
पंजाब के मानसा में नशे के कारोबार का विरोध करने की कीमत एक सामाजिक कार्यकर्ता को जान देकर चुकानी पड़ी। नशे के खिलाफ अभियान चला रहे परविंदर सिंह झोटा दुकानों पर नशा बेचने का विरोध कर रहे थे। इसी दौरान केमिस्ट अश्वनी कुमार ने उन्हें गोली मार दी। विडंबना यह है कि वारदात के समय झोटा फेसबुक लाइव कर रहे थे। ऐसे में यह घटना हत्या की वारदात ही नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था व नशे के खिलाफ सरकारी प्रयासों के सामने खड़े गंभीर सवालों का आईना है।चिंताजनक यह है कि जिस नशे के कारोबार को कभी चोरी-छिपे अंजाम दिया जाता था, उसे खुलेआम दुकान में बैठकर और हथियारों के साये में किया जा रहा है। यह उस व्यवस्था की विफलता का भी संकेत है, जिसे ऐसे अवैध कारोबार पर अंकुश लगाना चाहिए। सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब सामाजिक कार्यकर्ताओं को खुद मोर्चा संभालना पड़ रहा है, तब पुलिस और संबंधित एजेंसियों की भूमिका क्या है? पंजाब में नशे की समस्या महज कानून-व्यवस्था का मामला नहीं है। यह युवाओं के स्वास्थ्य, परिवारों के भविष्य और सामाजिक-आर्थिक विकास से जुड़ा संकट है। पाकिस्तान से लगी सीमा के रास्ते मादक पदार्थों की तस्करी और ड्रोन के जरिये होने वाली आपूर्ति सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती है। लेकिन सीमा पार से तस्करी को घरेलू नेटवर्क की जिम्मेदारी से बचने का आधार नहीं बनाया जा सकता। इस समस्या से निपटने के लिए आपूर्ति के स्रोतों से लेकर स्थानीय स्तर पर सक्रिय वितरण तंत्र तक, हर कड़ी पर कार्रवाई करनी होगी।
केंद्र और राज्य सरकारों ने नशे के खिलाफ अभियान चलाए हैं। विभिन्न एजेंसियां भी तस्करी रोकने में जुटी हुई हैं। लेकिन इन प्रयासों की सफलता का आकलन केवल जब्ती, गिरफ्तारियों और जागरूकता कार्यक्रमों की संख्या से नहीं होना चाहिए। असली सवाल यह है कि नशे की उपलब्धता कितनी घटी, संगठित गिरोहों पर कितना अंकुश लगा और कितने युवाओं को नशे की गिरफ्त से बाहर निकाला जा सका। इसके लिए एजेंसियों में बेहतर समन्वय, खुफिया सूचनाओं का प्रभावी आदान-प्रदान तथा संदिग्ध वित्तीय लेन-देन की निगरानी जरूरी है। नशे के कारोबार से अर्जित संपत्ति जब्त करने की कार्रवाई भी तेज होनी चाहिए।
दवा की दुकानों की नियमित जांच और प्रतिबंधित औषधियों की अवैध बिक्री पर सख्ती भी इस लड़ाई का एक अहम हिस्सा है। बिना वैध पर्चे के दवाएं देने और औषधियों की आड़ में नशीले पदार्थों का कारोबार करने वालों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। मामलों की समयबद्ध जांच और अदालतों में प्रभावी पैरवी सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि अपराधियों में कानून का भय पैदा हो सके। जागरूकता के साथ नशे के आदी युवाओं के लिए सुलभ उपचार, पुनर्वास और रोजगार के अवसर भी बढ़ाने होंगे।