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मोबाइल भारत में बनता है, लेकिन उसके पुर्जे कहां से आते हैं? ₹7,877 करोड़ के नए प्रोजेक्ट से क्या बदलेगा

Mobile Component Manufacturing in India : भारत में ₹7,877 करोड़ की नई ECMS योजना से मोबाइल कंपोनेंट विनिर्माण में क्या बदलेगा? जानिए डिस्प्ले, PCB, बैटरी सेल और सेमीकंडक्टर आयात की जमीनी हकीकत।
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Aug 18, 2026
Mobile Component Manufacturing in India
Mobile Component Manufacturing in India : मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग की भारत में क्या है हकीकत, PC- Chatgpt

भारत में अब मोबाइल फोन बनाने की कहानी सिर्फ असेंबली तक सीमित नहीं रहना चाहती। देश में स्मार्टफोन का उत्पादन और निर्यात तेजी से बढ़ा है, लेकिन फोन के अंदर लगने वाले कई महत्वपूर्ण पुर्जों और कच्चे माल के लिए भारत अभी भी दूसरे देशों पर निर्भर है। अब सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग स्कीम यानी ECMS के तहत 31 नए प्रस्तावों को मंजूरी दी है, जिनमें करीब ₹7,877 करोड़ का निवेश होगा। इसका मकसद मोबाइल, कंप्यूटर, टेलीकॉम और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के लिए जरूरी कंपोनेंट भारत में बनाना है।

लेकिन बड़ा सवाल यही है क्या इससे वह मोबाइल फोन सचमुच ‘मेड इन इंडिया’ बनेगा, जिसमें ज्यादातर पुर्जे भी भारत के होंगे?

मोबाइल भारत में बनता है, फिर भी कहानी अधूरी क्यों है?

भारत आज दुनिया के सबसे बड़े मोबाइल फोन निर्माण केंद्रों में शामिल है। देश में फोन की असेंबली बड़े पैमाने पर हो रही है और स्मार्टफोन भारत के प्रमुख निर्यात उत्पादों में शामिल हो चुका है। 2025 में स्मार्टफोन भारत का सबसे बड़ा निर्यात उत्पाद भी बना।
लेकिन फोन बनाना और फोन के ज्यादातर पुर्जे बनाना दो अलग चीजें हैं।

किसी स्मार्टफोन को खोलें तो उसमें स्क्रीन, कैमरा मॉड्यूल, बैटरी सेल, प्रिंटेड सर्किट बोर्ड, चिप, कनेक्टर, सेंसर, स्पीकर, माइक्रोफोन, एंटीना और कई छोटे इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट होते हैं। इनमें से कई चीजें भारत में बनना शुरू हो चुकी हैं, लेकिन पूरी सप्लाई चेन अभी देश के अंदर नहीं बनी है।

सरकार के मुताबिक भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण में घरेलू मूल्यवर्धन अभी करीब 18-20 प्रतिशत है। यानी भारत में बनने वाले इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद के कुल मूल्य में स्थानीय स्तर पर जो हिस्सा जुड़ता है, वह अभी भी सीमित है। यही वह अंतर है जिसे नई कंपोनेंट नीति भरना चाहती है।

फोन का कौन सा हिस्सा कहां से आता है?

डिस्प्ले : स्मार्टफोन का सबसे महंगा हिस्सा अक्सर डिस्प्ले मॉड्यूल होता है। इसमें सिर्फ कांच नहीं, बल्कि डिस्प्ले पैनल, टच सेंसर, ड्राइवर और दूसरी परतें शामिल होती हैं। भारत में डिस्प्ले की असेंबली और कुछ संबंधित उत्पादन क्षमता विकसित हो रही है, लेकिन पूरी उन्नत डिस्प्ले वैल्यू चेन अभी भारत में नहीं बनी है।

नई ECMS योजना में Display Module Sub-Assembly को सीधे लक्षित श्रेणी में रखा गया है। इसका मतलब है कि सरकार अब फोन के इस महत्वपूर्ण हिस्से का घरेलू उत्पादन बढ़ाना चाहती है।

कैमरा मॉड्यूल : आज के स्मार्टफोन में एक नहीं बल्कि कई कैमरे होते हैं। कैमरा मॉड्यूल में सेंसर, लेंस, एक्ट्यूएटर और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक हिस्से शामिल होते हैं।

भारत में कैमरा मॉड्यूल का स्थानीय उत्पादन शुरू हो चुका है। अक्टूबर 2025 में मंजूर पहली ECMS परियोजनाओं में भी कैमरा मॉड्यूल शामिल था। सरकार ने तब बताया था कि इन परियोजनाओं से घरेलू स्तर पर कैमरा मॉड्यूल की मांग का करीब 15 प्रतिशत पूरा होने की क्षमता बनेगी। इसके बाद ECMS की दूसरी किश्त में भी कई कंपनियों को कैमरा मॉड्यूल के लिए मंजूरी दी गई। यानी कैमरा अब सिर्फ आयात पर निर्भर रहने वाला हिस्सा नहीं रहना चाहता।

PCB - फोन का इलेक्ट्रॉनिक ‘कंकाल’ : Printed Circuit Board यानी PCB वह प्लेट होती है जिस पर फोन के कई इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट जुड़े होते हैं। भारत में PCB निर्माण की क्षमता बढ़ रही है, लेकिन बड़े पैमाने और उच्च तकनीक वाले PCB में अभी काफी गुंजाइश है।

ECMS में मल्टी-लेयर PCB, HDI PCB और फ्लेक्सिबल PCB जैसे उत्पादों को लक्षित किया गया है। योजना में आठ या उससे ज्यादा लेयर वाले मल्टी-लेयर PCB के लिए भी अलग प्रोत्साहन व्यवस्था है।

पहली मंजूरी में ही कई बड़ी PCB परियोजनाएं शामिल थीं। सरकार के मुताबिक शुरुआती सात परियोजनाओं से घरेलू स्तर पर PCB की मांग का करीब 20 प्रतिशत पूरा करने की क्षमता विकसित होने की उम्मीद थी।

बैटरी : स्मार्टफोन की बैटरी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा लिथियम-आयन सेल है। फोन की बैटरी पैकिंग और असेंबली भारत में होती है, लेकिन सेल निर्माण की पूरी क्षमता अभी विकसित नहीं हुई है। इसीलिए ECMS में Li-ion cells for digital applications को भी लक्षित क्षेत्र बनाया गया है। योजना के तहत इस श्रेणी के लिए 7 प्रतिशत तक शुरुआती टर्नओवर-लिंक्ड प्रोत्साहन का प्रावधान है।

इसका मतलब है कि सरकार सिर्फ बैटरी जोड़ने की क्षमता नहीं, बल्कि सेल के घरेलू उत्पादन की दिशा में भी जाना चाहती है।

कनेक्टर, कैपेसिटर और छोटे पुर्जे : मोबाइल में ऐसे दर्जनों छोटे हिस्से होते हैं जिन पर आमतौर पर ध्यान नहीं जाता—कनेक्टर, कैपेसिटर, रेजिस्टर, इंडक्टर, एंटीना, हीट सिंक आदि। यही छोटे पुर्जे किसी इलेक्ट्रॉनिक उद्योग की सप्लाई चेन को मजबूत बनाते हैं।

मार्च 2026 में मंजूर 29 ECMS प्रस्तावों में डिस्प्ले मॉड्यूल के साथ एंटीना, कैपेसिटर, कनेक्टर, हीट सिंक, Li-ion सेल, रिले, रेजिस्टर, ट्रांसड्यूसर, SMD पैसिव, फ्लेक्सिबल PCB और इंडक्टर जैसे उत्पाद शामिल थे।

यानी सरकार अब सिर्फ मोबाइल फोन बनाने वाली बड़ी फैक्ट्रियों पर नहीं, बल्कि उनके पीछे मौजूद छोटे-छोटे सप्लायर नेटवर्क पर भी जोर दे रही है।

और चिप का क्या?

यह सबसे कठिन हिस्सा है। स्मार्टफोन की असली तकनीकी रीढ़ सेमीकंडक्टर चिप है। प्रोसेसर, मेमोरी, पावर मैनेजमेंट और दूसरे कई कामों के लिए अलग-अलग चिप इस्तेमाल होती हैं।

भारत ने सेमीकंडक्टर निर्माण की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। मई 2026 तक सरकार ने 12 सेमीकंडक्टर फैब/पैकेजिंग परियोजनाओं और 24 सेमीकंडक्टर डिजाइन परियोजनाओं को मंजूरी दी थी। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारत ने चिप आयात पर निर्भरता खत्म कर दी है।

NITI Aayog के अनुसार 2024 में भारत ने करीब $23.8 अरब के इंटीग्रेटेड सर्किट यानी चिप्स आयात किए। यह भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स आयात की सबसे बड़ी श्रेणी थी। इसलिए मोबाइल की पूरी वैल्यू चेन को भारत में लाने की सबसे कठिन कड़ी अभी भी सेमीकंडक्टर है।

भारत कितना आयात करता है?

यहां एक जरूरी सावधानी है। 'मोबाइल के पुर्जों का कुल आयात” नाम से एक ही सरकारी आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, क्योंकि अलग-अलग कंपोनेंट अलग-अलग HS कोड में दर्ज होते हैं। लेकिन पूरी इलेक्ट्रॉनिक्स सप्लाई चेन की तस्वीर भारत की निर्भरता साफ दिखाती है।

2024 में भारत ने करीब:

उत्पादभारत का आयात
इंटीग्रेटेड सर्किट/चिप$23.8 अरब
मोबाइल व टेलीकॉम उपकरण$17.6 अरब
मशीनों के पार्ट्स$6.3 अरब
बैटरी$3.1 अरब
सेमीकंडक्टर व LED$3.6 अरब

ये आंकड़े पूरे इलेक्ट्रॉनिक्स इकोसिस्टम के हैं, केवल मोबाइल फोन के नहीं।

चीन की भूमिका भी बड़ी है। 2024-25 में भारत के कुल इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट आयात का 37.94 प्रतिशत चीन से आया। इसी श्रेणी में भारत ने दुनिया से करीब $36.8 अरब का आयात किया, जिसमें चीन से लगभग $14 अरब का आयात था।

यानी मोबाइल की फैक्ट्री भारत में हो सकती है, लेकिन उसकी सप्लाई चेन का बड़ा हिस्सा अभी भी भारत के बाहर है।

₹7,877 करोड़ के 31 प्रोजेक्ट क्या बदल सकते हैं?

अब आते हैं सबसे महत्वपूर्ण हिस्से पर। अगस्त 2026 में मंजूर 31 प्रस्तावों में ₹7,877 करोड़ का निवेश होना है। इन परियोजनाओं का लक्ष्य भारत में इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट निर्माण क्षमता बढ़ाना और आयात पर निर्भरता घटाना है।

इसका असर सिर्फ मोबाइल उद्योग तक सीमित नहीं होगा। इन कंपोनेंट का इस्तेमाल टेलीकॉम, कंप्यूटर, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रिक वाहन, रक्षा, चिकित्सा उपकरण और उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स में भी होता है।

यानी एक PCB फैक्ट्री सिर्फ मोबाइल के लिए PCB नहीं बनाएगी। उसका उत्पादन कई दूसरे उद्योगों में भी इस्तेमाल हो सकता है।

क्या इससे आयात पूरी तरह खत्म हो जाएगा?

नहीं। यह समझना बहुत जरूरी है। ₹7,877 करोड़ का निवेश यह नहीं बताता कि उतने ही मूल्य का आयात तुरंत कम हो जाएगा। परियोजनाओं को उत्पादन शुरू करने, गुणवत्ता हासिल करने और वैश्विक कंपनियों की सप्लाई चेन में जगह बनाने में समय लगेगा।

इसके अलावा चिप, उन्नत डिस्प्ले, कैमरा सेंसर और कई उच्च तकनीक वाले कच्चे माल के लिए भारत को अभी भी वैश्विक सप्लाई चेन से जुड़ा रहना होगा। लेकिन लक्ष्य 100 प्रतिशत आत्मनिर्भरता से ज्यादा महत्वपूर्ण है वैल्यू चेन में भारत का हिस्सा बढ़ाना।

सरकार की ECMS योजना का कुल बजटीय आवंटन 2026-27 में बढ़ाकर ₹40,000 करोड़ किया गया है। सरकार के अनुसार अब तक ECMS के तहत 75 आवेदन मंजूर हो चुके थे और 12 राज्यों में परियोजनाएं स्वीकृत थीं। असली बदलाव मोबाइल से ज्यादा ‘मोबाइल के पीछे’ होगा

भारत ने पहला चरण काफी हद तक पार कर लिया है, फोन की असेंबली और बड़े पैमाने पर उत्पादन। अब दूसरा और मुश्किल चरण है- फोन के अंदर लगने वाली हर चीज की सप्लाई चेन तैयार करना।

अगर भारत डिस्प्ले मॉड्यूल, कैमरा, PCB, बैटरी सेल, कनेक्टर, पैसिव कंपोनेंट और दूसरे हिस्से देश में बनाने लगता है तो तीन बड़े फायदे होंगे।

  • पहला, आयात पर निर्भरता कम होगी।
  • दूसरा, फोन की घरेलू वैल्यू बढ़ेगी।
  • तीसरा, भारत सिर्फ असेंबली सेंटर नहीं बल्कि वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स सप्लाई चेन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकेगा।

लेकिन इसके लिए केवल फैक्ट्रियां लगाना काफी नहीं होगा। सस्ती बिजली, कुशल श्रमिक, डिजाइन क्षमता, कच्चे माल की उपलब्धता, परीक्षण सुविधाएं और सबसे बढ़कर सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम भी बनाना होगा।

Updated on:
18 Aug 2026 02:23 pm
Published on:
18 Aug 2026 02:23 pm