
रोजगार, आत्मनिर्भरता और आधुनिक खेती, इन तीनों का एक नया संगम इन दिनों छतरपुर जिले में आकार ले रहा है। बात हो रही है देशी डिप्लोमा की, जिसे कृषि विभाग की आत्मा परियोजना के अंतर्गत संचालित किया जा रहा है। यह डिप्लोमा न केवल बेरोजगार युवाओं के लिए एक मजबूत विकल्प बनकर उभरा है, बल्कि महिलाएं और बुजुर्ग भी इसकी बदौलत अपने जीवन की नई शुरुआत कर रहे हैं।
प्रदेशभर में देशी डिप्लोमा देने में छतरपुर जिला पहले स्थान पर है, अब तक 15 जिलों और 7 राज्यों के 800 से अधिक अभ्यर्थी इस पाठ्यक्रम से लाभान्वित हो चुके हैं। इनमें से 12 महिलाएं अब पूरी तरह आत्मनिर्भर बन चुकी हैं। इस कोर्स की खासियत यह है कि इसे करने के लिए न उम्र की सीमा है, न किसी विशेष योग्यता की जरूरत। केवल आठवीं पास होना अनिवार्य है, जबकि 10वीं फेल छात्र भी आवेदन कर सकते हैं। 16 साल के किशोर से लेकर 70 साल तक के बुजुर्ग इसमें भाग ले रहे हैं।
देशी डिप्लोमा एक 11 माह का व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम है, जिसमें खेती-किसानी की आधुनिक तकनीकों, फसल चक्र, जैविक खेती, बीज भंडारण, खाद प्रबंधन, और बाजार से जुड़ाव की व्यावहारिक शिक्षा दी जाती है। कोर्स की कक्षाएं जिला मुख्यालय पर विधिवत रूप से आयोजित होती हैं और अंतिम परीक्षा के बाद सफल अभ्यर्थियों को मान्य डिप्लोमा दिया जाता है। इस डिप्लोमा के बाद उम्मीदवार खाद-बीज भंडार की दुकान खोल सकते हैं, कृषि संबंधी लाइसेंस प्राप्त कर सकते हैं, या खुद की खेती में वैज्ञानिक तकनीकों को लागू कर सकते हैं।
मोना पटेल ने बीएससी (मैथ्स) से ग्रेजुएशन के 18 साल बाद जब फिर से काम में लौटने की सोची, तो उन्हें देशी डिप्लोमा ने रास्ता दिखाया। साल 2024 में उन्होंने कोर्स किया और अब खाद-बीज की दुकान चला रही हैं। मोना कहती हैं अब मैं आत्मनिर्भर हूं, मेरी दुकान ही परिवार की आय का मुख्य स्रोत बन गई है। मैं न सिर्फ खुद काम कर रही हूं, बल्कि दूसरे महिलाओं को भी प्रेरित कर रही हूं।
छतरपुर के चंद्रनगर की गुड्डी अहिरवार पहले शिक्षकर्मी थीं, लेकिन 2012 में पारिवारिक कारणों से नौकरी छोडऩी पड़ी। इसके बाद वह गृहिणी बनी रहीं। लेकिन खेती में रुचि ने उन्हें फिर खड़ा किया। गुड्डी ने बताया मैं खेती-किसानी से जुड़ी रही हूं। जब देशी डिप्लोमा की जानकारी मिली, तो लगा यही वो मौका है, जिसकी मुझे जरूरत थी। डिप्लोमा के बाद उन्होंने गांव में खाद-बीज की दुकान खोली और अब सालाना 2.5 से 3 लाख रुपए का शुद्ध मुनाफा कमा रही हैं। उनके पति और परिवार के अन्य सदस्य भी अब उनके साथ काम में जुटे हुए हैं।
11 माह की अवधि
केवल 8वीं पास जरूरी
राज्य या जिले की कोई बाध्यता नहीं
प्रशिक्षण, परीक्षा और प्रमाणपत्र
कृषि लाइसेंस के लिए मान्य
खाद-बीज भंडार खोलने की पात्रता
आत्मा परियोजना के अधिकारी डॉ. बीपी सूत्रकार के अनुसार देशी डिप्लोमा का मुख्य उद्देश्य किसानों और बेरोजगारों को आत्मनिर्भर बनाना। यह सिर्फ डिग्री नहीं है, यह एक जीवन कौशल है। छतरपुर मॉडल अब दूसरे जिलों के लिए भी प्रेरणा बन गया है। ऐसे किसान जो परंपरागत खेती करते आ रहे हैं, उन्हें अब वैज्ञानिक दृष्टिकोण से खेती करने का प्लेटफॉर्म मिल रहा है।