नीमच

मालवा-मेवाड़ से यूपी तक ‘काले सोने’ की फसल का अंतिम पड़ाव, देश के 1.21 लाख किसानों की अग्निपरीक्षा शुरू

Opium Cultivation : खेतों में गूंजे काली मां के जयकारे- अफीम की लुवाई-चिराई का श्रीगणेश। खुले बाजार में 2 लाख रु. किलो का भाव, मगर सरकारी दाम 'कौड़ियों' में। किसान बोले- अफीम की खेती बनती जा रही नुकसान का धंदा। देखें पत्रिका की ग्राउंड रिपोर्ट...।

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Feb 10, 2026
'काले सोने' की फसल का अंतिम पड़ाव (Photo Source- Patrika Input)

जावद से कमलेश सारड़ा की रिपोर्ट

Opium Cultivation : सर्दी, गर्मी और बेमौसम बरसात के थपेड़े सहकर खेतों में खड़ी 'काले सोने' की फसल अब अपने अंजाम तक पहुंचने वाली है। मध्य प्रदेश के मालवा, राजस्थान के मेवाड़ और उत्तर प्रदेश के कुछ चुनिंदा जिलों में मंगलवार को शुभ मुहूर्त में मां काली की पूजा-अर्चना के साथ अफीम की लुवाई-चिराई का कार्य विधिवत शुरू हो गया है।

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नीमच जिले के जावद क्षेत्र के ग्राम मोड़ी में जैसे ही किसानों ने अफीम के डोडों पर नर्नी (चीरा लगाने का औजार) चलाई, पूरा खेत 'जय काली' के उद्घोष से गूंज उठा। ये नजारा सिर्फ जावद का नहीं, बल्कि देश के उन तीनों राज्यों का है, जहां द के कड़े पहरे में अफीम की खेती की अनुमति दी जाती है।

क्यों है यह 'काला सोना'?

'काले सोने' की फसल का अंतिम पड़ाव (Photo Source- Patrika Input)

अफीम की खेती किसानों के लिए 'दोधारी तलवार' पर चलने जैसी है।

-सरकारी भाव: सरकार किसानों से बहुत कम दाम (गुणवत्तानुसार कुछ हजार रु./किलो) में अफीम खरीदती है, जिससे बमुश्किल लागत निकलती है।
-काला बाजार: अंतरराष्ट्रीय तस्कर बाजार में इसी अफीम की कीमत मांग के अनुसार डेढ़ लाख से 2 लाख रुपए प्रति किलो तक मानी जाती है।
-जोखिम: यही भारी कीमत किसानों की नींद उड़ाए हुए है। तस्करों की नजर और एनडीपीएस एक्ट की सख्त धाराओं के चलते किसान अब अगले 20 दिन रातों में जागकर पहरा देंगे।

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'काले सोने' की फसल का अंतिम पड़ाव (Photo Source- Patrika Input)

ग्राम मोड़ी के उन्नत किसान राजू नागदा ने 'पत्रिका' को बताया कि, अफीम के डोडे तोतों (मिठ्ठू) को बहुत प्रिय होते हैं। पक्षी डोडे फोड़कर बेशकीमती दूध (लेटेक्स) न पी जाएं, इसके लिए किसानों ने हजारों रुपए खर्च कर पूरे खेत को नायलॉन की जाली से ढंके जाते हैं। ये जाली ओलावृष्टि से भी फसल को आंशिक सुरक्षा देती है।

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1-कहां होती है खेती?

अफीम की खेती की अनुमति केंद्र सरकार से मिलती है, फिर उसी की निगरानी में इसकी फसल तैयार होती है। भारत में सिर्फ तीन राज्य हैं, जहां आधिकारिक तौर पर अफीम की खेती के लिए अनुमति मिल सकती है, वो भी सरकार की ओर से निर्धारित जिलों में सिर्फ चुनिंदा स्थानों पर। जिन राज्यों को अनुमति मिलती हैं, उनमें मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के चुनिंदा जिले शामिल हैं। यहां सिर्फ दवाओं आदि में इस्तेमाल के लिए ये खेती होती है। इसके अलावा कहीं और अफीम की खेती को अवैध माना जाता है और पकड़े जाने पर गंभीर धाराओं के तहत कार्रवाई की जाती है।

तीन राज्यों के इन जिलों को मिल सकती है खेती की अनुमति

-मध्य प्रदेश के नीमच, मंदसौर, रतलाम (जावरा), उज्जैन और शाजापुर जिले में इस खेती की अनुमति दी जाती है।
-राजस्थान के चित्तौड़गढ़, कोटा, बारां, झालावाड़, भीलवाड़ा और प्रतापगढ़ जिले में भी इस खेती की अनुमति दी जाती है।
-उत्तर प्रदेश के बाराबंकी, बरेली, लखनऊ और फैजाबाद जिले के चुनिंदा इलाकों में भी इसकी अनुमति मिलती है।

2-पट्टों का ताजा लेखा-जोखा

इस साल (2025-26) में सरकार ने करीब 1.21 लाख किसानों को इस खेती के पट्टे दिए हैं, जिनमें लगभग 15,000 नए किसान शामिल हैं।

-लुवाई-चिराई पट्टे : उन्हें दिए गए, जिनकी औसत 4.2 किग्रा/हेक्टेयर से ज्यादा थी।
-CPS पट्टे : उन्हें मिले, जिनकी औसत कम से थी या जिन्होंने स्वेच्छा से इसे चुना। इसमें डोडा बिना चीरा लगाए सरकार को देना होता है।

3-अगले साल (2026-27) की शर्त

इस साल जो किसान 5.9 किग्रा/हेक्टेयर (लुवाई वाले) की औसत सरकार को देंगे, सिर्फ उन्हीं का लाइसेंस अगले साल रिन्यू हो सकेगा।

प्रक्रिया: दोपहर में 'घाव', सुबह 'मरहम'

'काले सोने' की फसल का अंतिम पड़ाव (Photo Source- Patrika Input)

अफीम निकालने का काम बेहद तकनीकी है।

-चिराई : दोपहर बाद धूप ढलने पर किसान 'नर्नी' (नुकीला औजार) से डोडे पर नीचे से ऊपर की ओर चीरा लगाते हैं।
-दूध का जमना : रातभर की ठंडक में डोडे से दूध रिसकर जम जाता है।
-लुवाई : अगली सुबह सूर्योदय से पहले इसे 'चरपाला' (खुरचनी) से इकट्ठा किया जाता है। यही कच्ची अफीम है।

किसान की बात

'काले सोने' की फसल का अंतिम पड़ाव (Photo Source- Patrika Input)

ग्राम मोड़ी में रहने वाले अफीम काश्तकार अर्जुन सिंह सिसोदिया का कहना है कि 'यह खेती हमारी पीढ़ियों की विरासत है, लेकिन अब ये घाटे का सौदा बनती जा रही है। हम सरकार को 'सोना' सौंपते हैं, लेकिन बदले में हमें 'पीतल' का भाव मिलता है। सरकार को लागत के हिसाब से दाम बढ़ाने चाहिए।'

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Published on:
10 Feb 2026 07:14 am
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