
अभिषेक सिंघल
नई दिल्ली। भारत में सौर और पवन ऊर्जा का बढ़ता इस्तेमाल केवल बिजली उत्पादन और पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं रहा बल्कि इसने देश के आयात खर्च को भी कम किया है। रिन्युएबल एनर्जी के कारण देश को कोयला और प्राकृतिक गैस के आयात पर होने वाले खर्च में भी बड़ी राहत मिल रही है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईइए) की इंडिया रिन्यूएबल एनर्जी मार्केट रिपोर्ट 2026 के अनुसार, वर्ष 2011 से 2025 के बीच अक्षय ऊर्जा के विस्तार से भारत को कोयला और प्राकृतिक गैस के आयात खर्च में 100 अरब डॉलर से अधिक की बचत हुई है। मौजूदा ईंधन कीमतें बनी रहती हैं तो 2030 तक यह बचत करीब 240 अरब डॉलर पहुंच सकती है।
रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2030 तक जीवाश्म ईंधन के आयात में सालाना बचत करीब 35 अरब डॉलर होने का अनुमान है। यह राशि वित्त वर्ष 2024-25 में भारत के गैर-कोकिंग कोयला और प्राकृतिक गैस के वास्तविक आयात बिल से भी अधिक होगी। इस बचत में सौर ऊर्जा की हिस्सेदारी करीब 60 प्रतिशत है, जबकि पवन ऊर्जा का योगदान लगभग 30 प्रतिशत है।
अक्षय ऊर्जा के विस्तार का असर कोयले के आयात पर भी साफ दिखाई दे रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, यदि वर्ष 2010 के बाद सौर, पवन और जैव ऊर्जा की क्षमता नहीं बढ़ाई गई होती तो 2025 में भारत का कोयला आयात करीब 11 करोड़ टन अधिक होता। ऐसी स्थिति में बिजली उत्पादन के लिए आयात पर निर्भरता वास्तविक स्तर से लगभग दोगुनी हो सकती थी।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने 2025 में अपनी स्थापित बिजली क्षमता में गैर-जीवाश्म स्रोतों की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत तक पहुंचाने का लक्ष्य तय समय से पांच साल पहले हासिल कर लिया। सितंबर 2026 तक भारत की सौर मॉड्यूल विनिर्माण क्षमता बढ़कर करीब 225 गीगावाट हो गई। आईईए का अनुमान है कि 2030 तक भारत की अक्षय बिजली उत्पादन क्षमता 530 गीगावाट तक पहुंच सकती है। अनुकूल नीतियों और चुनौतियों के समय पर समाधान की स्थिति में यह क्षमता करीब 580 गीगावाट तक भी जा सकती है।
रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और कर्नाटक देश की कुल स्थापित अक्षय बिजली क्षमता का करीब 65 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं। इससे इन राज्यों में बिजली ट्रांसमिशन और ग्रिड प्रबंधन की जरूरत और बढ़ेगी।
आईईए के कार्यकारी निदेशक फातिह बिरोल ने कहा कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में बढ़ती अनिश्चितता के बीच भारत का अक्षय ऊर्जा विस्तार उसकी ऊर्जा सुरक्षा को बड़े पैमाने पर मजबूत कर रहा है। उन्होंने कहा, भारत का अनुभव दिखाता है कि निरंतर और स्पष्ट नीतियों से अक्षय ऊर्जा की लागत घटाई जा सकती है और निवेश आकर्षित किया जा सकता है। दूसरे उभरते देशों के लिए भी इससे महत्वपूर्ण सीख मिलती है।
केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रल्हाद जोशी ने कहा कि बिजली की बढ़ती मांग को देखते हुए भारत घरेलू विनिर्माण क्षमता मजबूत करने, निवेश जुटाने और बिजली ट्रांसमिशन ढांचे के विस्तार पर काम कर रहा है।