- स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगे की आपूर्ति के लिए केंद्र और राज्य सरकार की बड़े निर्माताओं पर खत्म हुई निर्भरता - महिला स्वयं समूहों को सरकारों से मिले बड़े पैमाने पर ऑर्डर, यूपी को केंद्र से एक भी तिरंगा नहीं मंगाना पड़ा
नवनीत मिश्र
नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'हर घर तिरंगा' अभियान ने महिलाओं के नेतृत्व वाली एक नई तरह की इंडस्ट्री खड़ी कर दी है। पहले जहां बड़े निर्माता ही सरकार को तिरंगा बनाकर सप्लाई करते थे, आज यह कार्य महिलाओं के स्वयंत सहायता समूहों ने ले लिया है। अब केंद्र सरकार को बड़े निर्माताओं से तिरंगा खरीदने पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है।
संस्कृति मंत्रालय के सचिव गोविंद मोहन बताते हैं कि वर्ष 2022 में 'आज़ादी का अमृत महोत्सव' के पार्ट के तौर पर हर घर तिरंगा जैसा राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू हुआ था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कल्पना के अनुरूप यह अभियान एक जनांदोलन के रूप में बदला। अभियान में नागरिकों से देशभक्ति और एकता को बढ़ावा देने के लिए अपने घरों, कार्यस्थलों और संस्थानों में राष्ट्रीय ध्वज फहराने की अपील हुई थी। 2022 में शुरू हुआ यह अभियान देश के स्वतंत्रता दिवस समारोह के हिस्से के रूप में जारी है।
गोविंद मोहन कहते हैं, हर घर तिरंगा अभियान के एक बड़े जन आंदोलन के रूप में विकसित होने से देश भर में हजारों महिलाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा किए। इस पहल ने जमीनी स्तर पर महिलाओं के स्तर से संचालित एक बिल्कुल नए उद्योग को जन्म दिया, जिससे बड़े विक्रेताओं पर निर्भरता कम हो गई। आज, देश में सबसे ज्यादा स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) ही तिरंगा बना रहे हैं।
संस्कृति मंत्रालय के सचिव गोविंद मोहन याद करते हैं कि जब 2022 में पहली बार अभियान शुरू हुआ था तो देश में झंडों की भारी मांग सामने आई। हर घर झंडा उपलब्ध कराने की बड़ी चुनौती सामने आई। इस पर केंद्र सरकार ने बड़े विक्रेताओं से राष्ट्रीय ध्वज खरीदे और लगभग 7.5 करोड़ झंडे राज्यों को सीधे और डाकघरों के माध्यम से उपलब्ध कराए गए। तिरंगा बनाने के अभियान से स्वयंत सहायता समूहों को भी जोड़ने की पहल की, ताकि महिलाओं को रोजगार मिल सके। इसके लिए प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीय ध्वज संहिता में संशोधन की पहल की, जिससे महिलाओं और स्वयं सहायता समूहों आदि छोटी इकाइयों की भी तिरंगा निर्माण में भागीदारी हो सके।
गोविंद मोहन बताते हैं, " अभियान के दूसरे साल तक केंद्र सरकार से आपूर्ति किए जाने वाले राष्ट्रीय ध्वज की मांग में भारी गिरावट आई और यह करीब 2.5 करोड़ रह गई, क्योंकि महिला स्वयं सहायता समूहों ने झंडों के उत्पादन का काम तेजी से अपने हाथ में ले लिया। मिसाल के तौर पर उत्तर प्रदेश को देखें, जिसने 2022 में केंद्र सरकार से 4.5 करोड़ झंडे खरीदे थे, लेकिन 2023 में कोई भी नहीं खरीदा, क्योंकि महिलाओं की बदौलत राज्य के स्वयं सहायता समूह झंडा उत्पादन में आत्मनिर्भर हो गए। 2024 में केंद्र सरकार से राज्यों को आपूर्ति किए जाने वाले झंडों की मांग घटकर सिर्फ 20 लाख रह गई।
देश में हर घर एक के हिसाब से हर साल करीब 25 करोड़ झंडों की जरूरत होती है। देश में तिरंगा बनाने का व्यवसाय बड़े विक्रेताओं से स्वयं सहायता समूहों की ओर शिफ्ट होने से महिलाओं को भारी संख्या में रोजगार के अवसर उपलब्ध हुए हैं।