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भारत के खेतों में अंकुरित होने वाला हर बीज केवल अन्न का वादा नहीं, बल्कि किसी महिला किसान के श्रम, अनुभव और प्रकृति के साथ पीढिय़ों के संवाद का परिणाम भी है। बुवाई से कटाई, पशुपालन से बीज संरक्षण और खाद्य प्रसंस्करण से परिवार की पोषण सुरक्षा तक महिलाओं की भूमिका भारतीय कृषि की आधारशिला है। आज जरूरत इस भूमिका को कृषि संसाधनों, आधुनिक तकनीक, बाजार और निर्णय-निर्माण में समान भागीदारी तथा नेतृत्व के अवसरों से सशक्त बनाने की है।15 अक्टूबर को महिला किसान दिवस महिलाओं के कृषि योगदान को रेखांकित करने और उनकी क्षमता को नए अवसरों से जोडऩे का महत्वपूर्ण अवसर है। महिलाएं खेतों में श्रम के साथ पशुधन प्रबंधन, बागवानी, मत्स्य पालन, बीज संरक्षण और कृषि उपज के प्रसंस्करण में भी महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। फिर भी कृषि में सक्रिय भागीदारी हमेशा किसान के रूप में संस्थागत पहचान और संसाधनों पर अधिकार में परिवर्तित नहीं होती।
कृषि जनगणना 2015-16 में परिचालित जोतों में महिला परिचालकों की हिस्सेदारी लगभग 14 प्रतिशत दर्ज की गई थी। भूमि, ऋण, बीमा और आधुनिक तकनीक तक महिलाओं की पहुंच बढ़ाना इसलिए कृषि विकास की अनिवार्य शर्त है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आइसीएआर) की भूमिका कृषि विज्ञान को प्रयोगशालाओं से खेतों तक पहुंचाने के साथ यह सुनिश्चित करना भी है कि वैज्ञानिक प्रगति का लाभ महिला किसानों को मिले। महिला-अनुकूल कृषि उपकरण, श्रम कम करने वाली तकनीकें, कौशल विकास और कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से प्रशिक्षण इस दिशा में महत्वपूर्ण हैं। निराई, कटाई, बीज सफाई और प्रसंस्करण जैसे कार्यों में उपयुक्त उपकरण महिलाओं का समय और शारीरिक श्रम बचा सकते हैं।
इस परिवर्तन का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष महिला वैज्ञानिकों की बढ़ती भूमिका है। कृषि अनुसंधान में महिलाएं अब केवल वैज्ञानिक ज्ञान की उपयोगकर्ता नहीं, बल्कि नई तकनीकों, पेटेंट और उन्नत पौध किस्मों के विकास में योगदान देने वाली नवाचारकर्ता भी हैं। आइसीएआर के उपलब्ध आंकड़े इस बदलाव की ठोस तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। महिला वैज्ञानिकों ने वर्ष 2021-22 में 31 और 2022-23 में 21 पेटेंट आवेदन दाखिल किए। यह संख्या 2023-24 में 50 और 2024-25 में बढ़कर 71 हो गई। महिला वैज्ञानिकों का योगदान अनुसंधान तक सीमित नहीं, बल्कि तकनीक को उपयोगी समाधान में बदलने तक विस्तृत है। पौध किस्मों के विकास और संरक्षण में भी यह योगदान दिखाई देता है।
कृषि का भविष्य केवल उत्पादन बढ़ाने में नहीं, बल्कि उपज से अधिक मूल्य सृजित करने में भी निहित है। प्रसंस्करण, पैकेजिंग, भंडारण, ब्रांडिंग, डिजिटल सेवाओं और बाजार संपर्क से कृषि उद्यमिता के नए अवसर बन रहे हैं। महिला उद्यमियों की भागीदारी परिवर्तन को नई दिशा दे रही है।
कृषि-व्यवसाय ऊष्मायन केंद्र के अनुसार, वर्ष 2020-21 में 170 ऊष्मायित स्टार्टअप में 46 महिला-स्थापित उद्यम थे, जिनकी हिस्सेदारी 27.1 प्रतिशत थी। वर्ष 2023-24 में 352 स्टार्टअप में 112 महिला-स्थापित उद्यम शामिल थे। वर्ष 2025-26 में कुल 413 स्टार्टअप में 121 महिला-स्थापित स्टार्टअप रहे। यह केवल उद्यमों की संख्या नहीं, बल्कि कृषि में महिलाओं की बदलती आकांक्षाओं का संकेत है। वे अब उत्पादन से आगे बढ़कर तकनीक, सेवाओं और बाजार आधारित समाधानों के निर्माण में भी अपनी जगह बना रही हैं। आवश्यकता है कि उन्हें वित्त, मार्गदर्शन, तकनीकी सहायता व बाजार तक पहुंच उपलब्ध कराने की व्यवस्था और मजबूत हो। सरकार की कई योजनाएं महिला किसानों को प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता, तकनीक और उद्यमिता से जोडऩे का अवसर प्रदान करती हैं।महिला किसान को सशक्त करना केवल समानता का प्रश्न नहीं, भारतीय कृषि की उत्पादकता, नवाचार और भविष्य में निवेश है। जब खेत में महिला किसान, प्रयोगशाला में महिला वैज्ञानिक और बाजार में महिला उद्यमी को आगे बढऩे के समान अवसर मिलेंगे, तभी कृषि का वास्तविक रूपांतरण संभव होगा। महिलाओं के योगदान का सम्मान ही नहीं, उन्हें कृषि नेतृत्व में निर्णायक स्थान मिलना चाहिए।
डॉ. एम.एल. जाट (महानिदेशक, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद)
Updated on:
15 Oct 2026 03:20 pm
Published on:
15 Oct 2026 03:20 pm
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