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मोबाइल आने से 130 साल पहले भारत में खिंची थी सेल्फी! महाराजा ने खुद बनाया था कैमरा ट्रिगर

India first selfie: आज हाथ में फोन लेकर सेल्फी लेना सबसे आसान और आम है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में इसकी कहानी स्मार्टफोन से नहीं, 19वीं सदी के एक शाही कैमरे से जुड़ी है। करीब 1880 की एक तस्वीर में त्रिपुरा के महाराजा बीर चंद्र माणिक्य और उनकी पत्नी दिखाई देते हैं। खास बात यह है कि तस्वीर किसी तीसरे व्यक्ति ने नहीं खींची थी।
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भारत

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Sanjana Kumar

Aug 18, 2026

India First Selfie

India First Selfie: क्या आप जानते हैं सेल्फी का रोचक इतिहास? (photo: AI Creative)

India first selfie: आज सेल्फी के लिए बस फोन उठाइए, कैमरा खोलिए और स्क्रीन पर उंगली रख दीजिए। लेकिन जरा कल्पना कीजिए, न स्मार्टफोन था, न फ्रंट कैमरा, न स्क्रीन पर अपना चेहरा देखने की सुविधा और न ही इंस्टेंट फोटो। फिर भी करीब 1880 के आसपास भारत में एक ऐसा सेल्फ-पोर्ट्रेट बनाया गया, जिसे आज कई स्रोत भारत की शुरुआती सेल्फी के रूप में पहचानते हैं।

तस्वीर में हैं त्रिपुरा के महाराजा बीर चंद्र माणिक्य और उनकी पत्नी महारानी खुमान चानू मनमोहिनी देवी। और इस तस्वीर का सबसे दिलचस्प हिस्सा उनका साथ बैठना नहीं, बल्कि महाराजा के हाथ में मौजूद वह छोटा-सा उपकरण है।

हाथ में फोन नहीं, कैमरे का ट्रिगर था

तस्वीर को ध्यान से देखने पर महाराजा के हाथ में एक छोटा उपकरण दिखाई देता है। उपलब्ध विवरणों के मुताबिक यह कैमरे से जुड़े लंबे तार वाले शटर नियंत्रण का हिस्सा था। महाराजा ने इसी व्यवस्था की मदद से कैमरे को स्वयं सक्रिय किया और दोनों ने कैमरे के सामने बैठकर अपना चित्र बनाया।

यानी आज की भाषा में कहें तो उन्होंने किसी फोटोग्राफर को बुलाने के बजाय कैमरा खुद चलाने का इंतजाम कर लिया था। यही वजह है कि इस तस्वीर को आधुनिक शब्दावली में सेल्फी कहा जाने लगा। हालांकि उस समय सेल्फी शब्द मौजूद ही नहीं था। इसे तकनीकी रूप से सेल्फ-पोर्ट्रेट कहना ज्यादा सही है।

कहानी सिर्फ महाराजा की नहीं, महारानी की भी है

इस तस्वीर की एक और खासियत है। महारानी मनमोहिनी देवी सिर्फ तस्वीर में मौजूद व्यक्ति नहीं थीं। शोधकर्ता और लेखिका इरा मुखोती ने उनके फोटोग्राफी संबंधी काम पर लिखा है कि मनमोहिनी स्वयं कैमरा चलाने वाले भारतीय शाही वर्ग के उन शुरुआती लोगों में शामिल थीं। उनके पति बीर चंद्र को उनका संभावित शिक्षक माना जाता है।

यानी 1880 के आसपास त्रिपुरा का राजपरिवार फोटोग्राफी को केवल तस्वीर खिंचवाने की चीज नहीं, बल्कि रचनात्मक और तकनीकी गतिविधि के रूप में अपना चुका था। यह तथ्य आज के सेल्फी कल्चर से जुड़कर काफी दिलचस्प बन जाता है।

उस समय कैमरा रखना ही बड़ी बात थी

19वीं सदी में कैमरा आज के मोबाइल जैसा हल्का और आसान उपकरण नहीं था। फोटोग्राफी की शुरुआती तकनीकों में बड़े कैमरे, प्रकाश-संवेदी प्लेटें और रासायनिक प्रक्रियाएं शामिल थीं। इसलिए किसी व्यक्ति का खुद अपनी तस्वीर लेने का विचार अपने आप में तकनीकी प्रयोग था। त्रिपुरा के महाराजा बीर चंद्र माणिक्य को फोटोग्राफी का गहरा शौक था।

उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेजों के मुताबिक उनके राजमहल में फोटोग्राफी के लिए आवश्यक उपकरण और डार्करूम भी था। उन्होंने अपने महल में कैमरा क्लब जैसी गतिविधि को भी बढ़ावा दिया। यानी यह कोई संयोग से बनी तस्वीर नहीं थी। इसके पीछे कैमरे की समझ, प्रयोग करने की इच्छा और खुद तस्वीर बनाने की योजना थी।

दुनिया की पहली सेल्फी कौन-सी मानी जाती है?

यहां भारत की कहानी को दुनिया के इतिहास से जोड़ना जरूरी है। अमेरिका की लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस के मुताबिक रॉबर्ट कॉर्नेलियस ने अक्टूबर 1839 में फिलाडेल्फिया में अपना सेल्फ-पोर्ट्रेट बनाया था। इसे अमेरिका की सबसे पुरानी बची हुई पोर्ट्रेट तस्वीर माना जाता है और इसी वजह से इसे अक्सर पहली सेल्फी कहा जाता है।

कॉर्नेलियस ने अपना कैमरा खुद तैयार किया था। उस समय डाग्युरियोटाइप प्रक्रिया में एक्सपोजर काफी लंबा हो सकता था, इसलिए उन्हें कैमरा सेट करने के बाद खुद फ्रेम में जाकर लंबे समय तक स्थिर रहना पड़ा।

फैक्ट फाइल: सेल्फी- इतिहास से वर्तमान तक

1839: दुनिया में शुरुआती सेल्फ-पोर्ट्रेट।
करीब 1880: भारत में महाराजा और महारानी का सेल्फ-पोर्ट्रेट।
आज: एक दिन में करोड़ों सेल्फी।

लेकिन तकनीक बदल गई, मूल इच्छा वही रही, अपनी जिंदगी के किसी पल में खुद को भी तस्वीर का हिस्सा बनाना।

क्या इसे सचमुच भारत की पहली सेल्फी कहा जा सकता है?

कुछ मीडिया रिपोर्ट इसे सीधे भारत की पहली सेल्फी कहती हैं। लेकिन इतिहासकारों और शोधकर्ताओं की भाषा में इसे 'earliest-known Indian selfie' या भारत की सबसे शुरुआती ज्ञात सेल्फी/सेल्फ-पोर्ट्रेट कहना ज्यादा सही है, क्योंकि फोटोग्राफी के शुरुआती दौर की सभी तस्वीरों का रिकॉर्ड आज हमारे पास मौजूद हो, यह मान लेना सही नहीं होगा। ऐसे में यह 1880 के आसपास की तस्वीर है जो सबसे शुरुआती ज्ञात सेल्फी में से एक है।

सेल्फी का विचार नया नहीं, सिर्फ तकनीक नई है

आज सेल्फी का मतलब है, फोन हाथ में, सामने कैमरा और तुरंत तस्वीर। वहीं 1880 के त्रिपुरा में भी इसका मूल विचार लगभग यही था। कैमरा सामने रखा गया। दो लोग फ्रेम में बैठे। शटर किसी तीसरे व्यक्ति ने नहीं दबाया। और अपने ही हाथ से कैमरे को एक्टिव करके तस्वीर बनाई गई। यानी फर्क सिर्फ इतना था कि तब एक तस्वीर के पीछे तकनीक और मेहनत बहुत ज्यादा थी। आज हम सेकंड में तस्वीर बना लेते हैं।

सेल्फी का आविष्कार स्मार्टफोन ने नहीं किया था, उसने सिर्फ पुराने विचार को हमारी जेब में रख दिया। विश्व फोटोग्राफी दिवस पर त्रिपुरा के इस शाही दंपती की करीब 1880 की तस्वीर हमें यही याद दिलाती है कि कैमरे के सामने खुद को रखने की इंसानी इच्छा सोशल मीडिया से बहुत पुरानी है।