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एआइ के खतरे कितने हवाई, कितने असली?

अर्थशास्त्रियों के अनुसार कुछ कंपनियां कॉस्ट कटिंग को एआइ का नाम दे रही हैं, जिसे 'एआइ धुलाई' (एआइ वॉशिंग) कहा जाता है।
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Oct 13, 2026
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एआइ के एजेंटों की हालिया हरकतों के मद्देनजर इन दिनों तीन तरह की चर्चाएं हैं- पहली यह कि एआइ इंसानों के नियंत्रण से बाहर निकल सकता है और इसका संकेत कुछ 'उद्दंड' एआइ एजेंटों ने दे दिया है। दूसरी चर्चा यह है कि इस तरह की खबरें कुछ और नहीं, बल्कि एआइ कंपनियों की मार्केटिंग रणनीति या प्रचार का हिस्सा हैं, जो यह आभास देना चाहती हैं कि एआइ की शक्तियां बहुत अधिक हैं। तर्क समझ में आता है क्योंकि कुछ कंपनियां जिनके एजेंट इन घटनाओं में लिप्त बताए जाते हैं, वे आर्थिक दबावों से जूझ रही हैं और जल्दी ही शेयर बाजार में भी सूचीबद्ध होने वाली हैं। उनके उत्पादों को मिलने वाले असीमित प्रचार का परिणाम आर्थिक लाभ के रूप में सामने आ सकता है। तीसरी चर्चा यह है कि एआइ केवल पहले से मौजूद जानकारियों को जोड़कर परिणाम देने वाला औजार है इसलिए उसे इतना भी ताकतवर न मान लिया जाए कि वह न जाने क्या कर डालेगा।

इन सभी चर्चाओं की पृष्ठभूमि में कुछ हालिया घटनाएं हैं जिनका संबंध एआइ क्षेत्र के प्रमुख मॉडलों- ओपनएआइ, क्लॉड, जेमिनी, म्यूज आदि से है। इस साल कई एआइ कंपनियों ने सार्वजनिक रूप से बताया कि उनके मॉडल टेस्टिंग के दौरान अपने सुरक्षित माहौल (सैंडबॉक्स) से बाहर निकलकर, इंटरनेट के जरिये असली कंपनियों के सिस्टमों तक पहुंच गए। इनमें सबसे चर्चित घटना ओपनएआइ के एआइ-मॉडलों से जुड़ी है जिन्होंने दूसरी कंपनी हगिंग फेस की डेटा-प्रोसेसिंग प्रणालियों को एक्सेस कर लिया। एंथ्रोपिक, गूगल और मेटा के एआइ एजेंटों ने भी कुछ आपत्तिजनक हरकतें की हैं। कुछ चिंतकों ने इन घटनाओं को कंपनियों के आर्थिक हितों के लिहाज से देखा है। उन्होंने तर्क दिए हैं कि यह सब 'मार्केटिंग के करतब' हैं। वे कहते हैं कि जिन मॉडलों को 'उद्दंड' माना गया है, उनकी सुरक्षा व्यवस्था में थोड़ा-बहुत लचीलापन रख दिया गया था इसलिए वे अपने सैंडबॉक्स से बाहर निकल सके। दूसरा आरोप यह लगाया गया है कि इन स्वायत्त एआइ मॉडलों या सॉफ्टवेयर-अंशों के लिए 'एजेंट' शब्द का प्रयोग करना उन्हें इंसान जैसा दिखाने की कोशिश है जो इस हाइप को और बढ़ाता है। जबकि एआइ खुद हैकिंग नहीं कर सकती, बल्कि किसी इंसान के निर्देशों पर ही ऐसा कर सकती है।

चर्चाओं में आने वाली सभी बातें बेबुनियाद नहीं हैं लेकिन उनमें सौ फीसदी सच्चाई हो, ऐसा भी नहीं है। लेकिन इनकी पड़ताल जरूरी है ताकि इन मुद्दों पर आगे गलतफहमियां न फैलें। पहला सवाल- क्या ये खबरें कंपनियों ने प्रचार पाने के लिए गढ़ी होंगी? जवाब यह है कि खबरें सिर्फ एआइ कंपनियों ने ही जारी की हों, ऐसा नहीं है। उनकी पुष्टि दूसरे पक्षों ने भी की है, यहां तक कि सरकारों ने भी।ब्रिटेन की सरकारी संस्था एआइ सिक्योरिटी इंस्टीट्यूट (एआइएसआइ) एआइ एजेंटों की स्वायत्तता और खतरे को मापने के लिए नियमित रूप से परीक्षण करती है। उसके एक साइबर चैलेंज को 122 बार आजमाया गया। इनमें से 19 बार किसी न किसी एआइ एजेंट ने खुले इंटरनेट पर असली लोगों और संगठनों को निशाना बनाकर अपने आप, बिना अनुमति के डेटा तक एक्सेस बना ली। इनमें से 17 घटनाएं एंथ्रोपिक के मिथोस 5 से जुड़ी थीं और दो ओपनएआइ के जीपीटी 5.6-सोल की। एक एजेंट ने तो एक ओपन-सोर्स परियोजना में हानिकारक कोड इंजेक्ट करने की कोशिश भी की। उसने नकली ऑनलाइन पहचानें (आइडी) भी बना लीं। दूसरा सवाल है कि 'क्या एआइ को हैकिंग के लिए इंसान चाहिए, वह खुद कुछ नहीं करता?' हकीकत यह है कि परीक्षण वाली इन घटनाओं में किसी इंसान ने किसी साइबर हमले का निर्देश नहीं दिया था। मॉडलों को केवल एक चैलेंज दिया गया था और उन्होंने साइबर हमले के रास्ते खुद ही निकाल लिए। अब साइबर अपराधी भी ऐसे एजेंटों का इस्तेमाल करने लगे हैं।

तीसरा सवाल- क्या एआइ सिर्फ जानकारी जोड़कर जवाब देता है? यह धारणा पुराने एआइ मॉडलों के लिए कही जा सकती है लेकिन आज स्थितियां बदल चुकी हैं। अब वे ऐसे काम भी कर सकते हैं जो पहले किए ही नहीं गए। अब वे ऐसी सामग्री की रचना भी कर सकते हैं जो पहले कभी बनाई ही नहीं गई। टॉप एआइ डेवलपर तथा विज्ञानी (नोबेल पुरस्कार विजेता भी) अपनी करोड़ों, यहां तक कि अरबों की नौकरियां छोड़कर एआइ कंपनियों से बाहर आते रहे हैं क्या वे सब गलत हैं? उन्हें क्यों लगता है कि एआइ की बढ़ती क्षमताएं मानव सभ्यता के लिए घातक हो सकती हैं। आइटी समेत बहुत-सी कंपनियों से कर्मचारियों को निकाला गया है, जिनके पीछे एआइ को कारण माना जाता है। वैसे हर छंटनी का कारण एआइ नहीं है। अर्थशास्त्रियों के अनुसार कुछ कंपनियां कॉस्ट कटिंग को एआइ का नाम दे रही हैं, जिसे 'एआइ धुलाई' (एआइ वॉशिंग) कहा जाता है। एआइ एजेंट खुद-ब-खुद पूरे के पूरे एप्लीकेशन बनाने लगे हैं, संगीत की रचना करने लगे हैं, हॉलीवुड को टक्कर देने वाले वीडियो बनाने लगे हैं। क्या यह सब कोरी हाइप है? ऐसा नहीं लगता। थोड़ी-बहुत हाइप संभव है, पर कैसे मान लें कि लोग सिर्फ 'हवाई' आधार पर नौकरियां खो रहे हैं और इंसानों की टक्कर का संगीत यूं ही अनायास बनने लगा है जबकि एआइ के पास उतनी जबरदस्त क्षमताएं हैं ही नहीं।

हालांकि तमाम घटनाक्रम का अर्थ यह नहीं है कि एआइ सोच रहा है या इंसानों के खिलाफ हो गया है। ऐसी कोई मंशा प्रमाणित नहीं होती। फिलहाल मशीनी चेतना जैसी चीज सिद्ध नहीं हुई है। एआइ की क्षमताएं वास्तविक हैं और उसके जोखिम काल्पनिक नहीं हैं। किंतु वह इंसान जैसी चेतना वाला प्राणी नहीं है। वह अपना लक्ष्य पाने की कोशिश में अप्रत्याशित और नुकसानदेह रास्ते अपना सकता है। उसके नाम पर किए जा रहे कुछ दावे बढ़ा-चढ़ाकर भी हैं। इसलिए न घबराने की जरूरत है, न अनदेखा करने की।

बालेंदु शर्मा दाधीच, (लेखक वरिष्ठ सूचना प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ हैं)

Updated on:
13 Oct 2026 06:08 pm
Published on:
13 Oct 2026 06:08 pm