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संपादकीय: अदालती कामकाज में एआइ का हो सावधानी से इस्तेमाल

वकील के गलत तर्क को तो न्यायाधीश खारिज कर सकता है, लेकिन न्यायाधीश ही यदि गलत तर्कों पर फैसला सुनाए तो उसे तभी रोका जा सकेगा जब कोई फैसले को चुनौती दे।
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Jul 04, 2026
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भारतीय न्याय प्रक्रिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) का अविवेकपूर्ण इस्तेमाल नए खतरे की ओर बढऩे का संकेत दे रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि अदालतों में बिना किसी नियमन के एआइ का इस्तेमाल होने दिया गया तो यह न्यायिक कार्य संस्कृति को प्रभावित कर सकता है। एआइ के दुरुपयोग का यह मामला शीर्ष अदालत के संज्ञान में तब आया जब राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) के एक फैसले को चुनौती दी गई जिसे एनसीएलएटी ने भी स्वीकार कर लिया था। एनसीएलटी ने फैसले में ऐसे छह अदालती फैसलों के 'पैराग्राफ' का जिक्र किया था जो वास्तव में थे ही नहीं। पुराने फैसलों में मनमाफिक 'पैराग्राफ' इस तरह जोड़े गए थे, जिसे एक नजर में पकड़ पाना कठिन है। एआइ की कारस्तानी को न्यायाधिकरण भी पकड़ नहीं पाया।

फैसले को रद्द करते हुए शीर्ष अदालत ने इस प्रक्रिया का असर जहरीली गैस की तरह बताया और बार काउंसिल को एक समिति बनाकर एआइ के इस्तेमाल पर स्पष्ट दिशानिर्देश जारी करने का आदेश दिया है, जिसमें नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई के प्रावधान भी होंगे। एक बारगी यह मामला वकीलों की गड़बड़ी का लगता है, जो काम के बोझ को एआइ से आसान करने लगे हैं। लेकिन मुकदमे के एक पक्षकार जम्मू व कश्मीर बैंक ने सुप्रीम कोर्ट को हलफनामा देकर बताया कि उनके वकील ने उन छह फैसलों का जिक्र किया ही नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने भी दर्ज किया कि न्यायाधिकरण ने खुद के रिसर्च से काल्पनिक पैराग्राफ हासिल किया था। यह ज्यादा गंभीर है। वकील के गलत तर्क को तो न्यायाधीश खारिज कर सकता है, लेकिन न्यायाधीश ही यदि गलत तर्कों पर फैसला सुनाए तो उसे तभी रोका जा सकेगा जब कोई फैसले को चुनौती दे।
देखा जाए तो सुप्रीम कोर्ट ने दूध और पानी को अलग कर दिया लेकिन, क्या यह काफी है? यह सवाल अब भी अनुत्तरित है कि किस एआइ प्लेटफॉर्म, किस यूजर आइडी और किस तरह के प्रॉम्प्ट का इस्तेमाल किया गया? न्यायाधिकरण की तरफ से यह शोध आखिर किसने किया? यह महज एआइ पर भरोसे की गलती थी या जानबूझकर किसी को फायदा पहुंचाने की कोशिश? जब तक इन सवालों के उत्तर नहीं मिल जाते तब तक हर तरह के सुझाव और दिशा-निर्देश नाकाफी ही रहेंगे। यह प्रकरण तो डिफॉल्टर कर्जदार से महज 87.43 करोड़ रुपए की वसूली का था और फैसले का 'जहर' सिर्फ धनराशि तक सीमित रहता। लेकिन, जिस तरह विभिन्न क्षेत्रों में एआइ के इस्तेमाल की होड़ मची है, क्या पता अब तक कैसी-कैसी कारस्तानियां हो चुकी हों। और दिशा-निर्देश सिर्फ वकीलों को ही क्यों, एआइ तकनीक के दौर में रिसर्च से लेकर फैसला लिखने तक के लिए स्पष्ट गाइडलाइन जरूरी है। वह भी ऐसा कि हर तरह की आशंकाएं दूर रहें।

Updated on:
04 Jul 2026 07:00 pm
Published on:
04 Jul 2026 07:00 pm