दिल्ली के स्कूलों के प्रबंधन को प्रस्तावित फीस वृद्धि को फीस नियामक समिति के समक्ष जमा कराने की अंतिम तिथि 5 फरवरी कर दी गई है।
दिल्ली के निजी स्कूलों में फीस बढ़ोतरी को लेकर जारी कानूनी और प्रशासनिक खींचतान के बीच दिल्ली हाईकोर्ट में गुरुवार को अहम सुनवाई हुई। राजधानी के निजी स्कूलों में 'स्कूल स्तर की फीस नियामक समिति' (SLFRC) के गठन की समय-सीमा बढ़ा दी गई है। हालांकि, अदालत ने दिल्ली सरकार के उस कानून और अधिसूचना पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, जिसमें निजी स्कूलों को अपनी फीस नियंत्रित करने के लिए आंतरिक समितियां बनाने का निर्देश दिया गया था।
अदालत में सुनवाई के दौरान, शिक्षा निदेशालय (DoE) की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने कोर्ट के सुझाव पर समय-सीमा बढ़ाने पर सहमति जताई। अब स्कूल 20 जनवरी तक इस कमेटी का गठन कर सकेंगे। पहले यह अंतिम तारीख 10 जनवरी थी। स्कूलों को अब 5 फरवरी तक अपने फीस वृद्धि के प्रस्ताव कमेटी को सौंपने होंगे।
मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि फिलहाल वे इस कानून पर रोक नहीं लगाएंगे। कोर्ट ने कहा कि यह एक वन-टाइम उपाय है और कानून की संवैधानिक वैधता पर सुनवाई जारी रहेगी। अदालत ने इस मामले में शिक्षा निदेशालय और उपराज्यपाल वीके सक्सेना को नोटिस जारी कर उनका जवाब मांगा है।
'एक्शन कमेटी अनएडेड रिकॉग्नाइज्ड प्राइवेट स्कूल्स' सहित कई संस्थाओं ने इस नए कानून दिल्ली स्कूल शिक्षा (फीस निर्धारण और विनियमन में पारदर्शिता) अधिनियम, 2025 को चुनौती दी है। स्कूलों की ओर से वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने तर्क दिया कि यह कानून लोकप्रियता के लिए बनाया गया है और इसमें विवेक का इस्तेमाल नहीं हुआ है। जब पहले से ही 1973 का संसदीय कानून मौजूद है, तो दिल्ली सरकार को नया कानून बनाने का अधिकार नहीं है। यह अधिसूचना उपराज्यपाल के बजाय शिक्षा निदेशालय द्वारा जारी की गई है, जो कानूनी रूप से गलत है।
यह नया कानून दिसंबर 2025 में लागू हुआ था। इसका मुख्य उद्देश्य निजी स्कूलों द्वारा मनमानी फीस बढ़ोतरी को रोकना है। इसके तहत एक त्रि-स्तरीय समिति प्रणाली का प्रावधान है, जिसमें अभिभावकों, स्कूल प्रबंधन और सरकारी प्रतिनिधियों की भागीदारी अनिवार्य है। इस मामले की अगली सुनवाई अब 12 मार्च को होगी।