
राजस्थान की मिट्टी से उपजी कला की अनूठी कहानी उस गांव की है, जिसने अपनी लोक कला को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई है। यह कहानी केवल कला की नहीं, बल्कि गांव की आत्मा, मेहनत और पहचान की भी है।
राजसमंद जिले की खमनोर तहसील में स्थित मोलेला गांव अपनी मृण-शिल्प (टेराकोटा) कला के लिए मशहूर है। इस कला को मोहनलाल कुम्हार ने निखारा और देश-विदेश में इसकी पहचान बनाई। उन्होंने नदी और खेतों की चिकनी मिट्टी से बिना किसी सांचे के हाथों से आकृतियां बनाईं, जो पर्यावरण के अनुकूल और जीवंत थीं। धीरे-धीरे यह कला गांव से बाहर फैली और विदेशों तक पहुंची। कला गुरु मोहनलाल को 2002 में ‘शिल्पगुरु’ और 2012 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। उनके पुत्र राजेन्द्र कुमार को 2016 में राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ। आज इस कला से लगभग सौ परिवार जुड़े हुए हैं, और मोहनलाल के पौत्र भी इसे आगे बढ़ा रहे हैं।
| स्थान/हाट | खास कला | अंतरराष्ट्रीय पहचान |
|---|---|---|
| मोलेला (राजसमंद) | टेराकोटा मृण-शिल्प | पद्मश्री मोहनलाल कुम्हार, विश्वभर में पहचान |
| बारू (चित्तौड़गढ़) | भांड-कला (स्वांग) | 800 वर्ष पुरानी परंपरा, अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच |
| बागड़ू (जयपुर) | हैंड ब्लॉक प्रिंटिंग | 2024 में GI टैग, कई देशों में निर्यात |
| बहरावती (धौलपुर) | गलीचा निर्माण | कांता देवी ने वैश्विक पहचान दिलाई |
| जयपुर | ब्लू पॉटरी | कृपाल शैली दुनिया भर में प्रसिद्ध |
| शिल्पग्राम (उदयपुर) | ग्रामीण हस्तशिल्प | विदेशी पर्यटकों का प्रमुख आकर्षण |
| अलवर हाट | हस्तशिल्प बाजार | PPP मॉडल से आधुनिक बाजार |
| पुष्कर हाट | लोक शिल्प | कारीगरों को बेहतर मंच |
| जैसलमेर हाट | पारंपरिक कला | पर्यटन से वैश्विक पहुंच |
| नाथद्वारा हाट | स्थानीय हस्तकला | रोजगार और अंतरराष्ट्रीय बाजार से जुड़ाव |
चित्तौड़गढ़ जिले के बारू गांव में भांड-कला (स्वांग) की 800 वर्ष पुरानी परंपरा है, जिसे कभी राजाओं के दरबारों में सम्मान मिलता था। छगनलाल भांड इस कला के प्रमुख हस्ताक्षर हैं, जिनके पिता रामचंद्र भांड उदयपुर दरबार से जुड़े थे। इस कला को गांव से निकाल कर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया गया, लेकिन समय के साथ इसका दायरा सिमटता जा रहा है।
जयपुर के पास बागड़ू कस्बे की पारंपरिक हैंड-ब्लॉक प्रिंटिंग कला, जिसे बागड़ू प्रिंट कहा जाता है, को 2024 में जीआई टैग मिला। यह कला यूके, अमेरिका, जर्मनी, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में निर्यात होती है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध है।
धौलपुर के बहरावती गांव की कांता देवी ने गलीचा निर्माण में अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की है। यह कला पारंपरिक रूप से ईरान से आई थी, लेकिन कांता देवी ने इसे राजस्थान में जीवित रखा और वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाई।
ब्लू पॉटरी की कला में कृपाल सिंह शेखावत ने 1974 में पद्मश्री पुरस्कार प्राप्त किया। उन्होंने नीले रंग के अलावा 25 अन्य रंगों का प्रयोग कर इस कला को नया आयाम दिया। उनकी शैली को ‘कृपाल शैली’ कहा जाता है, और यह कला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध है।
उदयपुर में शिल्पग्राम एक 70 एकड़ का ग्रामीण कला और शिल्प केंद्र है। यहां विभिन्न राज्यों की झोपड़ियां, कलाकारों की जीवंत कारीगरी और हस्तशिल्प का बाजार है। यह हाट-बाजार पारंपरिक ग्रामीण कला को आधुनिक दर्शकों तक पहुंचाता है और अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों को आकर्षित करता है।
राजस्थान सरकार ने हाल ही में चार प्रमुख राज्य स्तरीय हाटों (अलवर, पुष्कर, जैसलमेर, नाथद्वारा) को पीपीपी मॉडल पर संचालित करने की प्रक्रिया शुरू की है। इसका उद्देश्य कारीगरों, बुनकरों, महिला स्वयं सहायता समूहों और छोटे उद्यमियों को बेहतर बाजार, उचित मूल्य और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाना है। इन हाटों में आवास की सुविधा, नियमित मेले, कार्यशालाएं और प्रशिक्षण कार्यक्रम होंगे।
इन गांवों और कारीगरों की कहानी हमें बताती है कि कैसे पारंपरिक कला, जब उसे सही मंच और समर्थन मिले, तो वह गांव की पहचान बन कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चमक सकती है। मोलेला की मिट्टी से बनी मूर्तियां, बारू की भांड-कला, बागड़ू की प्रिंटिंग, धौलपुर की गलीचा, उदयपुर का शिल्पग्राम,हर एक ने अपनी अलग राह बनाई है।
सरकार की योजनाएं जैसे पीपीपी आधारित हाट, इन कलाओं को संरक्षित करने और उन्हें नए बाजारों से जोड़ने में मदद कर रही हैं। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने, पलायन को रोकने और गांवों में रोजगार बढ़ाने का एक ठोस मार्ग है।
बहरहाल,सरपंचों और पंचायतों को चाहिए कि वे स्थानीय कारीगरों की पहचान करें, उन्हें सरकारी योजनाओं से जोड़ें और गांव में छोटे-छोटे हाट या प्रदर्शनियों का आयोजन करें। इससे गांव की कला को नई ऊर्जा मिलेगी और युवा भी इससे प्रेरित होंगे। राजस्थान की मिट्टी में रची-बसी ये कलाएं केवल कला नहीं, बल्कि गांव की आत्मा हैं। जब इन्हें मंच मिलता है, तो वे गांव को पहचान, रोजगार और गर्व प्रदान करती हैं।