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गर्मी से पहले ही सुलगे जंगल! 2025 का रिकॉर्ड फिर दोहराने का डर, बीजापुर सबसे ज्यादा प्रभावित

CG Forest Fire: गर्मी की दस्तक के साथ ही छत्तीसगढ़ के जंगलों में आग की घटनाएं तेजी से बढ़ने लगी हैं। 1 जनवरी से 19 फरवरी 2026 तक राज्य में 205 स्थानों पर आग लग चुकी है।

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Feb 25, 2026
गर्मी से पहले ही सुलगे जंगल! 2025 का रिकॉर्ड फिर दोहराने का डर, बीजापुर सबसे ज्यादा प्रभावित(photo-patrika)

Chhattisgarh Forest Fire: गर्मी की दस्तक के साथ ही छत्तीसगढ़ के जंगलों में आग की घटनाएं तेजी से बढ़ने लगी हैं। 1 जनवरी से 19 फरवरी 2026 तक राज्य में 205 स्थानों पर आग लग चुकी है। केवल फरवरी के शुरुआती 21 दिनों में 45 जगह आग दर्ज हुई, जबकि 21 फरवरी को ही 46 स्थानों पर जंगल सुलग उठे।

वन विभाग के आंकड़े बताते हैं कि इस साल की शुरुआत ने ही खतरे की घंटी बजा दी है। पिछले वर्ष 2025 में रिकॉर्ड 19,063 स्थानों पर आगजनी हुई थी, जो बीते दो दशकों में सर्वाधिक है।

Chhattisgarh Forest Fire: कहां कितनी आग?

सबसे ज्यादा प्रभावित बीजापुर जिला रहा, जहां 16 अलग-अलग स्थानों पर आगजनी की घटनाएं दर्ज की गईं। यह इलाका घने वनों और नक्सल प्रभावित भू-भाग के कारण संवेदनशील माना जाता है, जहां आग पर काबू पाना कई बार चुनौतीपूर्ण हो जाता है। ऊबड़-खाबड़ भौगोलिक स्थिति और सीमित पहुंच के कारण फायर टीमों को कई किलोमीटर पैदल पहुंचकर आग बुझानी पड़ती है।

इसके बाद उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व क्षेत्र में 11 स्थानों पर आग लगी। यह संरक्षित वन क्षेत्र जैव विविधता के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यहां आग लगने से न सिर्फ पेड़-पौधों बल्कि वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को भी खतरा पैदा हो जाता है।

बस्तर में 5 स्थानों पर आग दर्ज की गई, जबकि सारंगढ़-बिलाईगढ़ और रायगढ़ जिलों में 3-3 स्थानों पर जंगल सुलगे। कोंडागांव में 2 स्थानों पर आग की पुष्टि हुई। वहीं धमतरी, धर्मजयगढ़, जांजगीर-चांपा, कोरबा, महासमुंद और रायपुर में 1-1 स्थान पर आगजनी की घटनाएं सामने आईं। वन विभाग के अनुसार, अधिकांश घटनाएं सूखी पत्तियों और घास में लगी आग से शुरू होती हैं, जो तेज हवा के कारण फैलकर बड़े क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लेती हैं।

जमीनी स्तर पर कैसे हो रहा नियंत्रण?

राज्य में तैनात फायर वॉचर्स को पहले से ही संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी के लिए लगाया गया है। ये कर्मचारी सुबह और शाम नियमित गश्त करते हैं। धुआं या आग दिखते ही वायरलेस और मोबाइल के जरिए सूचना कंट्रोल रूम तक पहुंचाई जाती है।

स्थानीय वन ग्राम समितियां भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। ग्रामीणों को फायर लाइन बनाने, झाड़ियों की सफाई और प्रारंभिक स्तर पर आग बुझाने का प्रशिक्षण दिया गया है। कई जगहों पर पारंपरिक तरीके- जैसे हरी टहनियों से आग को दबाना और मिट्टी डालकर लपटों को रोकना- भी अपनाए जा रहे हैं।

वन अधिकारियों का कहना है कि यदि आग की सूचना शुरुआती चरण में मिल जाए तो बड़े नुकसान को रोका जा सकता है। हालांकि, लगातार बढ़ती घटनाएं यह संकेत दे रही हैं कि सामुदायिक जागरूकता और निगरानी तंत्र को और मजबूत करने की जरूरत है।

हर साल बढ़ रही घटनाएं

फैक्ट फाइल (वन आगजनी)

  • 2020 — 4713
  • 2021 — 22191
  • 2022 — 18447
  • 2023 — 13096
  • 2024 — 14776
  • 2025 — 19063
  • 2026 — 251 (1 जनवरी से अब तक)
  • 2025 में औसतन रोज 52-53 स्थानों पर आग लगी।

लापरवाही और परंपराएं बनी वजह

वन अधिकारियों के अनुसार जंगलों में आग लगने की सबसे बड़ी वजह मानवीय लापरवाही है। अक्सर राहगीर या स्थानीय लोग बीड़ी-सिगरेट पीने के बाद जलती हुई तीली या ठूंठ सूखी पत्तियों के बीच फेंक देते हैं, जो कुछ ही मिनटों में आग का रूप ले लेती है। महुआ संग्रहण के दौरान भी पेड़ों के नीचे गिरी पत्तियों को साफ करने के लिए आग लगा दी जाती है, जो कई बार नियंत्रण से बाहर होकर आसपास के बड़े हिस्से को जला देती है।

इसके अलावा, कुछ मामलों में शिकारी वन्यजीवों को बाहर निकालने या शिकार आसान बनाने के लिए भी झाड़ियों में आग लगा देते हैं। इन सभी कारणों से हर साल सैकड़ों हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हो रहा है और जैव विविधता को गंभीर नुकसान पहुंच रहा है।

वन अधिकारी का बयान

“स्थानीय अमले और वन ग्राम समितियों को अलर्ट किया गया है। आग की सूचना मिलते ही टीम मौके पर पहुंच रही है। लोगों से अपील है कि छोटी सी लापरवाही भी बड़े नुकसान में बदल सकती है।” वन अधिकारियों का कहना है कि सतर्कता ही सबसे बड़ा बचाव है, क्योंकि शुरुआती स्तर पर काबू पा लेने से सैकड़ों हेक्टेयर वन क्षेत्र को बचाया जा सकता है।

आगजनी का असर केवल पेड़ों तक सीमित नहीं रहता। लपटों में दुर्लभ वनौषधियां, नए उगते पौधे और पक्षियों के घोंसले जलकर नष्ट हो जाते हैं। कई बार हिरण, खरगोश और सरीसृप जैसे वन्य प्राणी धुएं और आग की चपेट में आकर जान गंवा देते हैं। इसके अलावा, धुआं और प्रदूषण आसपास के वन ग्रामों तक फैलता है, जिससे ग्रामीणों—विशेषकर बुजुर्गों और बच्चों—को सांस संबंधी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि बार-बार लगने वाली आग जंगलों की जैव विविधता और प्राकृतिक संतुलन पर दीर्घकालिक असर छोड़ती है।

ड्रोन से निगरानी

उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व और अचानकमार टाइगर रिजर्व में ड्रोन के जरिए निगरानी की जा रही है। धुआं दिखाई देते ही तत्काल फायर टीम भेजी जा रही है। तेंदूपत्ता तुड़ाई के सीजन को देखते हुए सभी वनमंडल अधिकारियों को संग्राहकों और महुआ बीनने वालों को विशेष रूप से जागरूक करने के निर्देश दिए गए हैं।

आगे की चुनौती

गर्मी अभी शुरुआती दौर में है। तापमान बढ़ने के साथ खतरा और बढ़ सकता है। यदि समय रहते सामुदायिक जागरूकता, सख्त निगरानी और त्वरित कार्रवाई नहीं हुई तो 2026 भी आगजनी के लिहाज से गंभीर साल साबित हो सकता है। जंगलों को बचाने की जिम्मेदारी केवल वन विभाग की नहीं, बल्कि हर नागरिक की है। छोटी सी सावधानी लाखों हेक्टेयर हरियाली को बचा सकती है।

Published on:
25 Feb 2026 03:07 pm
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