
RSS Annual Meeting: राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की तीन दिवसीय वार्षिक बैठक के दूसरे दिन मंगलवार को अलग-अलग सत्र हुए। इसमें कई विषयों पर उद्बोधन हुआ। इस दौरान नशीली दवाओं के बढ़ते उपयोग पर चिंता के साथ विभिन्न प्लेटफाॅर्म पर कंटेंट को लेकर चर्चा की गई। प्रांतों के आधार पर विषयों को प्रस्तुत किया गया। आगामी वर्षों में किए जाने वाले कार्यों की योजना भी प्रस्तावित की गई, जिसके आधार पर वर्षभर काम होगा। मार्च से संघ की नई रचना के अनुसार विस्तार होगा।
मालूम हो, सोमवार को शताब्दी वर्ष के दौरान हुए शाखा कार्य विस्तार और पंच परिवर्तन के साथ गृह संपर्क को लेकर किए गए कार्यों की समीक्षा की गई थी। बीते वर्ष हुई प्रतिनिधि सभा की बैठक में संघ की नई रचना करने का निर्णय लिया गया था। अब इस आधार पर प्रांत के स्थान पर संभागवार संघ इकाइयों का गठन होगा और उसी आधार पर पदाधिकारियों की नियुक्ति होगी। दरअसल, बैठक को लेकर काफी समय से तैयारियां की जा रही थीं। इसमें आयोजन स्थल को खास तौर पर तैयार किया गया है। इसमें अशोक भवन, विक्रम भवन, होलकर भवन, संत रविदास बौद्धिक सभागृह के नाम से भवन तैयार किए गए हैं। प्रदर्शनी स्थल को चित्रांजलि नाम से तैयार किया गया है। भोजनशाला को मालवा लोक मंडपम नाम दिया है।
बैठक स्थल पर संघ की 100 वर्षों की यात्रा के साथ धार की भोजशाला पर आधारित प्रदर्शनी लगाई गई है। ‘भोजशाला के प्रत्यक्ष प्रमाण’ नाम से विशेष क्षेत्र तैयार किया गया है। प्रदर्शनी के माध्यम से भोजशाला के शुरू के चित्रण के साथ मौजूदा वर्णन भी किया गया है। कुछ ऐसी तस्वीरें भी हैं, जिन्हें कोर्ट में भी सुनवाई के दौरान प्रस्तुत किया गया था। प्रदर्शनी में राजा भोज के शासनकाल और स्थापना से लेकर मध्यकालीन आक्रमणों, वाग्देवी की प्रतिमा के लंदन पहुंचने, अंग्रेजों के पुरातात्विक अध्ययन और आजादी के बाद हुए आंदोलनों का क्रमबद्ध तरीके से वर्णन किया गया है। प्रदर्शनी में सिद्धि यंत्र, सनातन प्रतीकों से सुसज्जित स्तंभ और शिलालेखों के खंडित अवशेष भी हैं। परिसर के उस देवस्थान को दिखाया गया है, जहां राजा भोज द्वारा भगवान विष्णु और शिव की आराधना करने का दावा है। इसी स्थान की खुदाई में प्रतिमा मिली थी। यज्ञकुंड से प्राप्त मगरमुख आकृति, स्तंभों पर बने कीर्ति चिह्न, गर्भगृह के शिखर के अंदर बना अष्टदल कमल और फर्श पर देवनागरी में अंकित शिलालेखों का भी वर्णन है।
प्रदर्शनी ‘धारा नगरी के राजा’ शीर्षक से शुरू हो रही है। इसमें मालवा की प्राचीन राजधानी धार और परमार वंश के राजा भोज का परिचय दिया गया है। राजा भोज को पराक्रमी शासक के साथ कला, साहित्य, दर्शन, विज्ञान और शिक्षा का संरक्षक बताया गया है। इसके बाद ‘मां सरस्वती के वरद पुत्र’ में वर्ष 1034 में भोजशाला (सरस्वती कंठाभरण विश्वविद्यालय) की स्थापना का उल्लेख है। इसके आगे भोजशाला के स्थापत्य, संस्कृत शिलालेखों, देवी वाग्देवी की प्रतिमा और प्राण प्रतिष्ठा के लिए हुए यज्ञ का वर्णन है।