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नन्हे कलमकारों की बड़ी सोच: पढ़िए बच्चों द्वारा लिखी प्रेरणादायक कहानियां

किड्स कॉर्नर: चित्र देखो कहानी लिखो 72 …. बच्चों की लिखी रोचक कहानियां परिवार परिशिष्ट (01 अप्रेल 2026) के पेज 4 पर किड्स कॉर्नर में चित्र देखो कहानी लिखो 72 में भेजी गई ये कहानियां सराहनीय रही हैं।

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Apr 10, 2026
किड्स कॉर्नर: चित्र देखो कहानी लिखो 72

दोस्ती की ताकत

अंश बुडानिया
उम्र- 07 वर्ष
वे पहाड़ी की ढलान पर चढ़ने लगे। मुकेश थोड़ा थक गया था, इसलिए किशन ने उसकी मदद की। किशन ने मुकेश को एक लकड़ी की छड़ी दी जिससे वह अपना संतुलन बनाए रख सके। वे दोनों साथ-साथ चढ़ते रहे और पहाड़ी के शीर्ष पर पहुंचने की कोशिश करते रहे। रास्ते में उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन दोनों ने हार नहीं मानी। पहाड़ी के शीर्ष पर पहुंचकर उन्होंने अपने बैग से पानी की बोतलें निकालीं और थोड़ा आराम किया। उन्होंने अपने अनुभव साझा किए और एक-दूसरे की मदद करने के महत्व को समझा। उन दोनों ने महसूस किया कि दोस्ती में शक्ति होती है और एक-दूसरे की मदद करने से मुश्किलें आसान हो जाती हैं। वे अपने अनुभव से सीखकर आगे के लिए तैयार हो गए और हमेशा एक-दूसरे के साथ रहने का फैसला किया। इस तरह मुकेश और किशन ने अपनी दोस्ती को मजबूत बनाया और जीवन के लिए एक महत्वपूर्ण सबक सीखा
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मेहनत और साथ

अंशा
उम्र- 10 वर्ष
एक दिन दो दोस्त पहाड़ पर घूमने निकले। वे दोनों बहुत उत्साहित थे और अपने बैग में खाने-पीने का सामान लेकर आए थे। आगे चल रहा लड़का डंडे की मदद से रास्ता देख रहा था, जबकि पीछे वाला उसका साथ दे रहा था। रास्ता थोड़ा कठिन था, लेकिन दोनों ने हिम्मत नहीं छोड़ी। चलते-चलते उन्हें सुंदर पत्थर और पेड़-पौधे दिखे। वे रुककर थोड़ा आराम भी करते। आखिरकार वे पहाड़ की चोटी पर पहुंच गए। वहां से नजारा बहुत सुंदर था। दोनों खुश हुए और उन्होंने सीखा कि मेहनत और साथ से हर मुश्किल आसान हो जाती है।

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दो मित्रों का साहस

आकांक्षा गौर
उम्र- 08 वर्ष
आर्यन और राहुल ने मिलकर एक ऊंचे और कठिन पहाड़ पर चढ़ने का फैसला किया। कंधे पर सामान के बैग और हाथ में सहारा देने वाली लाठी लिए वे पथरीले रास्तों पर बढ़ते रहे। रास्ता मुश्किल था और चढ़ाई खड़ी, लेकिन दोनों ने एक-दूसरे का हौसला बढ़ाना नहीं छोड़ा। अपनी मेहनत और अटूट एकता के बल पर वे अंततः शिखर तक पहुंच गए। चोटी पर पहुंचकर उन्हें जो सुकून मिला, उसने साबित कर दिया कि दृढ़ निश्चय और सही साथ हो, तो हर मुश्किल लक्ष्य को पाया जा सकता है।

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प्रकृति की सुंदरता

मितांश पोटर
उम्र- 07 वर्ष
एक शहर में दो घनिष्ठ मित्र मिंकू और प्रिंस आस-पास ही रहते थे और एक ही विद्यालय में पढ़ते थे। दोनों की सर्दियों की छुट्टियां शुरू हो गई थीं। दोनों घर में बैठे-बैठे ऊब रहे थे, तो उन्होंने एक दिन सोचा कि अपने घर के पास वाली पहाड़ी पर चलते हैं। अगले दिन सुबह जल्दी उठकर, नहा-धोकर और तैयार होकर दोनों निकल गए। दोनों को रास्ते भर चिड़ियों के चहकने की आवाज आती रही और खूब सारे मोर भी दिखे। पहाड़ी पर जाने के लिए उन्होंने अपने साथ खाना और पानी भी रख लिया था। वे दोनों बहुत जोश और हिम्मत से चलते-चलते आखिरकार पहाड़ी के ऊपर पहुंच ही गए। उन्होंने वहां खूब मस्ती की और पहाड़ी से पूरे शहर का खूबसूरत नजारा भी देखा। दोनों का मन प्रकृति ने मोह लिया था। वाकई प्रकृति के बीच रहकर ताजगी का एहसास होता है और वास्तविकता में खुशी मिलती है। हमें इसे संवारना चाहिए।
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हिम्मत और दोस्ती


आलिंद अग्रवाल
उम्र- 08 वर्ष
एक दिन दो दोस्त, राहुल और मोहित, पहाड़ पर घूमने गए। दोनों ने अपने-अपने बैग पहने और हाथ में लाठी लेकर चढ़ाई शुरू की। रास्ता थोड़ा कठिन था, लेकिन दोनों बहुत खुश थे। राहुल आगे-आगे चल रहा था और मोहित उसके पीछे। राहुल बोला, “डर मत, मैं हूं ना!” मोहित मुस्कुराया और बोला, “हम दोनों मिलकर चढ़ाई पूरी करेंगे।” रास्ते में उन्हें छोटे-छोटे पत्थर और पौधे दिखे। कभी-कभी वे रुककर आराम करते और पानी पीते। ऊपर से ठंडी हवा आ रही थी, जिससे उन्हें बहुत अच्छा लग रहा था। आखिरकार, दोनों पहाड़ की ऊंचाई पर पहुंच गए। वहां से नीचे का सुंदर दृश्य दिख रहा था। दोनों बहुत खुश हुए और जोर से बोले, “हमने कर दिखाया!” उस दिन उन्होंने सीखा कि अगर हम हिम्मत और दोस्ती के साथ काम करें, तो कोई भी मुश्किल आसान हो जाती है।

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हौसले की उड़ान

चाहत प्रजापति
उम्र- 09 वर्ष
रोहित और मोहित दो दोस्त थे, जिन्होंने अपनी छुट्टियों में कुछ अलग करने का मन बनाया। उन्होंने पहाड़ चढ़ने का फैसला किया और एक खड़ी चट्टान को चुना। शुरुआत में वे उत्साहित थे, लेकिन जैसे-जैसे वे ऊपर चढ़ते गए, चट्टान अधिक खड़ी और कठिन होती गई। रोहित डर गया, लेकिन मोहित ने उसे प्रोत्साहित किया और कहा, "तुम कर सकते हो, रोहित! बस एक बार में एक कदम उठाओ।" धीरे-धीरे वे चोटी के करीब पहुंच गए और एक अद्भुत दृश्य देखा। पूरा शहर उनके सामने फैला हुआ था और उन्होंने अपनी जीत का जश्न मनाया। इस यात्रा से उन्होंने सीखा कि डर को हराने के लिए दृढ़ संकल्प और दृढ़ता की जरूरत होती है। हमें चुनौतियों का सामना करना चाहिए और हार नहीं माननी चाहिए।

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पहाड़ की सैर और शेर


हनी सोनी
उम्र- 10 वर्ष
सोनू और मोनू दो दोस्त सैर-सपाटा करने पहाड़ पर घूमने चले। वे अपने साथ छड़ी, बैग और खाना लेकर पहाड़ पर चढ़ने लगे। दोनों दोस्तों ने पहाड़ पर गाना गाया, खूब मजे से खाना खाया और अपनी-अपनी मस्ती में नाचे-गाए। बाद में वे थक गए और वापस चलने लगे। रास्ते में चलते-चलते अचानक उनके सामने एक शेर आ गया। शेर से डरकर एक दोस्त पेड़ पर चढ़ गया और दूसरा ज़मीन पर लेट गया। ज़मीन पर लेटे हुए को देखकर शेर ने सोचा कि वह मर गया है और उसने पेड़ वाले को देखा नहीं। इसके बाद शेर वहां से चला गया।

शेर के जाने के बाद दोनों खुशी से एक-दूसरे के पास आए। वे अपनी जान बचने की खुशी में नाचे-गाए और सुरक्षित अपने घर लौट गए।इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि कभी भी घूमने जाएं तो ग्रुप में या परिवार के साथ जाएं। अकेले जाने से दुर्घटना हो सकती है और नुकसान भी हो सकता है।

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साहस और मित्रता का सफर


दृषिता गुर्जर
उम्र- 11 वर्ष
एक सुहाने दिन दो मित्र, रोहन और आर्यन पहाड़ों की ‌‍सैर पर निकले। रोहन ने अपनी पीठ पर एक भारी बैग टांगा हुआ था, जिसमें उनकी जरूरत का सारा सामान था। जैसे-जैसे वे ऊंचाई पर चढ़ते गए, रास्ता कठिन और पथरीला होता गया। एक जगह पर रास्ता काफी फिसलन भरा था। रोहन का पैर अचानक डगमगाया, लेकिन आर्यन ने तुरंत अपना हाथ आगे बढ़ाया और उसे सहारा देकर संभाल लिया। दोनों ने मिलकर तय किया कि वे एक-दूसरे का साथ कभी नहीं छोड़ेंगे। कुछ देर चलने के बाद वे एक टीले पर पहुंचे, जहां से नजारा बेहद खूबसूरत था। वहां ताज़ा हवा और हरियाली देखकर उनकी सारी थकान मिट गई। इस यात्रा ने उन्हें सिखाया कि जीवन की राह में चाहे कितनी भी मुश्किलें आएं, यदि हमारे साथ सच्चे मित्र और मन में साहस हो, तो हम किसी भी शिखर को छू सकते हैं।

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पहाड़ की रोमांचक यात्रा


कार्तिक गोरछिया
उम्र- 13 वर्ष

रविवार की सुबह दो दोस्त आरव और मयंक पास के पहाड़ पर चढ़ाई करने निकल पड़े। दोनों के पास ज़रूरी सामान से भरे बैग थे और आरव के हाथ में संतुलन बनाने के लिए एक छड़ी थी। रास्ता ऊबड़-खाबड़ था, लेकिन आसपास की सुंदरता और पक्षियों की चहचहाहट उन्हें तरोताज़ा कर रही थी। रास्ते में रुककर थोड़ा आराम करने के बाद, वे आखिरकार पहाड़ की चोटी पर पहुंच गए। वहां से पूरा गांव बेहद खूबसूरत दिख रहा था। अपनी मंजिल पर पहुंचकर दोनों को बहुत गर्व महसूस हुआ। आरव ने मुस्कुराते हुए कहा, “मेहनत का फल कितना मीठा होता है!” इस रोमांचक यात्रा ने उन्हें न सिर्फ साहस और धैर्य का महत्व सिखाया, बल्कि उनकी दोस्ती को भी और मजबूत कर दिया। दोनों ने तय किया कि वे आगे भी ऐसी कई यात्राएं साथ करेंगे।

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सच्ची दोस्ती

कनिष्का मीणा
उम्र- 09 वर्ष
रोहन और राहुल दो अच्छे दोस्त थे जो हर रोज साथ में स्कूल जाते थे। एक दिन अचानक राहुल का पैर फिसल गया और वह गिर गया। रोहन ने जल्दी से उसकी मदद की और उसे उठाने में सहायता की। "क्या हुआ, राहुल? तुम ठीक हो?" रोहन ने पूछा। राहुल ने कहा, "मेरा पैर दर्द कर रहा है, रोहन। मैं चल नहीं पा रहा हूं।" रोहन ने सोचा और फिर कहा, "चलो, मैं तुम्हें स्कूल ले चलूंगा। तुम मेरे कंधे पर हाथ रखो।"
राहुल ने रोहन का कंधा पकड़ लिया और रोहन ने उसे सहारा देकर स्कूल की ओर चलना शुरू किया। रास्ते में राहुल ने रोहन से कहा, "धन्यवाद, रोहन। तुम मेरे अच्छे और सच्चे दोस्त हो।" रोहन ने मुस्कुराते हुए कहा, "अरे! दोस्तों के लिए तो यह करना पड़ता है।" जब वे स्कूल पहुंचे तो टीचर ने उनकी बात सुनी और रोहन की बहुत प्रशंसा की। रोहन को अच्छा लगा कि उसने अपने दोस्त की मदद की। इस घटना ने रोहन और राहुल की दोस्ती को और भी मजबूत बना दिया। वे जानते थे कि वे एक-दूसरे के लिए हमेशा तैयार हैं।
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हिम्मत और दोस्ती की जीत


नकाश
उम्र- 08 वर्ष
एक दिन राहुल और मोहित ने पहाड़ पर चढ़ने का निश्चय किया। दोनों अच्छे दोस्त थे और रोमांच पसंद करते थे। सुबह-सुबह वे अपने बैग लेकर निकल पड़े। रास्ता कठिन था, जगह-जगह पत्थर और फिसलन थी, लेकिन उनका हौसला मजबूत था। राहुल आगे-आगे डंडे के सहारे रास्ता बनाता जा रहा था और मोहित उसके पीछे-पीछे चल रहा था। चलते-चलते अचानक मोहित का पैर फिसल गया। वह घबरा गया, लेकिन राहुल ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया और उसे संभाल लिया। मोहित ने राहत की सांस ली और राहुल का धन्यवाद किया।
थोड़ी देर आराम करने के बाद दोनों ने फिर चढ़ाई शुरू की। इस बार वे और सावधानी से आगे बढ़े। आखिरकार, मेहनत और धैर्य के बाद वे पहाड़ की चोटी पर पहुंच गए। ऊपर से दिखाई देने वाला सुंदर दृश्य देखकर उनकी सारी थकान दूर हो गई। दोनों ने खुशी-खुशी एक-दूसरे को गले लगाया। उन्हें समझ आ गया कि सच्ची दोस्ती और हिम्मत से कोई भी मुश्किल आसान हो सकती है।

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दो साहसी दोस्त और पहाड़ी का रहस्य


मान्यता गुर्जर
उम्र- 11 वर्ष
मेरा नाम युवराज है और मेरे सबसे अच्छे दोस्त का नाम भानु है। हमें बचपन से ही एडवेंचर और नई जगहों को खोजने का बहुत शौक है। गर्मियों की छुट्टियों में, हमने तय किया कि हम अपने गांव के पीछे वाली ऊंची पहाड़ी पर चढ़ेंगे, जिसे सब 'रहस्यमयी पहाड़ी' कहते थे। तैयारी के लिए हमने अपने स्कूल बैग्स में कुछ जरूरी सामान जैसे पानी की बोतल, बिस्कुट, एक टॉर्च और एक नक्शा रख लिया। भानु ने एक मजबूत लाठी भी ले ली ताकि चढ़ाई के दौरान सहारा मिल सके। जब हम सुबह-सुबह निकले, तो ठंडी हवा चल रही थी और पक्षियों की चहचहाहट सुनाई दे रही थी। जैसे-जैसे हम ऊपर चढ़ रहे थे, रास्ता कठिन होता जा रहा था। रास्ते में बड़े-बड़े पत्थर और कंटीली झाड़ियां थीं, लेकिन हमने हार नहीं मानी। भानु आगे चल रहा था और अपनी लाठी से रास्ता साफ कर रहा था। अचानक, हमें झाड़ियों के पीछे से कुछ चमकता हुआ दिखाई दिया।

जब हम पास पहुंचे, तो देखा कि वहां एक पुरानी गुफा थी, जिसके बाहर सुंदर नीले फूल खिले थे।
हमें डर तो लगा, लेकिन हमारी जिज्ञासा ज्यादा थी। हमने गुफा के अंदर झांका और पाया कि वहां से गांव का नज़ारा बहुत ही खूबसूरत दिख रहा था। हमने वहां बैठकर बिस्कुट खाए और ढेर सारी बातें कीं। उस दिन हमने सीखा कि अगर हम साथ हों और हिम्मत न हारें, तो हम किसी भी ऊंचाई को छू सकते हैं। शाम होने से पहले हम खुशी-खुशी घर लौट आए। यह हमारी जिंदगी का सबसे यादगार साहसिक सफर था!

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अनमोल और समीर का रोमांच

धर्मेंद्र भाकर
उम्र- 10 वर्ष
अनमोल और समीर दो दोस्त थे, जो बचपन से ही रोमांच के शौकीन थे। एक दिन उन्होंने पास के पहाड़ की चोटी तक जाने का फैसला किया। यह एक चुनौतीपूर्ण चढ़ाई थी। दोनों दोस्तों ने एक-दूसरे का साथ देने का वादा किया और चढ़ाई के दौरान आने वाली हर बाधा का डटकर सामना किया। कई घंटे की कड़ी मेहनत के बाद, वे अंततः पहाड़ की चोटी पर पहुंच गए। वहां से घाटी का नजारा बहुत मनमोहक था और उन्हें अपनी उपलब्धि पर बहुत गर्व महसूस हुआ।

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हिम्मत और मेहनत


आराध्या
उम्र- 12 वर्ष
एक दिन दो दोस्त, राहुल और मोहन, पहाड़ पर घूमने निकले। दोनों के कंधों पर बैग थे और वे बहुत उत्साहित थे। रास्ता आसान नहीं था, कहीं पत्थर थे, तो कहीं फिसलन भरी ढलान। राहुल आगे-आगे चल रहा था और हाथ में डंडा लेकर रास्ता देख रहा था, ताकि सुरक्षित चल सके। मोहन उसके पीछे-पीछे सावधानी से कदम रख रहा था। चलते-चलते मोहन थक गया और रुकने लगा, लेकिन राहुल ने उसे हिम्मत दी और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। दोनों ने हार नहीं मानी और धीरे-धीरे चढ़ते रहे। आखिरकार वे पहाड़ की ऊंचाई पर पहुंच गए। वहां से सुंदर दृश्य देखकर उनकी सारी थकान दूर हो गई और वे बहुत खुश हुए।

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सफलता की सीढ़ी


मयंक मंसुरिया
उम्र- 09 वर्ष
रोहन और सोहन नाम के दो मित्र थे जो पहाड़ियों में बसे एक छोटे से गांव में रहते थे। उनको शहर जाने के लिए एक दुर्गम पहाड़ी से गुजरना पड़ता था। दोनों को स्कूल की किताबें लाने के लिए शहर जाना था। दोनों मित्र घर से तैयारी करके शहर के लिए निकल पड़ते हैं। जैसे ही वे पहाड़ी की चढ़ाई शुरू करते हैं, तब सोहन, रोहन से पूछता है कि "क्या हम इस पहाड़ी को पार कर पाएंगे?" तब आगे चल रहा रोहन, सोहन से कहता है कि "जीवन में विकट परिस्थितियों पर विजय पाना ही सच्ची सफलता है।" इसी जज्बे और जुनून के साथ दोनों मित्र उस पहाड़ी को पार कर लेते हैं और शहर पहुंच जाते हैं।

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एक साहसिक पर्वत यात्रा

सारा अरोड़ा
उम्र- 13 वर्ष
एक सुबह, दो दोस्त रोहन और अमन ने पहाड़ों पर घूमने का निश्चय किया। मौसम सुहाना था और चारों ओर ताजी हवा चल रही थी। दोनों ने अपने बैग में खाना, पानी और जरूरत का सामान रखा। रोहन अपने साथ एक डंडा ले गया ताकि चढ़ाई में सहारा मिल सके। जैसे-जैसे वे ऊपर चढ़ते गए, रास्ता कठिन और फिसलन भरा होता गया। अमन थोड़ा थक गया, लेकिन रोहन ने उसे हिम्मत दी और कहा, "हिम्मत मत हारो, हम जल्द ही ऊपर तक पहुंच जाएंगे।" अमन ने भी हिम्मत जुटाई और दोनों आगे की ओर बढ़ते रहे। अचानक अमन का पैर फिसल गया। वह गिरने ही वाला था कि रोहन ने उसका हाथ पकड़ कर उसे बचा लिया। अमन ने रोहन को धन्यवाद दिया और समझ गया कि सच्चा दोस्त वही होता है जो हर मुश्किल में साथ दे। कुछ समय बाद, दोनों पहाड़ की चोटी पर पहुंच गए। ऊपर से दृश्य बहुत सुंदर था, हरे-भरे पेड़, दूर तक फैली घाटियां और नीला आसमान। उनकी सारी थकान दूर हो गई और वे खुशी से भर गए।

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वंश और कौशल की साहसी यात्रा


मानविका
उम्र- 13 वर्ष
वंश और कौशल बचपन के पक्के दोस्त थे, जिन्हें नई जगहों की सैर करना और रोमांचक काम करना बहुत पसंद था। एक सुहावनी सुबह, दोनों ने मिलकर गांव के पास वाली ऊंची पहाड़ी पर चढ़ने का मन बनाया। अपने कंधों पर भारी बस्ते टांगे और हाथों में मज़बूत लकड़ियां थामे, उन्होंने जोश के साथ अपनी चढ़ाई शुरू की। रास्ता पथरीला और ऊबड़ - खाबड़ था, जिससे कई बार उनके पैर फिसले, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। जब भी कौशल थककर रुकता, वंश उसका हाथ थामकर उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा देता। एक-दूसरे का सहारा बनते हुए और अपनी थकान को भूलकर, दोनों आखिरकार पहाड़ी की चोटी पर पहुंच गए। वहां से पूरी घाटी का सुंदर नजारा देखकर उनकी सारी थकान मिट गई। इस यात्रा ने उन्हें सिखाया कि यदि मन में दृढ़ निश्चय और साथ में एक सच्चा मित्र हो, तो जीवन की किसी भी कठिन चढ़ाई को आसानी से पार किया जा सकता है।
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सपना हुआ सच


आध्या शर्मा
उम्र- 08 वर्ष
एक बार की बात है, दो भाई थे मयंक और प्रकाश। वे भूखे थे और उन्होंने खाना भी नहीं खाया था, फिर भी वे एक ऊंचे पहाड़ पर चढ़ रहे थे। चढ़ते समय मयंक ने कहा कि वे दोनों भाई अपने साहस से अपना नाम रोशन करेंगे। उन्होंने ठान लिया कि वे अपने सपने को पूरा करने के लिए जी-जान लगा देंगे। शुरुआत में उन्हें बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन जब उन्होंने पक्का इरादा कर लिया कि वे यह करके दिखाएंगे, तो अंततः उन्होंने आसानी से अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया। इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि यदि हम सच्ची मेहनत और लगन से काम करें, तो कोई भी सपना सच किया जा सकता है।
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अनमोल और समीर की चढ़ाई


कविता देवासी
उम्र- 10 वर्ष
अनमोल और समीर दो दोस्त थे। एक धूप वाले दिन, उन्होंने पास की एक पहाड़ी पर चढ़ने का फैसला किया। दोनों ने अपने-अपने बैग पैक किए, पानी की बोतलें लीं और मजबूत जूते पहन लिए। अनमोल ने संतुलन बनाने के लिए एक लंबी छड़ी भी ले ली। चढ़ाई आसान नहीं थी। रास्ता ऊबड़-खाबड़ था, कहीं बड़े पत्थर थे तो कहीं सूखी घास। समीर थोड़ा थक गया, लेकिन अनमोल ने उसका हौसला बढ़ाया। वे धीरे-धीरे, एक-दूसरे का साथ देते हुए आगे बढ़ते रहे। अनमोल अपनी छड़ी की मदद से मुश्किल रास्तों को पार करता और समीर को रास्ता दिखाता। इस यात्रा ने उन्हें सिखाया कि दोस्ती और दृढ़ संकल्प से किसी भी मुश्किल लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है।

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चढ़े पहाड़, बने मिसाल


विधि मारू
उम्र- 08 वर्ष
दो दोस्त थे, एक का नाम राम था और दूसरे का नाम श्याम। एक दिन वे दोनों एक ऊंचे पहाड़ पर चढ़ रहे थे। राम के पास सहारा लेने के लिए एक लकड़ी थी, लेकिन श्याम के पास कोई सहारा नहीं था। जब वे पहाड़ पर चढ़ाई कर रहे थे, तब राम ने लकड़ी की मदद से अपना संतुलन बनाया और सफलतापूर्वक चढ़ाई पूरी कर ली। वहीं दूसरी ओर, श्याम के पास सहारा न होने के कारण उसका पैर फिसल गया और वह लुढ़क गया। इस तरह राम ने अपनी समझदारी और सही तैयारी से एक मिसाल बनाई।

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कड़ी मेहनत का मीठा फल


दिलप्रीत रोजवाल
उम्र- 08 वर्ष
रामपुर गांव में दो मित्र रहते थे राम और श्याम। दोनों में बहुत गहरी मित्रता थी और वे हमेशा साथ ही स्कूल जाया करते थे। उनका स्कूल पहाड़ी के दूसरी पार था, जिसके लिए उन्हें हर दिन कठिन चढ़ाई करनी पड़ती थी। कड़ी मेहनत से दोनों मित्र पहाड़ी चढ़कर स्कूल पहुंचते और फिर पांच घंटे की पढ़ाई के बाद घर लौटते थे। वे पढ़ने में बहुत तेज थे और कभी अपनी क्लास नहीं छोड़ते थे। जब उनका रिजल्ट आया, तो उनके माता-पिता की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। स्कूल दूर होने और रोजाना की कठिन चढ़ाई के बावजूद दोनों बच्चे फर्स्ट डिवीजन से पास हुए। उनके माता-पिता ने पूरे गांव में मिठाई बांटी और उनकी मेहनत की सराहना की।

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दोस्ती का सफर

वैभव बैरागी
उम्र- 12 वर्ष
दो दोस्त, राज और अमन, एक पहाड़ी यात्रा पर निकले थे। वे एक ऊंचे पहाड़ पर चढ़ना चाहते थे। रास्ते में अमन को बहुत थकावट हुई और वह आगे बढ़ने में असमर्थ हो गया। राज ने अपने दोस्त की स्थिति देखी और उसकी मदद की। उसने अमन को प्रोत्साहित करते हुए कहा, "चलो दोस्त, हम साथ मिलकर इस पहाड़ को जीतेंगे!" राज ने अमन का हाथ पकड़ा और उसे ऊपर चढ़ने में पूरी सहायता की। दोनों ने अपनी अटूट दोस्ती और साहस के बल पर पहाड़ की चोटी पर पहुंचकर विजय प्राप्त की।

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दो भाइयों का अनमोल प्यार


नित्य अग्रवाल
उम्र- 08 वर्ष
सोनू और मोनू दो भाई थे। सोनू को पहाड़ चढ़ना बहुत पसंद था, लेकिन मोनू को नहीं। एक बार दोनों पहाड़ों पर घूमने गए। कुछ देर चलने के बाद, अभ्यास न होने के कारण सोनू के पैरों में दर्द होने लगा, जबकि मोनू बड़ी आसानी से चल रहा था। सोनू ने जब यह बात मोनू को बताई, तो मोनू चिंतित हो गया। उसने हार नहीं मानी और भाई को अपने कंधों पर उठाकर चलने लगा। एक घंटे बाद मोनू के कंधों में भी दर्द शुरू हो गया। जब सोनू को यह पता चला, तो उसने खुद को संभाला और सहारा लेकर चलने लगा। जब दर्द ठीक हुआ, तो दोनों फिर से उत्साह के साथ आगे बढ़े। इस प्रकार एक-दूसरे की मदद करते हुए वे अपने लक्ष्य तक पहुंच गए।
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हिम्मत और दोस्ती की जीत


ओजस गुप्ता
उम्र- 08 वर्ष
राहुल और अमित नाम के दो दोस्त पहाड़ पर चढ़ने निकले। दोनों को रोमांच पसंद था, इसलिए वे सुबह-सुबह ज़रूरी सामान लेकर यात्रा पर निकल पड़े। पहाड़ की चढ़ाई आसान नहीं थी; रास्ता पत्थरों से भरा और फिसलन भरा था। राहुल डंडे के सहारे संतुलन बनाकर चल रहा था, जबकि अमित सावधानी से उसके पीछे था। चलते-चलते अमित थक गया और डरने लगा। उसने कहा, “शायद मैं आगे नहीं जा पाऊंगा।” राहुल ने मुस्कुराकर कहा, “डरो मत, मैं तुम्हारे साथ हूं।” राहुल की बात से अमित का हौसला बढ़ा और दोनों साथ मिलकर चोटी पर पहुंच गए। उन्होंने सीखा कि मुश्किल रास्तों में हिम्मत और सच्ची दोस्ती ही सबसे बड़ा सहारा होती है।
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मेहनत का फल मीठा होता है


गार्गी चौधरी
उम्र- 08 वर्ष
दीपू और चीकू बहुत मेहनती भाई थे। एक दिन उन्होंने पहाड़ पर चढ़ने का निर्णय लिया। उन्होंने यात्रा शुरू की और कई दिनों तक कोशिश करते रहे। उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अंततः चोटी फतह कर ली। बड़े होकर उन्होंने विदेश जाकर नौकरी करने का सपना देखा। शुरुआत में उन्हें काम ढूंढने में बहुत कठिनाई हुई, लेकिन वे प्रयास करते रहे। अपनी मेहनत और लगन के बल पर वे दोनों भाई अलग-अलग जिलों के जिलाधीश बने। यह कहानी सिखाती है कि निरंतर प्रयास से कोई भी बड़ा लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
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साथ का मजा


रत्नेश शर्मा
उम्र- 13 वर्ष
राहुल और आर्यन नाम के दो पक्के दोस्त एक पथरीले पहाड़ की चढ़ाई करने निकले। सूरज तेज था और रास्ता कठिन। अचानक आर्यन का पैर फिसला और उसे चोट लग गई। थककर उसने कहा, "राहुल, तुम आगे बढ़ो, मैं नहीं चल पाऊंगा।" राहुल ने उसका हाथ पकड़कर कहा, "दोस्त, मंजिल की खूबसूरती साथ देखने में ही मजा है।" राहुल ने आर्यन का कुछ सामान खुद ले लिया और उसे सहारा देकर आगे बढ़ाने लगा। आखिरकार वे शिखर पर पहुंच गए। ठंडी हवा और सुंदर नजारा देखकर उनकी थकान मिट गई। उन्होंने सीखा कि एकता और धैर्य ही सफलता की असली कुंजी है।
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लगन की शक्ति


भव्य कासवान
उम्र- 07 वर्ष
हनु और राम पहाड़ी इलाके में रहते थे। वे अक्सर लोगों को पहाड़ की चोटी पर चढ़ते देखते और उनका भी मन करता, पर छोटे होने के कारण वे असफल हो जाते। बड़े होने पर उन्होंने अपने शिक्षक से सही सलाह ली। पूरी जानकारी एकत्र कर उन्होंने बैग, डंडा और जूते तैयार किए और चढ़ाई शुरू की। सही तैयारी और लगन के कारण इस बार वे सफल रहे। इससे हमें यह शिक्षा मिलती है कि यदि मन में लगन हो और तैयारी सही हो, तो कोई भी कार्य आसानी से किया जा सकता है।
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दोस्ती और हिम्मत का सफर


भव्या यादव
उम्र- 13 वर्ष
राहुल और अमित को रोमांच बहुत पसंद था। एक दिन उन्होंने ऊंचे पहाड़ की चोटी पर चढ़ने का फैसला किया। सफर आसान नहीं था, रास्ता पथरीला था। राहुल लकड़ी की छड़ी के सहारे और अमित के हौसले के साथ आगे बढ़ता रहा। कई बार वे थके, लेकिन एक-दूसरे को देखकर फिर से हिम्मत जुटा लेते। सूरज की तपिश के बावजूद वे नहीं रुके और अंततः चोटी पर पहुंच गए। वहां की ताजा हवा ने उन्हें एहसास कराया कि जब मिलकर काम करते हैं, तो कोई भी मुश्किल लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
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पहाड़ की डगर और बचपन के तेवर


कार्तिक
उम्र- 11 वर्ष
कार्तिक और विहान दो दोस्त थे। एक दिन पहाड़ी पर चढ़ते समय कार्तिक के जूते का तलवा टूट गया, जिससे वह झुंझला उठा। उसे लगा कि शहर के बच्चे तो वैन में स्कूल जाते हैं और उन्हें यहां पसीना बहाना पड़ता है। विहान ने उसे समझाया, "वैन में बैठने वाले सिर्फ रास्ता तय करते हैं, पर हम रास्ता बनाते हैं।" विहान की बातों ने कार्तिक में नया जोश भर दिया। उसने महसूस किया कि यह कठिन चढ़ाई उन्हें जीवन की बड़ी परीक्षाओं के लिए तैयार कर रही है। दोनों हंसते-खेलते और एक-दूसरे को चुनौती देते हुए अपनी मंज़िल की ओर बढ़ गए।
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मातृ-भक्ति और साहस की जीत


भाविका शर्मा
उम्र- 13 वर्ष

रवि और आर्यन दो भाई थे, जो एक छोटे से गांव में रहते थे। एक बार उनकी मां की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई। गांव के वैद्य जी ने जांच के बाद कहा, "इनकी हालत गंभीर है। यदि तुम लोग इस ऊंचे पहाड़ की चोटी पर उगने वाली दुर्लभ जड़ी-बूटी सूर्यास्त से पहले ला सको, तो ही तुम्हारी मां की जान बच सकती है।"अपनी मां की जान बचाने के लिए दोनों भाइयों ने बिना डरे पहाड़ की कठिन चढ़ाई शुरू कर दी। रास्ता बहुत पथरीला और फिसलन भरा था। रवि छोटा था और जल्दी थक गया, लेकिन आर्यन ने उसका हौसला बढ़ाते हुए उसे सहारा दिया। वह बोला, "भाई, हमें रुकना नहीं है, मां हमारा इंतजार कर रही हैं।"
थकान और डर को पीछे छोड़ते हुए, दोनों भाई एक-दूसरे का हाथ थामकर चोटी तक पहुंचे और सही समय पर जड़ी-बूटी लेकर लौटे। वैद्य जी ने दवा बनाई और मां की जान बच गई। उस दिन गांव वालों ने देखा कि भाइयों के अटूट प्रेम और साहस के सामने पहाड़ की ऊंचाई भी छोटी पड़ गई।
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साहस और मित्रता की जीत


ख्याति गुर्जर
उम्र- 11 वर्ष
अर्जुन और विजय एक रोमांचक यात्रा पर निकले। पहाड़ का रास्ता कठिन था। अचानक रास्ता और खतरनाक हो गया, जिससे विजय डर गया। अर्जुन ने उसे समझाया, "डर को हावी मत होने दो, हम साथ हैं।" दोनों ने हिम्मत जुटाई और धीरे-धीरे कदम बढ़ाते रहे। कई बार फिसलने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी। आखिरकार वे चोटी पर पहुंचे और वहां का सुंदर दृश्य देखकर विजय खिल उठा। उसने सीखा कि साहस और सच्ची मित्रता से हर कठिनाई को पार किया जा सकता है।

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मित्रता और समय


आरिका भारद्वाज
उम्र - 9 वर्ष
राहुल और रोहित हर रविवार साथ घूमने जाया करते थे, लेकिन कुछ समय बाद रोहित व्यस्तता के कारण हर बार टालने लगा। धीरे-धीरे उनकी बातचीत कम हो गई। बहुत समय बाद जब वे फिर से पहाड़ियों पर गए, तो उन्हें पहले जैसा उत्साह महसूस नहीं हुआ। उन्हें एहसास हुआ कि साथ समय न बिताने से उनकी दोस्ती कमजोर हो गई है। उन्होंने तय किया कि वे हर रविवार जरूर मिलेंगे। सच्ची दोस्ती के लिए समय देना बहुत ज़रूरी है, तभी रिश्ते मजबूत रहते हैं।

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रेतीले धोरों का सबक


जिया पारीक
उम्र- 07 वर्ष
स्कूल की छुट्टी के बाद दो भाई राजस्थानी धोरों की ओर निकल पड़े। बड़े भाई के हाथ में लकड़ी थी, जबकि छोटा भाई उसके पीछे था। रेत पर चढ़ना कठिन था, पैर बार-बार फिसल रहे थे। छोटा भाई घबरा गया, पर बड़े भाई ने उसका हाथ थाम लिया। जब वे ऊपर पहुंचे, तो सुंदर नजारा देखकर छोटा भाई दंग रह गया। उसने सीखा कि मुश्किल रास्तों पर धैर्य और साथ का बहुत महत्व होता है। एक-दूसरे का सहारा बनकर कोई भी ऊंचाई हासिल की जा सकती है।
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छोटे लक्ष्य, बड़ी सफलता


रूबल छिंपा
उम्र- 12 वर्ष
मोहन और सोहन नाम के दो मित्र सारा दिन मोबाइल में लगे रहते थे। उनकी मां ने उन्हें बाहर जाकर कुछ नया सीखने को कहा। दोनों घूमते हुए एक पहाड़ के पास पहुंचे और उस पर चढ़ने की कोशिश की। सोहन थक गया, तो मोहन ने उसे समझाया कि यदि हम छोटे-छोटे लक्ष्य बनाकर धीरे-धीरे आगे बढ़ेंगे, तो ऊपर पहुंच सकते हैं। उन्होंने वैसा ही किया और चोटी पर पहुंच गए। उन्हें अपनी मेहनत पर गर्व हुआ। यह कहानी सिखाती है कि छोटे-छोटे कदमों से ही बड़ी सफलता मिलती है।
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समझदार भाई


विधि सिन्हा
उम्र- 09 वर्ष
राहुल और रोहन के पिताजी की तबीयत अचानक खराब हो गई। उनकी मां गांव गई हुई थी। दोनों भाइयों ने तय किया कि वे खुद डॉक्टर को बुलाकर लाएंगे। डॉक्टर का घर पहाड़ी के दूसरी तरफ था। उन्होंने बिना समय गंवाए पहाड़ की कठिन चढ़ाई पार की और डॉक्टर के पास पहुंच गए। डॉक्टर उनके साथ घर आए और सही समय पर इलाज मिलने से पिताजी ठीक हो गए। मुश्किल समय में दोनों भाइयों की समझदारी और साहस ने उनके परिवार को बचा लिया।

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पिता की तलाश


जयवर्धन चौहान
उम्र- 08 वर्ष
बहुत समय पहले, एक लकड़हारा अपने दो बच्चों के साथ रहता था। एक दिन वह जंगल गया और शाम तक वापस नहीं लौटा। बच्चे चिंतित होकर उसे ढूंढने निकल पड़े। जंगल घना और डरावना था, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। सूरज ढलने से पहले उन्होंने अपने पिता को ढूंढ लिया और खुशी-खुशी घर लौट आए। बच्चों की इस हिम्मत ने साबित कर दिया कि परिवार का प्रेम सबसे बड़ी ताकत है।
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खुद में विश्वास रखो


मानवी विश्वकर्मा
उम्र- 10 वर्ष
दो भाई थे, रामू और श्यामू। वे दोनों एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे। एक दिन रामू ने श्यामू से कहा कि "चलो हम पहाड़ों पर ट्रैकिंग करने चलते हैं।" श्यामू ने कहा कि "हम इतनी ऊंचाई पर नहीं पहुंच पाएंगे," तो रामू ने कहा, "हमें खुद में विश्वास रखना चाहिए, हम ऊपर पहुंच जाएंगे।" फिर भी श्यामू नहीं माना। अगले दिन रामू जल्दी उठ गया और तैयार हो गया। श्यामू उठा और देखा कि रामू तैयार हो गया है, तो वह भी उठकर तैयार हो गया। उन्होंने फिर ट्रैकिंग शुरू की। रास्ते में श्यामू रुक गया और कहा कि "यहां ऊपर चढ़ना बहुत मुश्किल है और मैं यह नहीं कर पाऊंगा।" पर रामू चढ़ता गया और कुछ देर में ऊपर पहुंच गया। श्यामू को इससे सीख मिली कि हमें खुद में विश्वास रखना चाहिए।
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एक-दूसरे का साथ


मृणालिका सिंह ठाकुर
उम्र- 09 वर्ष
एक गांव में दो मित्र थे एक का नाम मोहन और दूसरे का नाम साहिल था। दोनों को पहाड़ों की सैर करने एवं सुंदर दृश्य देखने का शौक था। गांव के पास एक सुंदर लंबी, ऊंची एवं मुश्किल पहाड़ी थी। एक दिन उन दोनों ने तय किया कि वे दोनों एक-दूसरे का साथ देकर एवं मिलकर इस सबसे मुश्किल, दुष्कर व कठिन पहाड़ी पर चढ़ेंगे। दोनों ने एक-दूसरे की मदद करके एवं साथ देकर इस कठिन एवं मुश्किल पहाड़ी पर चढ़कर चोटी से सबसे सुंदर एवं मनोहारी नजारा देखा। इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हम साथ-साथ हैं और एक-दूसरे की मदद करें तो हर मुश्किल एवं दुष्कर कार्य को कर सकते हैं और सफलता प्राप्त कर सकते हैं।
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खजाने की खोज


पुष्टि खंडेलवाल
उम्र- 11 वर्ष
एक बार तीन दोस्त - तनु, विहान और लक्ष्य छुट्टियों में पहाड़ों के पास घूमने गए। खेलते-खेलते वे एक पुरानी गुफा तक पहुंच गए। गुफा के अंदर ठंडी हवा चल रही थी और चारों तरफ अंधेरा था। दीवारों पर बने चित्रों को देखकर तनु ने दीवार पर एक निशान देखा और बोली, "यहां कोई राज छुपा है!" तभी लक्ष्य को जमीन पर पड़ा एक फटा कागज मिला। वह एक खजाने का नक्शा था। तीनों ने तय किया कि वे इस रहस्य को सुलझाएंगे। नक्शे के अनुसार उन्हें तीन सुराग ढूंढने थे - जहां पानी झर-झर बहता हो, जहां सूरज की किरणें छुप जाएं और जहां तीन रास्ते मिलें। वे आगे बढ़े और एक छोटी नदी के पास पहुंचे - पहला सुराग मिल गया। फिर वे गुफा के उस हिस्से में गए जहां हल्की रोशनी आ रही थी - दूसरा सुराग भी मिल गया। आखिर में वे एक जगह पहुंचे जहां तीन रास्ते मिल रहे थे। वहां एक पत्थर के नीचे एक छोटा सा संदूक था। उन्होंने मिलकर उसे खोला। उसके अंदर एक चमकदार पत्थर और एक चिट्ठी थी, जिस पर लिखा था - "जो इस खजाने तक पहुंचेगा, वही सच्चा खोजी होगा। असली खजाना वही है जो इतनी चुनौतियों को पार करके यहां तक आया।" तीनों दोस्त बहुत खुश हुए। उन्हें समझ आ गया कि यह सफर ही असली खजाना था।
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बुढ़ी काकी की मदद


विवान शर्मा
उम्र- 07 वर्ष
एक पहाड़ी के उस पार एक बूढ़ी काकी रहती थीं, जो अकेली थीं और उनकी मदद के लिए कोई नहीं था। यह बात एक दिन दो दोस्तों आर्यन और समीर को पता चली। आर्यन और समीर ने तय किया कि वे बूढ़ी काकी की मदद के लिए जाएंगे। वे अपने बैग में खाने का सामान लेकर पहाड़ी पर चढ़ने लगे। पहाड़ी के रास्ते पथरीले और चुनौतीपूर्ण थे, लेकिन उनका उत्साह कम नहीं हुआ। आर्यन ने सहारा लेने के लिए एक मजबूत छड़ी पकड़ी हुई थी, जबकि समीर अपने कंधे पर झोला लिए सावधानी से कदम बढ़ा रहा था। रास्ते में उन्होंने बड़े-बड़े पत्थर और ऊबड़-खाबड़ जमीन पार की। जैसे-जैसे वे ऊपर चढ़ रहे थे, ताजी हवा और चारों ओर की सुंदरता उन्हें और आगे बढ़ने की प्रेरणा दे रही थी। हालांकि चढ़ाई कठिन थी और वे थक रहे थे, लेकिन एक-दूसरे का साथ और कुछ कर दिखाने का जज्बा उन्हें रुकने नहीं दे रहा था। दोनों दोस्त जानते थे कि दूसरों की मदद करना बहुत अच्छा होता है और इससे खुशी मिलती है।
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घमंड की हार, समझदारी की जीत


ईरा भटनागर
उम्र- 07 वर्ष
एक समय की बात है, एक छोटे से गांव में दो दोस्त राम और श्याम रहते थे। राम बहुत विनम्र और सहायक स्वभाव का था। वह हमेशा दूसरों की मदद करने के लिए तैयार रहता था, वहीं श्याम थोड़ा घमंडी था और किसी से मदद लेना उसे पसंद नहीं था। दोनों अच्छे दोस्त थे, इसलिए वे रोज साथ में स्कूल जाते थे। स्कूल जाने के लिए उन्हें एक पहाड़ी के ऊपर से होकर गुजरना पड़ता था। राम लकड़ी (डंडे) की मदद से आसानी और जल्दी पहाड़ी पर चढ़ जाता था, लेकिन श्याम बिना किसी की मदद लिए अकेले ही चढ़ने की कोशिश करता था। इस कारण वह रोज स्कूल देर से पहुंचता और उसे अध्यापक से डांट भी पड़ती थी। एक दिन श्याम को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने समझा कि जरूरत पड़ने पर मदद लेना गलत नहीं होता। इसके बाद उसने घमंड छोड़ दिया और राम की तरह समझदारी से काम लेना शुरू कर दिया।
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साहस और मित्रता की जीत


ख्याति गुर्जर
उम्र- 11 वर्ष
एक सुहावने दिन दो मित्र अर्जुन और विजय रोमांचक यात्रा पर निकल पड़े। उनके मन में उत्साह था और आंखों में नई ऊंचाइयों को छूने का सपना। पहाड़ का रास्ता कठिन और चुनौतीपूर्ण था। अर्जुन आगे बढ़ते हुए अपने डंडे से रास्ता बना रहा था, जबकि विजय उसके पीछे-पीछे चल रहा था। अचानक रास्ता और भी खतरनाक हो गया। विजय डर गया और बोला, "मुझे डर लग रहा है, मैं आगे नहीं बढ़ पाऊंगा।" अर्जुन मुस्कुराया और बोला, "डर को अपने ऊपर हावी मत होने दो, हम साथ हैं - हम जरूर सफल होंगे।" दोनों ने हिम्मत जुटाई और धीरे-धीरे कदम बढ़ाते रहे। कई बार वे फिसले, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उनकी मेहनत, साहस और सच्ची मित्रता ने उन्हें आगे बढ़ने की शक्ति दी। आखिरकार, वे पहाड़ की चोटी पर पहुंच गए। ऊपर से दिखने वाला सुंदर दृश्य उनके लिए किसी इनाम से कम नहीं था। विजय ने खुशी से कहा, "आज मैंने सीखा कि हिम्मत और दोस्ती से हर मुश्किल आसान हो जाती है।"
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रेतीले धोरों का सबक


जिया पारीक
उम्र- 07 वर्ष
स्कूल की छुट्टी के बाद दो भाई अपने बैग लेकर गांव के पास राजस्थानी धोरों की ओर निकल पड़े। बड़े भाई के हाथ में लकड़ी थी और वह रास्ता दिखा रहा था, जबकि छोटा भाई खुशी-खुशी उसके पीछे चल रहा था। धोरों पर चढ़ना आसान नहीं था। रेत बार-बार पैरों से खिसक जाती थी। छोटा भाई थोड़ा घबरा गया और बोला, "भैया, मैं नहीं चढ़ पा रहा।" बड़े भाई ने उसे संभालते हुए कहा, "डर मत, धीरे-धीरे चलो और मेरा हाथ पकड़ लो।" छोटे भाई ने हिम्मत की और दोनों साथ-साथ आगे बढ़ने लगे। कुछ देर में वे ऊपर पहुंच गए। वहां से उन्होंने दूर-दूर तक फैले सुंदर धोरों का नजारा देखा। छोटा भाई खुश होकर बोला, "अगर आप साथ नहीं होते तो मैं कभी यहां तक नहीं पहुंच पाता।" वापस लौटते समय छोटे भाई ने ध्यान रखा कि वह जल्दबाजी न करे और सावधानी से चले। उस दिन दोनों भाइयों को एक बड़ा सबक मिला - मुश्किल रास्ते पर धैर्य, हिम्मत और साथ का बहुत महत्व होता है। अगर हम डरने की बजाय कोशिश करें और एक-दूसरे का सहारा बनें, तो कोई भी ऊंचाई हासिल की जा सकती है।
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छोटे लक्ष्य, बड़ी सफलता


रूबल छिंपा
उम्र- 12 वर्ष
एक दिन की बात है, मोहन और सोहन नाम के दो मित्र घर पर बैठे मोबाइल चला रहे थे। वे दोनों पढ़ाई और खेल से दूर रहते थे। तभी उनकी मम्मी ने उन्हें डांटते हुए कहा कि बाहर जाकर खेलो और कुछ नया सीखो। दोनों दोस्त बाहर गए और घूमते-घूमते एक ऊंचे पहाड़ के पास पहुंच गए। मोहन ने कहा कि क्यों न हम इस पहाड़ पर चढ़ने की कोशिश करें। सोहन पहले तो डर गया, लेकिन बाद में वह मान गया। पहाड़ बहुत ऊंचा था, इसलिए चढ़ना आसान नहीं था। थोड़ी दूर चढ़ने के बाद सोहन थक गया और बोला कि वह आगे नहीं जा सकता। तब मोहन ने उसे समझाया कि अगर हम छोटे-छोटे लक्ष्य बनाकर धीरे-धीरे आगे बढ़ेंगे, तो हम आसानी से ऊपर पहुंच सकते हैं। दोनों ने हिम्मत नहीं हारी और थोड़ा-थोड़ा करके आगे बढ़ते गए। वे बीच-बीच में आराम भी करते रहे। आखिरकार, दोनों पहाड़ की चोटी पर पहुंच गए और बहुत खुश हुए। उन्हें अपनी मेहनत पर गर्व हुआ। इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि छोटे-छोटे लक्ष्य बनाकर हम बड़ी सफलता प्राप्त कर सकते हैं।

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पिता की तलाश


जयवर्धन चौहान
उम्र- 08 वर्ष
बहुत समय पहले की बात है, एक गांव में एक लकड़हारा अपने दो बच्चों के साथ रहता था। एक दिन वह लकड़हारा जंगल में लकड़ी काटने गया। उसने अपने बच्चों से कहा कि वह शाम के सात बजे तक वापस आ जाएगा। शाम के सात बज रहे थे पर वह लकड़हारा नहीं आ पाया। फिर उसके बच्चे लकड़हारे को ढूंढने निकल पड़े। जब वे जंगल के बीच पहुंचे तब उन्होंने उस लकड़हारे को बहुत ढूंढा। जब दिन खत्म होने को आया तब तक उन्होंने उसे ढूंढ लिया और खुशी-खुशी वापस घर चले आए।

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सच्चा मित्र


कृषव लाखोटिया
उम्र- 07 वर्ष
एक दिन दो अच्छे मित्र विजय और सुमित पहाड़ की ओर घूमने निकले। रास्ता बहुत कठिन था, लेकिन विजय हिम्मत के साथ आगे बढ़ रहे थे, हाथ में एक डंडा लेकर वे रास्ता साफ कर रहे थे। जब वे एक घने जंगल के पास पहुंचे, तो अचानक उन्हें दूर शेर की आवाज सुनाई दी। सुमित जल्दी से एक पेड़ पर चढ़ गए, लेकिन विजय पेड़ पर चढ़ना नहीं जानते थे। वे डर के मारे अपनी सांस रोककर जमीन पर वहीं लेट गए। शेर ने उन्हें सूंघा, लेकिन उन्हें मृत समझकर वहां से चला गया। इस प्रकार विजय की जान बच गई और उन्होंने समझा कि सच्चा मित्र वही है, जो मुसीबत में सहायता करता है।

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सपनों की उड़ान


भूमि रावल
उम्र- 10 वर्ष
राहुल और अंकित दो दोस्त थे। उनकी दोस्ती बहुत गहरी थी। वे दोनों एक ही हॉस्टल में रहते थे। खिड़की से वे लोगों को पहाड़ों पर चढ़ते और बादलों में गायब होते देख सकते थे। वे इससे बहुत आकर्षित थे। एक दिन उन्होंने कॉलेज से छुट्टी लेने का फैसला किया और पहाड़ों पर ट्रैकिंग के लिए गए। वहां उन्होंने देखा कि बादलों में गायब हो रहे लोग पर्वतारोही थे। उन्होंने पर्वतारोहियों के कोच से बात की और उनके प्रशिक्षण में शामिल हो गए। अगले ही दिन से उन्होंने प्रशिक्षण शुरू कर दिया। कोच ने उनकी लगन देखी और उन्हें माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई के लिए भेज दिया। वे दोनों अपने शहर और कस्बे में माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाले पहले व्यक्ति बने। इसके बाद समाज में उनका बहुत सम्मान हुआ।
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नन्हे कदम, ऊंचे इरादे


हर्षिता सोनी
उम्र- 13 वर्ष
दो छोटे लड़के थे जिनका नाम आर्यन और अमन था। वे स्वभाव से बहुत जिज्ञासु और साहसी थे। उनके गांव के पास एक बहुत ऊंचा पहाड़ था, जिसकी चोटी हमेशा बादलों से ढकी रहती थी। गांव के लोग कहते थे कि उस पहाड़ पर चढ़ना नामुमकिन है, लेकिन उन दोनों का सपना था कि वे एक दिन पहाड़ की चोटी पर जरूर चढ़ पाएंगे। एक दिन सुबह के समय आर्यन ने अपना छोटा सा बैग उठाया और अमन के साथ पहाड़ की ओर निकल पड़ा। शुरुआत में रास्ता आसान था लेकिन जैसे-जैसे वह ऊपर गया, रास्ता पथरीला और कठिन होता गया। कई बार उसके पैर फिसले, वह गिरा लेकिन उसने हार नहीं मानी और अंत में वह और उसका दोस्त पहाड़ की चोटी पर पहुंच गए। हमें कभी भी हार नहीं माननी चाहिए।

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दोस्ती का हाथ


समिश्रिति शर्मा
उम्र- 07 वर्ष
रमन और श्याम दो गहरे दोस्त थे। एक दिन दोनों ने मिलकर एक ऊंची पहाड़ी पर चढ़ने की ठानी। रास्ता पथरीला और कठिन था, लेकिन उनका उत्साह कम नहीं हुआ। चढ़ते-चढ़ते अचानक श्याम का पैर फिसल गया और वह घबराहट में नीचे की ओर खिसकने लगा। उसे डर था कि वह गिर जाएगा। तभी रमन ने फुर्ती से अपना हाथ आगे बढ़ाया और कहा, "डरो मत श्याम मेरा हाथ पकड़ो!" और उसे ऊपर खींच लिया। श्याम की जान में जान आई। रमन की मदद और हिम्मत की वजह से दोनों ने मिलकर पहाड़ी की चोटी फतह की। उस दिन उन्होंने सीखा कि अगर दोस्त का साथ हो तो हर मुश्किल राह आसान हो जाती है। सच्चा मित्र वही है जो कठिन समय में हाथ थाम ले।
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ट्रैकिंग का रोमांच


दृष्टि
उम्र- 08 वर्ष
दो दोस्त थे मोहन और रोहन। कई दिनों से वे पास की पहाड़ियों पर ट्रैकिंग पर जाना चाह रहे थे। स्कूल की छुट्टियों में वे ट्रिप पर गए। वे ट्रैकिंग का जरूरी सामान भी लेकर गए। जब वे रास्ते में थक गए तो वहां खाना खाया और कुछ देर आराम किया, फिर वापस वे पहाड़ पर चढ़ने लगे और अपनी मंजिल तक पहुंचे। वहां कुछ समय बिताकर घर लौट आए और घर में सबको अपनी ट्रिप के बारे में बताया। वे दोनों बहुत खुश थे।
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सच्ची दोस्ती


अविषा पूनिया
उम्र- 09 वर्ष
एक गांव में दो दोस्त रहते थे। एक का नाम राज था और दूसरे का नाम राम था। राज विकलांग था इसलिए वह चलने के लिए लकड़ी का प्रयोग करता था। उनका स्कूल पहाड़ के उस पार था। एक दिन दोनों स्कूल जा रहे थे। अचानक राज की लकड़ी टूट गई तो राम उसे अपने कंधों पर बिठाकर स्कूल लेकर गया और उसे नई लकड़ी भी दिलाई। फिर जब वे घर आ रहे थे तो राज ने कहा कि तुम ही मेरे असली दोस्त हो।
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Updated on:
10 Apr 2026 03:12 pm
Published on:
10 Apr 2026 02:54 pm
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