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Crime File: गोली मारी, फिर चढ़ाई गाड़ी- मुंबई पुलिस के गले की फांस बना था जावेद हथौड़ा का एनकाउंटर

1997 में जावेद फावड़ा को मुठभेड़ में मारने का दावा कर मुंबई पुलिस ने सोचा था कि गुलशन कुमार हत्याकांड की नाकामी छिपेगी, लेकिन उसका यह दांव उल्टा पड़ गया था।

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Mar 31, 2026
फोटो प्रतीकात्मक है। इसे AI का इस्तेमाल कर बनाया गया है।

साल 1997 का अगस्त महीना। बात उन दिनों की है, जब मुंबई 'कैसेट किंग' और माता वैष्णो रानी के भक्त गुलशन कुमार की हत्या (12 अगस्त) से सहमी और सन्न थी। गुलशन कुमार से पहले भी कई रईस और नामचीन हस्तियां अंडरवर्ल्ड की गोलियों का शिकार हो चुकी थीं। पुलिस कुछ खास कर नहीं पा रही थी।

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पुलिस को हर बार बनाना पड़ता नया बहाना

गुलशन कुमार की हत्या के बाद मुंबई पुलिस पर दबाव कुछ ज्यादा ही था। ज्वाइंट कमिश्नर रणजीत सिंह शर्मा बुरी तरह फंसे हुए थे। एक तरफ मीडिया उन्हें घेरे हुए था, दूसरी ओर नेताओं का जबरदस्त दबाव था। यह उनके करियर का सबसे मुश्किल दौर था। हर सुबह पुलिस कमिश्नर सुभाष मल्होत्रा का फोन। फिर मंत्रालय से मुख्यमंत्री मनोहर जोशी का, गृह मंत्री गोपीनाथ मुंडे का। बीच-बीच में बीजेपी के दूसरे बड़े नेता भी घंटी बजाते ही रहते थे। हर कोई एक ही सवाल पूछता था, कोई गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई? और शर्मा हर बार नई वजह बताते, नई सफाई देते।

क्राइम ब्रांच आम तौर पर अपने काम का खूब ढोल पीटती है, लेकिन गुलशन कुमार केस में कई दिन बाद भी पुलिस के पास बताने के लिए कुछ नहीं था। शर्मा और उनके डिप्टी के.एल. प्रसाद रात-दिन एक कर रहे थे, फिर भी कोई सुराग हाथ नहीं लग रहा था।

किसी भी बड़े क्राइम के बाद पुलिस अपने मुखबिरों को खंगालती है। मुखबिर कुछ बता पाए या नहीं, जांच को कोई न कोई दिशा तो मिल ही जाती है। लेकिन, इस केस में ऐसा कुछ नहीं हो पा रहा था। क्राइम ब्रांच की सभी यूनिटें इस काम में लगी थीं। अबू सलेम गैंग से जुड़े निज़ामुद्दीन को उठाया गया। लॉक अप में कई दिन बिठाकर उससे पूछताछ की गई, लेकिन कुछ हासिल नहीं हुआ। उसे छोड़ना पड़ा।

बाल ठाकरे ने पुलिस कमिश्नर को कह दिया ''बिजूका''

इधर शिवसेना के बाल ठाकरे अपने अखबार 'सामना' में रोज पुलिस की धज्जियां उड़ा रहे थे। पुलिस कमिश्नर सुभाष मल्होत्रा को उन्होंने ऐसा "बिजूका" (खेतों में पक्षियों को डराने के लिए खड़ा किया जाने वाला पुतला) तक कह दिया, जो किसी को डरा भी नहीं सकता।

इसी बीच अंडरवर्ल्ड का एक और वार हो गया। नरीमन पॉइंट इलाके में बिल्डर नटवरलाल देसाई को गोलियों से उड़ा दिया गया। यह इलाका मंत्रालय के ठीक सामने है। अगले दिन अखबारों की सुर्खी थी, "मंत्रालय की नाक के नीचे कत्ल।"

जब सरकार को लगा कि अब लेनी ही होगी किसी की बलि

मुख्यमंत्री जोशी और गृह मंत्री मुंडे के लिए अब पानी सिर से ऊपर जाने वाली स्थिति हो गई थी। उन्होंने तय किया कि खुद को बचाने के लिए किसी की बलि लेनी ही होगी। पुलिस कमिश्नर मल्होत्रा सूली पर चढ़ा दिए गए। हत्या के दो हफ्ते बाद मल्होत्रा को पुलिस हाउसिंग और वेलफेयर जैसे विभाग में 'शंट' कर दिया गया। मुंबई पुलिस के इतिहास में यह पहली बार हुआ था कि किसी पुलिस कमिश्नर को सिर्फ एक हाई-प्रोफाइल हत्या की वजह से इस तरह बाहर का रास्ता दिखाया गया हो।

नए कमिश्नर आए, पर सर मुंडाते ही ओले पड़े

28 अगस्त को रोनाल्ड हयासिंथ मेंडोंका मुंबई के नए पुलिस कमिश्नर बने। लेकिन, उनके साथ 'सर मुंड़ाते ही ओले पड़े' जैसा कुछ घट गया।

जिस दिन मेंडोका पुलिस कमिश्नर बने, उसी दिन एक ऐसी घटना हुई जिससे मुंबई पुलिस की बड़ी फजीहत हुई। बलार्ड पियर पर एक मुठभेड़ हुई, जिसमें एक शख्स मारा गया। एपीआई वसंत ढोबले ने यह एनकाउंटर किया और उनके लोगों ने मीडिया में खबर फैला दी कि गुलशन कुमार का शूटर मार गिराया गया। मराठी अखबारों ने ढोबले को हीरो बना दिया। लेकिन, क्राइम ब्रांच के दफ्तर में कोई जश्न नहीं था। जब मीडिया ने पूछा कि वह 'मेन शूटर' था या 'साइड शूटर'? तो अफसरों का जवाब था कि जांच जारी है। यह 'जवाब' अपने आप में कई सवा ही बहुत कुछ कह रही थी।

अंडरवर्ल्ड की भाषा में "मेन शूटर" वो होता है जो ट्रिगर दबाता है और "साइड शूटर" वो जो कवर देता है। पुलिस की चुप्पी से साफ था कि कुछ गड़बड़ है। और सच में गड़बड़ थी। पुलिस ने जिसे मार गिराया था उसे जावेद फावड़ा बताया गया था। असल में उसका नाम तो जावेद था, लेकिन अंडरवर्ल्ड से कुछ लेना-देना नहीं था।

जावेद फावड़ा असल में अबू सयामा अबू तालिब शेख था। उसे लोग जावेद भी बुलाते थे और दांत बाहर निकले होने की वजह से उसका "फावड़ा" नाम पड़ गया था। लेकिन जो जावेद पुलिस की गोलियों का शिकार हुआ वह बांद्रा रेलवे स्टेशन के पास मस्जिद के बाहर मूंगफली बेचता था। उसका अपराध की दुनिया से कुछ लेना-देना नहीं था। जावेद नाम होने की वजह से वह खामख्वाह पुलिस की गोलियों का शिकार हो गया था।

जावेद की बहन रुबीना ने बांद्रा पुलिस स्टेशन में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। इसमें उसने कहा था कि 26 अगस्त की रात चार लोग उसके भाई को उठाकर ले गए थे। 29 अगस्त को पुलिस से उसे बुलावा आया। बुलावा एक लाश की पहचान के लिए था। लाश बड़ी बुरी हालत में थी। पोस्टमार्टम में पता चला कि उसे न सिर्फ करीब से गोलियां मारी गई थीं, बल्कि उसके ऊपर गाड़ी भी चढ़ाई गई थी। उसकी पसलियां टूटी हुई थीं।

एनकाउंटर का यह मामला कोर्ट भी पहुंचा। हाई कोर्ट ने तो मुठभेड़ को जायज ठहराया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कुछ अलग आदेश और निर्देश दिया।

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Updated on:
31 Mar 2026 07:06 am
Published on:
31 Mar 2026 07:00 am
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