कानून वापस ले लिए थे। लेकिन, उस और इस आंदोलन में एक बड़ा अंतर यह है कि इसका केंद्र दिल्ली है। किसानों को सरकार ने दिल्ली की सीमा से अमूमन दूर ही रखा था।

किसान आंदोलन में लंबे समय तक उदासीन रही थी सरकार, इस बार जल्दी बातचीत को तैयार

किसान आंदोलन से उलट इस बार सरकार उदासीन दिखने की कोशिश नहीं कर रही है। सरकार के मंत्री सीजेपी की मांगों के समर्थन में भूख हड़ताल कर रहे सोनम वांगचुक से भी मिले, सीजेपी के प्रतिनिधियों से भी बात की, पुलिस के बल प्रयोग से घायल हुए लोगों से मुलाक़ात की। और, कहा जा रहा है कि सरकार आंदोलनकारियों की मांगों पर उनसे बातचीत के लिए भी तैयार है।

विपक्ष को मिला ज्यादा माइलेज

असल में सोनम वांगचुक को जबरन अस्पताल पहुंचाने और 20 जुलाई को प्रदर्शनकारियों पर पुलिस द्वारा लाठी चार्ज करने के बाद आंदोलन का रुख बदल गया। पहले जहां मुख्य रूप से शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान निशाने पर थे, अब सीधे प्रधानमंत्री निशाने पर आ गए।

विपक्ष ने भी अच्छा स्टैंड लिया। पुलिस के बल प्रयोग को ढाल बना कर विपक्ष आंदोलन का मुख्य चेहरा बन गया और उसे व्यापक स्वरूप दिला गया। 21 जुलाई को धरना दे रहे राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं को पुलिस ने जिस तरह जबरदस्ती प्रधानमंत्री निवास से हटाया, वह राजनीतिक रूप से विपक्ष, खास कर कांग्रेस के लिए बड़ा फायदेमंद रहा। खास कर तब जब राहुल गांधी पेपर लीक और धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे का मुद्दा शुरू से ही उठाते रहे हैं।

बिना ठोस नेतृत्व के चल रहा सीजेपी प्रोटेस्ट

किसान आंदोलन से तुलना करें तो यह एक तरह से नेतृत्वविहीन आंदोलन है। सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके में आज की तारीख में ऐसे किसी आंदोलन की अगुआई करने की क्षमता नहीं दिखती। वैसे भी, सच कहा जाए तो उन्होंने मज़ाक-मज़ाक में कॉकरोच जनता पार्टी के नाम से सोशल मीडिया पर अकाउंट बना लिया था। अचानक करोड़ों लोग इस अकाउंट से जुड़ गए तो वह थोड़ा सक्रिय हुए और धीरे-धीरे जमीन पर दिखने लगे। लेकिन, यह भी सच है कि जंतर मंतर पर भीड़ उन्हें बुलानी नहीं पड़ रही है, खुद आ रही है। 20 जुलाई के संसद मार्च के लिए भी सीजेपी ने बस अपील की थी। वहां आई भीड़ लाई गई नहीं थी। दिल्ली पुलिस और खुफिया एजेंसियों को भी उतने लोगों के आने का अनुमान नहीं था।

भाजपा को किसान आंदोलन से ज्यादा नुकसान का खतरा

कई लोग, जिनमें बीजेपी के नेता भी शामिल हैं, मानते हैं कि यह आंदोलन सोशल मीडिया के दम पर चल रहा है, इसमें आने वाले लोग 'रील वाले युवा' हैं। लेकिन, वे यह भी मानते हैं कि जो नुकसान होना था वो तो हो गया। किसान से बड़ा वोट बैंक युवाओं का है। इनसे जुड़े मुद्दों से इनके मां-बाप भी जुड़े हैं।

Updated on:
22 Jul 2026, 3:06 PM IST
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