
Gen Alpha Protests: देश में अभी तक 'जेन जी' का सरकार के खिलाफ प्रदर्शन चल रहा था, लेकिन अब इस प्रदर्शन की रेस में 'जेन अल्फा' भी दिखाई देने लगे हैं। दरअसल, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में पहली बार 'जेन अल्फा' (वर्ष 2010 से 2025 के बीच जन्मे बच्चे) अपनी समस्याओं को लेकर सड़कों पर उतर आए हैं। क्लासरूम में पंखे, साफ पानी, चालू शौचालय, शिक्षक, बेहतर खाना, डेस्क और स्कूल तक सड़क जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए बच्चे विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। बता दें कि यह महज कोई स्थानीय विवाद नहीं, बल्कि भारत में जेन अल्फा की अपनी तरह की पहली कई राज्यों में दिखाई देने वाली विरोध लहर है।
बीते पखवाड़े में बच्चों ने शिकायतों के पारंपरिक तरीकों जैसे माता-पिता या शिक्षकों से रोना या शिकायत करना को छोड़कर सीधे सड़कों पर उतरना चुना।
हमीरपुर (उत्तर प्रदेश)
11 अगस्त को चंदू पुर ग्राम पंचायत के बच्चों और ग्रामीणों ने 'तिरंगा यात्रा' निकालकर 5 किलोमीटर पैदल मार्च किया और कलेक्टरेट का घेराव किया। बच्चों की मांग आजादी के बाद से अब तक उनके स्कूल के लिए पक्की सड़क न बनने को लेकर थी।
फतेहपुर (उत्तर प्रदेश)
सर्वोदय इंटर कॉलेज के करीब 1,500 छात्रों ने कक्षाओं का बहिष्कार कर दिया। खराब पंखे, बिजली की वायरिंग और मिड-डे मील की बदहाली पर स्कूल प्रशासन को बच्चों की मांगों के आगे झुकना पड़ा।
गया (बिहार)
सिमुआरा मिडिल स्कूल के 40-50 बच्चे खराब खाने, बंद पड़े हैंडपंप और टूटे बेंचों की शिकायत लेकर 4 किलोमीटर पैदल चलकर सीधे एसडीएम (SDM) दफ्तर पहुंच गए।
बाड़मेर व जालोर (राजस्थान)
शिक्षकों की भारी कमी से परेशान होकर छात्रों ने सरकारी स्कूलों के मुख्य दरवाजों पर ताले जड़ दिए। प्रशासन द्वारा नए शिक्षकों की तैनाती के आश्वासन के बाद ही प्रदर्शन खत्म हुआ।
छिंदवाड़ा (मध्य प्रदेश) और महाराष्ट्र
आवासीय स्कूलों में दाल-सब्जी में कीड़े मिलने और शौचालय जैसी बुनियादी कमियों को लेकर बच्चों ने मोर्चा खोला।
विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विरोध प्रदर्शन अचानक या शून्य में पैदा नहीं हुआ है। बल्कि एक साल पहले नेपाल में 'जेन जी' (Gen Z) के युवाओं ने भ्रष्टाचार और सोशल मीडिया बैन के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन कर सरकार गिरा दी थी। भारत में NEET-UG पेपर लीक के खिलाफ सीजेपी (CJP) का जंतर-मंतर पर 50 दिनों तक चला लंबा प्रदर्शन हाल ही में समाप्त हुआ, जिसके दबाव में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा।
हालांकि ये बच्चे अभी वोट नहीं दे सकते, लेकिन उनके पास सबसे बड़ा हथियार 'विजिबिलिटी' और 'सोशल मीडिया' है। सड़क पर मार्च करते और नारे लगाते बच्चों के वीडियो वायरल होते ही प्रशासन पर तुरंत कार्रवाई करने का दबाव बन जाता है।
प्रशासनिक अधिकारियों ने कई जगहों पर सवाल उठाए हैं। हमीरपुर के एडीएम (ADM) का कहना था कि कुछ असामाजिक तत्व बच्चों को मोहरा बनाकर आगे कर रहे हैं। हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि भले ही वयस्कों का इसमें थोड़ा मार्गदर्शन हो, लेकिन बच्चों की बुनियादी समस्याएं बिल्कुल वास्तविक हैं। वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई के अनुसार, "देश भर के स्कूली बच्चे अब रील्स से लेकर सड़क प्रदर्शन तक हर उपकरण का इस्तेमाल कर अपनी बात रख रहे हैं, और तंत्र उनके तीखे सवालों का जवाब देने में संघर्ष कर रहा है।"