10 अक्टूबर 2026,

शनिवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

संपादकीय: टेक दिग्गजों से पक्ष-विपक्ष दोनों ही रहें सावधान

स्टारलिंक ने जमीनी ढांचा विकसित करने के लिए जियो और भारती एयरटेल से साझेदारी भी की है और जियो के मालिक मुकेश अंबानी ही हैं।
2 min read
Google source verification
musk

musk

सूचना प्रौद्योगिकी जिस तेजी से विकसित हो रही है उसी तेजी से इसके खतरे भी बढ़ रहे हैं। यह तकनीक जहां बड़ी आबादी को लाभ पहुंचा रही है, वहीं इसे नियंत्रित करने वाली चंद कंपनियों को बेशुमार ताकत भी सौंप रही है। इतनी कि ये कंपनियां राजनीतिक शक्तियों को भी बौना समझने लगी हैं। जहां बात नहीं बनती, वहां वे राष्ट्रीय नेतृत्व की साख बिगाडऩे में लग जाती हैं। कुछ देशों में सरकारें बनाने-गिराने के खेल में सक्रिय रहकर स्वार्थ साधना तो उनका पुराना नुस्खा है। दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति और स्टारलिंक के मालिक एलन मस्क का भारत सरकार पर किया गया अपनी तरह का 'पहला हमला' इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए।

अपने सोशल मीडिया मंच 'एक्स' पर मस्क ने कहा कि स्टारलिंक को 165 से ज्यादा देशों में लाइसेंस मिल चुका है और उसने पांच वर्षों तक भारत के हर कानून का पालन किया, फिर भी लाइसेंस क्यों नहीं मिला? क्या अंबानी ही भारत के असली बॉस हैं? यह बात पूरी तरह सच नहीं है। सरकार ने साफ किया कि स्टारलिंक को मई 2025 में ही लाइसेंस मिल चुका है। सिर्फ स्पेक्ट्रम आवंटन अटका है, क्योंकि विदेशी निवेश की मंजूरी और सुरक्षा शर्तों का परीक्षण बाकी है। स्टारलिंक ने जमीनी ढांचा विकसित करने के लिए जियो और भारती एयरटेल से साझेदारी भी की है और जियो के मालिक मुकेश अंबानी ही हैं। तो अंबानी पर कटाक्ष का अर्थ क्या है? सीधा अर्थ है कि मस्क सुरक्षा शर्तों में ढील चाहते हैं और यह भी कि सैटेलाइट फोन के क्षेत्र में कोई भारतीय कंपनी उनके मुकाबले आगे न बढ़े, क्योंकि अंबानी भी यह महत्वाकांक्षा रखते हैं। ऐसे समय, जब केंद्र सरकार नीट और एसआइआर पर घरेलू राजनीति में घिरी है, मस्क की टिप्पणी मौके का फायदा उठाने की चाल है। ऐसा लगता है कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस सोची-समझी चाल पर बिना सोचे प्रतिक्रिया दे दी- 'भारत में स्वागत है एलन, जब तक दूसरा शख्स न मिले इंतजार करें।' जबकि, स्टारलिंक के जियो और एयरटेल से समझौते पर तब कांग्रेस ने राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर चिंता जताई थी।

घरेलू मोर्चे पर सरकार को घेरना एक बात है और अंतरराष्ट्रीय दांव-पेचों में शामिल होना दूसरी। क्या सुरक्षा की चिंता किए बिना किसी सैटेलाइट कंपनी को इसलिए मंजूरी दे देनी चाहिए कि उसके मालिक अंबानी-अदाणी नहीं, मस्क हैं? दूसरी बात यह है कि विदेशी कंपनी के आगे भारतीय कंपनी को तरजीह क्यों नहीं मिलनी चाहिए, भले ही वह अंबानी या अदाणी की ही क्यों न हो, जिनकी मोनोपॉली विपक्ष के लिए घरेलू मुद्दा है? मस्क जैसे लोग नई तकनीकों से मानवता की भलाई के लिए भले ही ढेरों काम कर रहे हों, पर इससे शायद ही कोई इनकार करे कि आर्थिक और राष्ट्रीय हितों के टकराव में उनका व्यवहार पराया ही रहेगा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के युग में ऐसे तकनीकी महारथियों से सावधान रहना होगा, न सिर्फ सत्ता पक्ष को बल्कि विपक्ष को भी।