
why people did not smile in old photographs: पुरानी तस्वीरों में क्यों दिखते थे गंभीर चेहरे, सिर्फ कैमरा नहीं और भी कई कारण थे, जानिए पूरी कहानी (photo: AI Creative)
Photography History Facts why people did not smile in old photographs: पुरानी तस्वीरें देखते ही एक बात अक्सर ध्यान खींचती है, लोग लगभग हमेशा गंभीर नजर आते हैं। न मुस्कान, न दांत दिखते हैं, न आज जैसी स्वाभाविक मुद्रा। अब जरा आज की तस्वीर से इसकी तुलना कीजिए। मोबाइल कैमरा सामने आते ही लोग मुस्कुराते हैं, अलग-अलग चेहरे बनाते हैं और एक ही पल में कई तस्वीरें खिंच जाती हैं।
पुरानी तस्वीरों का अध्ययन करने वाले बताते हैं कि ऐसा बिल्कुल नहीं है। पुरानी तस्वीरों में मुस्कान कम दिखाई देने के पीछे कैमरे की तकनीक जरूर एक वजह थी, लेकिन सिर्फ वही वजह नहीं थी। असल में गंभीर तस्वीरों की कहानी बताती है तकनीक, सामाजिक परंपरा और उस समय फोटोग्राफी की हैसियत, ये तीनों ऐसे कारण है जिन्हें समझना जरूरी है।
पुराने आर्टिकल्स, म्यूजियम्स और लाइब्रेरीज से मिली जानकारी के मुताबिक फोटोग्राफी के शुरुआती दौर में तस्वीर बनाना आज की तरह एक क्षण का काम नहीं था। डाग्युरियोटाइप जैसी शुरुआती प्रक्रिया में प्रकाश-संवेदी प्लेट को काफी देर तक रोशनी के संपर्क में रखना पड़ता था। अमेरिकी लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस के मुताबिक शुरुआती डाग्युरियोटाइप में तीन से 15 मिनट तक का एक्सपोजर लग सकता था। बाद में रासायनिक प्रक्रिया और लेंस में सुधार के कारण यह समय एक मिनट से भी कम हो गया। यानी शुरुआती दौर में कैमरे के सामने बैठे व्यक्ति को काफी देर तक स्थिर रहना पड़ सकता था। इतनी देर तक मुस्कुराहट बनाए रखना आसान नहीं था।
चेहरा थोड़ा हिला तो तस्वीर धुंधली हो सकती थी। इसी वजह से शुरुआती स्टूडियो में लोगों को सिर और शरीर स्थिर रखने के लिए अलग-अलग सहारे भी इस्तेमाल किए जाते थे। गेटी के मुताबिक शुरुआती पोर्ट्रेट में गर्दन और सिर को स्थिर रखने वाले उपकरण इस्तेमाल किए जाते थे। लेकिन यहीं एक जरूरी सुधार आता है। सिर्फ लंबा एक्सपोजर ही पूरी कहानी नहीं है। क्योंकि फोटोग्राफी की तकनीक कुछ ही दशकों में तेजी से सुधर गई थी।
Smithsonian के मुताबिक, शुरुआती व्यावसायिक फोटोग्राफी के दौर में एक्सपोजर कई मामलों में लगभग 5 से 15 सेकंड तक आ चुका था। यानी हर पुरानी तस्वीर के पीछे कई मिनट तक स्थिर बैठने की मजबूरी मान लेना सही नहीं होगा।
दरअसल तस्वीर खिंचवाना उस समय कोई रोज का काम नहीं था। आज हमारे फोन में हजारों तस्वीरें हो सकती हैं। लेकिन 19वीं सदी में तस्वीर बनवाना महंगा, समय लेने वाला और अपेक्षाकृत दुर्लभ अनुभव था। Smithsonian के मुताबिक उस दौर में लोग जानते थे कि संभव है यह उनकी जिंदगी की एकमात्र तस्वीर हो। इसलिए कैमरे के सामने बैठने का अंदाज आज की तरह मजाकिया या सहज नहीं, बल्कि गंभीर और औपचारिक होता था।
सोचिए, अगर आपको पता हो कि आपकी तस्वीर शायद जीवनभर की एकमात्र तस्वीर बनने वाली है, तो क्या आप कैमरे के सामने खड़े होकर कोई मजेदार चेहरा बनाएंगे? संभावना है कि आप भी सीधे बैठेंगे।
इसके पीछे एक और बड़ा कारण था, पोर्ट्रेट की पुरानी परंपरा। फोटोग्राफी आने से पहले किसी व्यक्ति का औपचारिक चित्र बनवाना मुख्य रूप से चित्रकारों का काम था। ऐसे चित्रों में गंभीर, संयत और गरिमापूर्ण मुद्रा आम थी। जब फोटोग्राफी लोकप्रिय हुई तो शुरुआती पोर्ट्रेट स्टूडियो ने भी उसी दृश्य भाषा को काफी हद तक अपनाया। गेटी के मुताबिक, शुरुआती स्टूडियो फोटोग्राफी में पश्चिमी यूरोपीय पोर्ट्रेट परंपरा का असर साफ दिखाई देता है। पृष्ठभूमि, बैठने की मुद्रा, हाथों की स्थिति और चेहरे के भाव तक में।
इसलिए कैमरे के सामने खुलकर हंसना उस समय जरूरी नहीं कि 'अच्छी तस्वीर' का संकेत माना जाता हो। दांत दिखाकर मुस्कुराना भी हमेशा शालीन नहीं माना जाता था। यह तथ्य आज सबसे ज्यादा चौंका सकता है।
गेटी के मुताबिक 19वीं सदी की औपचारिक पोर्ट्रेट संस्कृति में खुलकर दांत दिखाकर हंसना गंभीर और सम्मानित व्यक्ति की आदर्श छवि से मेल नहीं खाता था। चौड़ी मुस्कान को उस समय कुछ सामाजिक संदर्भों में अशालीनता, नशे या निम्न सामाजिक वर्ग से भी जोड़ा जाता था।
यानी आज जहां कैमरे के सामने बड़ी मुस्कान आत्मविश्वास का संकेत हो सकती है, वहां उस समय संयत चेहरा ही प्रतिष्ठित और सभ्य पोर्ट्रेट का हिस्सा हो सकता था। इसीलिए यह फर्क केवल कैमरे का नहीं, सामाजिक सौंदर्य और शिष्टाचार की सोच का भी था।
लेकिन गंभीर तस्वीरों से इतर कई पुरानी तस्वीरों में लोग मुस्कुराते भी दिखते हैं। अगर लंबे एक्सपोजर की वजह से मुस्कुराना बिल्कुल असंभव होता, तो पुरानी तस्वीरों में मुस्कुराते चेहरे दिखाई ही नहीं देते। लेकिन ऐसे उदाहरण मौजूद हैं।
गेटी के संग्रह में लगभग 1855 की ‘Portrait of a Father and Smiling Child’ नामक डाग्युरियोटाइप मौजूद है। यानी शुरुआती दौर में भी मुस्कुराते चेहरे कैमरे में दर्ज किए जा रहे थे।
इसलिए सही निष्कर्ष यह नहीं है कि 'पुराने कैमरे में मुस्कुराना संभव नहीं था। सही बात यह है कि मुस्कुराना कठिन था और उस समय औपचारिक पोर्ट्रेट में इसकी सामाजिक मांग भी आज जैसी नहीं थी।
तकनीक के साथ तस्वीरों का स्वभाव भी बदलने लगा। रिकॉर्ड्स बताते हैं कि 1880 के दशक में तेज फिल्म और हाथ में पकड़े जाने वाले कैमरों के आने के साथ मुस्कान धीरे-धीरे फोटोग्राफी की सामान्य अभिव्यक्ति बनने लगी।
1888 में जॉर्ज ईस्टमैन के Kodak कैमरे ने फोटोग्राफी को और ज्यादा सहज बनाया। Smithsonian से मिली जानकारी के मुताबिक Kodak का हैंडहेल्ड कैमरा लोगों को नियंत्रित स्टूडियो से बाहर जाकर रोजमर्रा की जिंदगी के क्षण रिकॉर्ड करने की सुविधा देने लगा। इसके बाद तस्वीरों में खेलते बच्चे, साइकिल चलाते लोग और रोजमर्रा की गतिविधियां ज्यादा दिखाई देने लगीं।
यानी कैमरा जैसे-जैसे आसान और तेज हुआ, तस्वीर भी गंभीर औपचारिक दस्तावेज से निकलकर जिंदगी के स्वाभाविक पलों का रिकॉर्ड बनने लगी।
भारत में फोटोग्राफी 19वीं सदी में पहुंची और जल्द ही राजघरानों, शहरों, स्मारकों और लोगों की तस्वीरें बनने लगीं। जब हम उस दौर की भारतीय तस्वीरों में गंभीर चेहरे देखते हैं तो, उन्हें देखकर यह कहना वाकई सही नहीं होगा कि भारतीय लोग उस समय मुस्कुराते नहीं थे। अगर वे गंभीर नजर भी आते थे, सोचना होगा कि कैमरा कितना तेज था? तस्वीर किस उद्देश्य से ली गई थी? क्या यह औपचारिक पोर्ट्रेट था? तस्वीर कितनी महंगी और दुर्लभ थी? उस दौर में सम्मानजनक मुद्रा कैसी मानी जाती थी?
यही वे सवाल हैं, जो किसी पुरानी तस्वीर को सिर्फ फोटो नहीं, बल्कि अपने समय का सामाजिक दस्तावेज बना देते हैं। तो अगली बार पुरानी तस्वीर देखकर क्या सोचें? अगर किसी 19वीं सदी की तस्वीर में दस लोग गंभीर चेहरे के साथ बैठे हैं, तब भी समझिए कि उस एक फ्रेम के पीछे तकनीक और समाज दोनों काम कर रहे थे।
शुरुआती कैमरों को ज्यादा रोशनी और लंबे एक्सपोजर की जरूरत थी। बाद में तकनीक तेज हुई, लेकिन औपचारिक पोर्ट्रेट की गंभीर परंपरा बनी रही। तस्वीर महंगी और दुर्लभ थी, इसलिए लोग उसे विशेष अवसर की तरह लेते थे। फिर कैमरा तेज हुआ, सस्ता हुआ और हाथ में आ गया। और धीरे-धीरे तस्वीर में वही आने लगा जो जिंदगी में पहले से था—हंसी, खेल, शरारत और अचानक पकड़े गए पल। यानी पुरानी तस्वीरों में मुस्कान की कमी सिर्फ चेहरे की कहानी नहीं है, यह कैमरे की तकनीक और उस दौर की सामाजिक सोच, दोनों की कहानी है।
Updated on:
18 Aug 2026 01:16 pm
Published on:
18 Aug 2026 01:16 pm
