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अंग्रेजों की आंख बना कैमरा: जानिए भारत में आते ही फोटोग्राफी ने कैसे बदल दिया इतिहास लिखने का तरीका?

Photography arrival india colonial history camera 1839: 1839 में यूरोप में सार्वजनिक हुई फोटोग्राफी की तकनीक एक साल में ही भारत पहुंच गई। फिर कैमरा सिर्फ यादें संजोने का माध्यम नहीं रह गया, उसने शहरों, स्मारकों, राजमहलों, युद्ध के मैदानों और औपनिवेशिक भारत को दर्ज करना शुरू कर दिया। लेकिन तस्वीरों ने इतिहास को बचाने के साथ-साथ यह भी तय किया कि भारत को दुनिया किस नजर से देखेगी। World Photography Day पर पढ़िए patrika.com की खास पेशकश
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भारत

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Sanjana Kumar

Aug 18, 2026

photography arrival India colonial history camera 1839-Photography India Interesting History Facts

photography arrival India colonial history camera 1839: जानिए भारत में आकर फोटोग्राफी ने कैसे बदल दिया इतिहास लिखने का तरीका? (AI Creative)

Photography arrival India colonial history camera 1839: 19 अगस्त 1839 को पेरिस में जब डाग्युरियोटाइप प्रक्रिया दुनिया के सामने आई, तब शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह तकनीक आने वाले दशकों में भारत का इतिहास देखने का नजरिया ही बदल देगी। लेकिन नई तकनीक को भारत पहुंचने में ज्यादा समय नहीं लगा। दिसंबर 1839 में ही 'बॉम्बे टाइम्स' ने डाग्युरियोटाइप कैमरे के भारत पहुंचने पर तीन लेख प्रकाशित किए। 1840 तक कलकत्ता की थैकर एंड कंपनी डाग्युरियोटाइप कैमरे आयात करके बेचने का विज्ञापन दे रही थी। यानी यूरोप में फोटोग्राफी के सार्वजनिक होने के करीब एक साल के भीतर भारत में इसका व्यावसायिक इस्तेमाल शुरू हो चुका था। लेकिन भारत में कैमरे की कहानी सिर्फ नई तकनीक के आने की कहानी नहीं है। यह उस दौर की कहानी है, जब एक तस्वीर धीरे-धीरे दस्तावेज बन रही थी।

तस्वीर ने चित्रकार से इतिहास का एक काम छीन लिया

फोटोग्राफी से पहले किसी इमारत, शहर या व्यक्ति को दर्ज करने के लिए चित्रकार और कलाकारों पर निर्भर रहना पड़ता था। उनकी कला महत्वपूर्ण थी, लेकिन उसमें कलाकार की नजर, शैली और कल्पना शामिल होती थी। फोटोग्राफी ने पहली बार दावा किया कि सामने मौजूद दृश्य को सीधे प्रकाश की मदद से रिकॉर्ड किया जा सकता है। 19वीं सदी के मध्य तक भारत में कैमरा इस्तेमाल करने वाले सिर्फ यूरोपीय अधिकारी नहीं थे। शौकिया फोटोग्राफर, व्यावसायिक फोटोग्राफर, पत्रकार और भारतीय लोग भी इस नई तकनीक को अपनाने लगे थे। इससे भारत के शहरों और स्मारकों की ऐसी दृश्य सामग्री तैयार होने लगी, जो आज इतिहासकारों के लिए अमूल्य है।

लेकिन अंग्रेजों के लिए कैमरा सिर्फ कला नहीं था

यह एक महत्वपूर्ण कहानी हो सकती है। क्योंकि, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और बाद में औपनिवेशिक प्रशासन के लिए तस्वीरें केवल सुंदर दृश्य नहीं थीं। वे भारत को देखने, दर्ज करने और समझने का साधन भी बन रही थीं। इसका शानदार उदाहरण हैं कैप्टन लिनियस ट्राइप।

ट्राइप ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में अधिकारी थे और उन्हें सैन्य सर्वेक्षण का प्रशिक्षण मिला था। 1854 से 1860 के बीच उन्होंने दक्षिण भारत और बर्मा में बड़ी संख्या में तस्वीरें बनाईं। उन्होंने मंदिरों, महलों, किलों, धार्मिक और गैर-धार्मिक इमारतों, प्राकृतिक दृश्यों और पुरातात्विक स्थलों को दर्ज किया।

1856 में वे मद्रास प्रेसिडेंसी के आधिकारिक फोटोग्राफर नियुक्त किए गए थे। मेट्रोपॉलिटन म्यूजियम के मुताबिक दक्षिण भारत में अपने काम के दौरान ट्राइप ने 290 से अधिक बड़े प्रारूप के नेगेटिव और कुल 17,745 प्रिंट तैयार किए। सोचिए, उस समय जब एक तस्वीर बनाना आज की तरह एक सेकंड का काम नहीं था, तब हजारों प्रिंट तैयार करना कितना बड़ा दस्तावेजी अभियान रहा होगा।

कैमरा भारत के स्मारकों का 'दृश्य सर्वे' बन गया

ट्राइप का काम सिर्फ फोटोग्राफी नहीं था। उनकी तस्वीरों में एक सर्वेक्षक की नजर दिखाई देती थी। वह किसी मंदिर या महल को सिर्फ सुंदर दिखाने के लिए नहीं, बल्कि उसकी संरचना और वास्तुकला को स्पष्ट रूप से दर्ज करने के लिए भी फ्रेम करते थे। इसीलिए उनकी तस्वीरें आज इतिहास, वास्तुकला और पुरातत्व के अध्ययन में महत्वपूर्ण स्रोत हैं। मेट के अनुसार ट्राइप की तस्वीरों ने ब्रिटिश दर्शकों के सामने दक्षिण भारत और बर्मा के ऐसे सांस्कृतिक और स्थापत्य दृश्यों का एक तरह का दृश्य संसार बनाया, जिन्हें वे स्वयं जाकर नहीं देख सकते थे। यानी यह वह समय था जब कैमरा भारत को सिर्फ दर्ज नहीं कर रहा था, बल्कि देश को दुनिया के सामने प्रस्तुत भी कर रहा था।

1857 के बाद कैमरे ने युद्ध के निशान भी दर्ज किए

फोटोग्राफी के इतिहास में 1857 का विद्रोह भी महत्वपूर्ण मोड़ है। दिल्ली, कानपुर, लखनऊ और दूसरे स्थानों की तस्वीरों ने विद्रोह के बाद के भारत के दृश्य रिकॉर्ड को बदल दिया। ब्रिटिश लाइब्रेरी के अभिलेखों में मेजर टाइटलर के लगभग 500 नेगेटिव का उल्लेख मिलता है। इन तस्वीरों में दिल्ली, मसूरी, लैंडौर, मेरठ, रुड़की, कानपुर, लखनऊ, बनारस और आगरा जैसे स्थान शामिल थे।

इसका अर्थ यह नहीं कि ये तस्वीरें 1857 की पूरी कहानी बताती हैं। बल्कि समस्या यहीं से शुरू होती है। जो कैमरे के सामने आया, इतिहास में उसका दृश्य रिकॉर्ड बन गया। जो कैमरे के सामने नहीं आया, वह तस्वीरों के संग्रह में दिखाई ही नहीं देता।

तस्वीर हमेशा पूरी सच्चाई नहीं होती

यह बात आज सुनने में अजीब लग सकती है, क्योंकि हम तस्वीर को वास्तविकता का प्रमाण मानते हैं। लेकिन 19वीं सदी के फोटोग्राफर भी फ्रेम चुनते थे। क्या दिखाना है? क्या नहीं दिखाना है? किस कोण से दिखाना है? किस व्यक्ति को तस्वीर में रखना है? इन फैसलों से तस्वीर का अर्थ बदल सकता था। इसका एक बेहद दिलचस्प उदाहरण आगरा के चिकित्सक जॉन मरे का है।

मरे ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम करते थे और उन्होंने आगरा का व्यापक फोटोग्राफिक सर्वे तैयार किया। मेट के रिकॉर्ड के अनुसार उन्होंने अपनी तस्वीरों के नेगेटिव में हाथ से बदलाव भी किए, क्योंकि कैमरे की तकनीकी सीमाएं उनके देखे और याद किए गए दृश्य से मेल नहीं खाती थीं। यानी फोटो में बदलाव की कहानी एआई से शुरू नहीं हुई। 19वीं सदी में भी फोटोग्राफर कभी-कभी तस्वीर को अपनी कल्पना या स्मृति के अनुरूप सुधारते थे। फर्क सिर्फ इतना था कि तब यह काम हाथ से होता था, आज सॉफ्टवेयर कर सकता है।

फिर कैमरा भारतीय इतिहास का खजाना कैसे बना?

फोटोग्राफी की इस कहानी का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। औपनिवेशिक नजर से बनाई गई तस्वीरों के बावजूद आज इन्हीं तस्वीरों से हम 19वीं सदी के भारत की कई ऐसी चीजें देख सकते हैं जो समय के साथ बदल गईं या खत्म हो गईं। ब्रिटिश लाइब्रेरी के आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया संग्रह में फोटोग्राफी से जुड़े 23,000 से अधिक रिकॉर्ड सूचीबद्ध हैं। संग्रह में हेनरी कजिन्स, जेम्स बर्गेस, रॉबर्ट गिल, एडमंड लियोन और अलेक्जेंडर कैडी जैसे फोटोग्राफरों के काम दर्ज हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि फोटोग्राफी ने भारत की पुरातात्विक विरासत का कितना बड़ा दृश्य रिकॉर्ड तैयार किया।

एक कैमरा, दो विरासतें

इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प विरोधाभास यही है। औपनिवेशिक शासन के लिए कैमरा भारत को देखने और दर्ज करने का औजार था। लेकिन आज वही तस्वीरें औपनिवेशिक भारत को समझने का स्रोत बन गई हैं। तस्वीरें उस समय सत्ता की नजर से बनाई गई होंगी, लेकिन आज इतिहासकार उन्हीं तस्वीरों को दूसरी नजर से पढ़ सकते हैं, उनमें वास्तुकला देख सकते हैं, शहरों का बदलाव समझ सकते हैं, नष्ट हो चुकी इमारतों के स्वरूप की तुलना कर सकते हैं और उस समय के सामाजिक जीवन के संकेत तलाश सकते हैं। यानी कैमरे ने इतिहास को सिर्फ लिखा नहीं। उसने इतिहास के लिए एक दृश्य अभिलेख छोड़ दिया।

19 अगस्त का असली मतलब

विश्व फोटोग्राफी दिवस को सिर्फ कैमरा, सेल्फी और खूबसूरत तस्वीरों का दिन मानना इस माध्यम की रोचक और पूरी कहानी को निहायती छोटा कर देता है। भारत में फोटोग्राफी की शुरुआती कहानी बताती है कि कैमरा आते ही उसने तीन भूमिकाएं अपना ली थीं, एक कलाकार की आंख, दूसरी प्रशासक का रिकॉर्ड और तीसरी इतिहासकार का दस्तावेज। और शायद इसकी सबसे बड़ी सीख आज के दौर के लिए भी है। तस्वीर सच को दर्ज कर सकती है, लेकिन तस्वीर का फ्रेम हमेशा किसी इंसान ने चुना होता है।

इसलिए इतिहास की किसी पुरानी तस्वीर को देखते समय सिर्फ यह पूछना काफी नहीं कि 'इसमें क्या दिख रहा है?' एक और सवाल जरूर पूछना चाहिए, 'इसे किसने, क्यों और किस नजर से दिखाया?' यही सवाल 1839 में आई उस तकनीक को सिर्फ फोटोग्राफी नहीं, बल्कि इतिहास पढ़ने का एक नया तरीका बना देता है।