
Weak Monsoon Economic Impact India : मानसून कमजोर होने पर क्या पड़ता है असर, PC- Chatgpt
भारत में मानसून सिर्फ बारिश का मौसम नहीं है। यह खेती, पानी, बिजली, महंगाई और ग्रामीण आय, इन सबको एक साथ प्रभावित करता है। यही वजह है कि अगर मानसून सामान्य से कमजोर रहता है तो उसका असर खेत से निकलकर शहर की रसोई और बिजली के बिल तक पहुंच सकता है।
2026 का मानसून इसी वजह से चिंता बढ़ा रहा है। जून में बारिश काफी कमजोर रही, जुलाई में स्थिति सुधरी, लेकिन अब अगस्त-सितंबर में फिर सामान्य से कम बारिश का अनुमान सामने आया है। 11 अगस्त तक देश में मानसूनी बारिश सामान्य से करीब 12% कम थी और मौसम विभाग ने पश्चिमी, मध्य और दक्षिणी हिस्सों में अगले दो हफ्तों में मानसून कमजोर पड़ने का अनुमान जताया था।
तो सवाल है बारिश में कमी का असर सिर्फ फसल पर पड़ेगा या पूरा आर्थिक चक्र इसकी चपेट में आएगा?
यहां सबसे पहले एक भ्रम दूर करना जरूरी है। ऐसा कोई सार्वभौमिक नियम नहीं है कि बारिश 1% कम हुई तो खेती भी ठीक 1% कम हो जाएगी। असर इस बात पर निर्भर करता है कि बारिश कब कम हुई, किस इलाके में कम हुई, कितने दिनों का सूखा पड़ा और वहां सिंचाई की सुविधा कितनी है।
RBI के एक अध्ययन के मुताबिक मानसून का कृषि उत्पादन पर असर सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण है, हालांकि सिंचाई बढ़ने के कारण समय के साथ कृषि की मानसून पर निर्भरता कुछ कम हुई है।
यानी बारिश की कुल मात्रा से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका वितरण है। 100 मिमी बारिश एक साथ हो जाए और फिर 20 दिन बारिश न हो, तो फसल को उतना फायदा नहीं मिलेगा जितना नियमित अंतराल पर हुई बारिश से मिल सकता है।
2026 की शुरुआत में कमजोर मानसून का असर खरीफ फसलों की बुआई में साफ दिखाई दिया था। जून के अंत तक धान, दालों, तिलहन और कपास की बुआई पिछले साल से काफी पीछे थी। इनमें खास तौर पर दालें, तिलहन, सोयाबीन और कपास मानसून की अनिश्चितता के प्रति संवेदनशील हैं।
धान की स्थिति कुछ बेहतर हो सकती है क्योंकि कई इलाकों में सिंचाई उपलब्ध है, लेकिन बारिश की कमी लंबे समय तक रही तो धान की उत्पादकता पर भी असर पड़ सकता है।
दूसरी तरफ गन्ने जैसी पानी की ज्यादा जरूरत वाली फसलों पर भी सवाल उठते हैं। जुलाई के अंत तक देश में मानसून की कमी के बावजूद गन्ने का रकबा बहुत ज्यादा नहीं घटा था। इससे कुछ इलाकों में भूजल पर अतिरिक्त दबाव की चिंता बढ़ी है।
बारिश कम होने का पहला असर उत्पादन और लागत पर पड़ता है। अगर बारिश समय पर नहीं हुई तो किसान को दोबारा बुआई करनी पड़ सकती है। सिंचाई के लिए डीजल या बिजली का खर्च बढ़ सकता है। जिन इलाकों में भूजल नीचे है, वहां ज्यादा गहराई से पानी निकालने की जरूरत पड़ सकती है।
अगर उत्पादन घटता है और बाजार भाव बढ़ता है तो उपभोक्ता के लिए महंगाई बढ़ती है, लेकिन किसान को जरूरी नहीं कि उतना फायदा मिले। क्योंकि किसान की लागत भी बढ़ जाती है। यानी कमजोर मानसून में किसान के सामने दोहरा जोखिम है फसल कम हो और लागत ज्यादा।
यही वह असर है जो तुरंत दिखाई नहीं देता। बारिश कम हुई तो खेतों में नमी घटेगी। इसके बाद किसान सिंचाई के लिए ट्यूबवेल और बोरवेल पर ज्यादा निर्भर हो सकता है। CGWB के 2024 के आकलन के मुताबिक भारत की सिंचाई जरूरतों में भूजल की हिस्सेदारी करीब 62% है। यानी देश की खेती के लिए भूजल पहले ही बेहद महत्वपूर्ण है।
2023 के आकलन में देश की 6,553 भूजल मूल्यांकन इकाइयों में 736 इकाइयां यानी 11.2% ‘अति-शोषित’, 199 ‘क्रिटिकल’ और 698 ‘सेमी-क्रिटिकल’ श्रेणी में थीं।
इसलिए कमजोर मानसून का मतलब सिर्फ इस साल कम पानी नहीं है। अगर किसान लगातार भूजल निकालता रहा तो अगले रबी सीजन और अगले साल की खेती पर भी असर पड़ सकता है।
यह थोड़ा उल्टा लगता है, लेकिन कमजोर मानसून से बिजली की मांग कुछ परिस्थितियों में बढ़ सकती है। खेती में बारिश कम होगी तो किसानों को सिंचाई पंप ज्यादा चलाने पड़ेंगे। इसका मतलब कृषि क्षेत्र में बिजली की मांग बढ़ सकती है।
CEA के एक दीर्घकालिक अध्ययन में बारिश और बिजली की मांग के बीच उलटा संबंध पाया गया है। अध्ययन के मुताबिक 100 मिमी बारिश बढ़ने पर अखिल भारतीय स्तर पर बिजली की मांग में औसतन करीब 12% की कमी का अनुमान था, हालांकि इसका प्रभाव राज्य और मौसम के अनुसार बहुत अलग-अलग होता है। दूसरा असर बिजली उत्पादन पर पड़ सकता है।
कम बारिश का मतलब जलाशयों में कम पानी और इससे जलविद्युत उत्पादन प्रभावित हो सकता है। जून 2026 में भारत का हाइड्रो पावर उत्पादन पिछले साल की तुलना में करीब 21% कम रहा था। जुलाई में भी कमजोरी जारी रही।
यानी एक तरफ पंप चलाने के लिए बिजली की जरूरत बढ़ सकती है, दूसरी तरफ कम पानी के कारण जलविद्युत उत्पादन घट सकता है। इस अंतर को भरने के लिए कोयला, गैस या दूसरे स्रोतों पर ज्यादा निर्भरता हो सकती है।
मानसून → फसल → बाजार → कीमत। अगर बारिश कम हुई और उत्पादन घटा तो बाजार में किसी फसल की उपलब्धता कम हो सकती है। मांग वही रहने पर कीमत बढ़ती है। इसका असर सबसे पहले सब्जियों, दालों, तिलहन और कुछ अनाजों पर दिखाई दे सकता है।
2026 में जुलाई की खुदरा महंगाई बढ़कर 4.45% हुई और खाद्य महंगाई 5.52% तक पहुंच गई। हालिया विश्लेषणों में कमजोर मानसून को खाद्य कीमतों के जोखिमों में शामिल किया गया है।
हालांकि हर बार कम बारिश का मतलब तुरंत महंगाई नहीं होता। सरकार के पास बफर स्टॉक, आयात, निर्यात नीति और बाजार हस्तक्षेप जैसे उपाय होते हैं। लेकिन अगर उत्पादन में बड़ी और व्यापक कमी हुई तो कीमतों को नियंत्रित करना कठिन हो सकता है।
यह भी संभव है, लेकिन सीधा संबंध नहीं है। अगर जलविद्युत उत्पादन कम होता है और सिंचाई तथा गर्मी के कारण बिजली की मांग बढ़ती है तो ग्रिड को ज्यादा महंगे उत्पादन स्रोतों का इस्तेमाल करना पड़ सकता है।
2026 में भारत पहले ही गर्मी के दौरान 256.1 गीगावाट की रिकॉर्ड पीक बिजली मांग पूरी कर चुका है। उस समय थर्मल पावर की हिस्सेदारी करीब 67% और सौर ऊर्जा की करीब 21.5% थी। इसलिए कमजोर मानसून, गर्मी और बढ़ती बिजली मांग एक साथ आए तो बिजली व्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।
भारत ने सिंचाई का दायरा काफी बढ़ाया है और यही वजह है कि आज कृषि पहले की तुलना में मानसून के झटकों को कुछ हद तक बेहतर संभाल सकती है। लेकिन समस्या यह है कि सिंचाई पूरे देश में समान नहीं है। RBI के अनुसार सिंचाई कवरेज बढ़ने के बावजूद भारतीय कृषि अभी भी मानसून के प्रति संवेदनशील है।
जिन राज्यों और जिलों में नहर, जलाशय और भूजल की पर्याप्त उपलब्धता है, वहां किसान कम बारिश की भरपाई कर सकते हैं। लेकिन बारिश पर निर्भर क्षेत्रों में विकल्प सीमित हैं।
इसीलिए सरकार ने 2026 में कमजोर मानसून की आशंका के बीच 315 संवेदनशील जिलों के लिए आकस्मिक योजनाओं, कम पानी वाली फसलों, तालाबों और खेत-जलाशयों पर जोर दिया है। असली खतरा सिर्फ ‘कम बारिश’ नहीं, ‘गलत समय पर बारिश’ है
भारत के लिए भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती यह हो सकती है कि कुल बारिश बहुत ज्यादा न घटे, लेकिन उसका वितरण बदल जाए। एक तरफ कुछ दिनों में बहुत ज्यादा बारिश और दूसरी तरफ लंबे समय तक सूखा- यह खेती के लिए ज्यादा खतरनाक स्थिति हो सकती है। इससे बुआई प्रभावित होती है, मिट्टी की नमी घटती है, भूजल रिचार्ज कम होता है और जलाशयों पर दबाव बढ़ता है।
यानी भारत को सिर्फ ज्यादा सिंचाई परियोजनाओं की जरूरत नहीं है, बल्कि कम पानी में ज्यादा उत्पादन, वर्षा जल संचयन, सूक्ष्म सिंचाई और फसल पैटर्न में बदलाव की भी जरूरत है।
अगर मानसून कमजोर रहता है तो सबसे पहले किसान प्रभावित होता है। फिर असर भूजल, जलाशयों, बिजली उत्पादन, सिंचाई लागत, फसल उत्पादन और अंत में खाद्य कीमतों तक पहुंचता है।
लेकिन 2026 की तस्वीर को अभी सूखे या कृषि संकट का अंतिम संकेत मानना जल्दबाजी होगी। बारिश का क्षेत्रीय वितरण बहुत अलग है और आगे की बारिश फसल उत्पादन की स्थिति बदल सकती है। सरकार ने भी जुलाई में कहा था कि उस समय पूरे देश में खाद्यान्न उत्पादन पर किसी व्यापक असर का संकेत नहीं था।
Updated on:
18 Aug 2026 02:25 pm
Published on:
18 Aug 2026 02:25 pm
