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आहत मन की खामोशी और पीड़ा को समझने की भाषा

यह पुस्तक भारतीय संदर्भ में इसीलिए महत्वपूर्ण है कि हम घर, स्कूल और कार्यस्थल पर होने वाली अनेक तरह की रोजमर्रा की हिंसा को मानसिक आघात के रूप में पहचानते ही नहीं।
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भारत

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Opinion Desk

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अपर्णा पीरामल राजे

•

Oct 09, 2026

mental health

mental health

मेरी एक साल पुरानी मित्र के मूड में होने वाले अत्यधिक बदलावों को मैं समझ नहीं पाती थी- कभी गुस्से और हताशा से भरी, तो कभी गहरे दुख और निराशा में डूबी। पॉडकास्टर और लेखिका रहीं मेरी मित्र का हाल में तलाक हुआ है। वह बेंगलूरु में अपनी मां के साथ रहती हैं, जबकि उनका बड़ा बेटा लंदन में कार्यरत है। निष्ठा लांबा की पुस्तक 'ट्रॉमा नेशन- फाइटिंग इंडियाज साइलेंट एपिडेमिक' ने मुझे मेरी मित्र की स्थिति को समझने के लिए एक नई भाषा दी और उनकी पीड़ा को सुनने और समझने का एक नया नजरिया दिया। उनके अतीत में छिपे अनुभवों को समझने के बाद उनका गुस्सा, निराशा और भावनात्मक उतार-चढ़ाव मुझे कहीं अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगे।

एक कार्यक्रम में मैंने पुस्तक लेखिका से इस विषय पर विस्तार से चर्चा की। लांबा के अनुसार, 'ट्रॉमा' या मानसिक आघात केवल किसी भयानक दुर्घटना से गुजरना ही नहीं है, बल्कि यह मनोवैज्ञानिक सुरक्षा के अभाव से भी जुड़ा हुआ है। वह स्पष्ट करती हैं कि ट्रॉमा केवल उन चीजों से पैदा नहीं होता जिन्हें हम सहते हैं, बल्कि उन चीजों से भी जन्म लेता है जिनसे हमें वंचित रखा जाता है- वह स्नेह, जो कभी नहीं मिला, वह सुरक्षित माहौल जो नदारद था या वे रिश्ते जिनमें हमें सदैव अनसुना और अनदेखा किया गया। मेरी मित्र का अनुभव इसका एक उदाहरण है। उनके माता-पिता ने उनकी शिक्षा और कॅरियर की आकांक्षाओं को प्रोत्साहित किया, लेकिन भावनात्मक स्नेह का अभाव रहा। घर में अक्सर झगड़े होते और उन्हें आलोचना का सामना करना पड़ता। बचपन में उन्होंने रिश्तों की जिस भाषा को जाना, वही बाद में उनके वैवाहिक जीवन का हिस्सा बन गई। बचपन के इन्हीं अनुभवों व वयस्क जीवन के रिश्तों के बीच गहरा संबंध दिखाई देता है। बचपन में मिली उपेक्षा या असुरक्षा आत्मसम्मान को प्रभावित कर सकती है और व्यक्ति को ऐसे रिश्तों में भी बनाए रख सकती है, जिनमें उसे पुराना भावनात्मक अकेलापन झेलना पड़ता है।

आज के समय में 'ट्रॉमा' चर्चित शब्द बन चुका है। लेकिन हर कठिन अनुभव ट्रॉमा नहीं होता और ट्रॉमा मानसिक बीमारी का पर्याय भी नहीं है। ट्रॉमा स्वयं घटना नहीं, बल्कि कोई अनुभव बीत जाने के बाद भी हमारी भावनाओं, व्यवहार और तंत्रिका तंत्र पर बने रहने वाला उसका दूरगामी असर है। हमारे शरीर में तंत्रिका तंत्र चेतावनी प्रणाली के सदृश है। चिंता, बेचैनी और हर समय चौकन्नापन इसी से जुड़े होते हैं। बाहरी दुनिया के प्रति हमारी प्रतिक्रियाएं इसी तंत्र से संचालित होती हैं। अत्यधिक प्रतिक्रिया देना या अपने भीतर ही सिमट जाना- दोनों ही स्थितियां स्वस्थ मन की परिचायक नहीं हैं। दोनों ही स्थितियां यह संकेत करती हैं कि अतीत वर्तमान में भी दखल दे रहा है।

यह पुस्तक भारतीय संदर्भ में इसीलिए महत्वपूर्ण है कि हम घर, स्कूल और कार्यस्थल पर होने वाली अनेक तरह की रोजमर्रा की हिंसा को मानसिक आघात के रूप में पहचानते ही नहीं। सहनशीलता चरित्र की मजबूती मानी जाती है, आज्ञाकारिता को समझदारी और चुप्पी को इस बात का प्रमाण कि कोई नुकसान हुआ ही नहीं। लांबा सही लिखती हैं कि ट्रॉमा केवल एक व्यक्तिगत समस्या नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा है जो व्यक्ति के दर्द को बड़े सिस्टम से जोड़ती है। अलग-अलग दिखने वाली विभिन्न पीड़ादायक घटनाएं मिलकर बताती हैं कि भारत में ट्रॉमा किस तरह एक खामोश महामारी का रूप ले चुका है। तमाम पीड़ादायक सच बयान करने के बावजूद यह पुस्तक उम्मीद भी जगाती है। लांबा एक महत्वपूर्ण बात सामने रखती है- उबरने की क्षमता केवल व्यक्ति की इच्छाशक्ति या आत्मविश्वास से पैदा नहीं होती। उसके लिए संवेदनशील और सहयोगी वातावरण भी उतना ही जरूरी है। वह मानती हैं कि आंतरिक लचीलापन अकेले शून्य में विकसित नहीं होता, आसपास के वातावरण की गुणवत्ता ही यह तय करती है कि कोई व्यक्ति किसी विपत्ति से कितनी सफलता से बाहर निकल पाता है। मानसिक स्वास्थ्य केवल अकेले का संघर्ष नहीं, बल्कि एक सामूहिक जिम्मेदारी है। मन के गहरे घावों को भरने के लिए एक संवेदनशील समुदाय और सुरक्षित वातावरण जरूरी है।

'ट्रॉमा नेशन' पढऩे में कठिन जरूर लग सकती है, लेकिन यह आज के समय में बेहद जरूरी किताब है- विशेषकर तब जब आपका कोई अपना भीतर से टूट रहा हो। कोई भी किताब किसी के पुराने घावों को रातोंरात भर नहीं सकती, लेकिन वह हमें उन घावों को सही नाम से पुकारने और पहचानने की एक भाषा जरूर दे सकती है। यह हमें सिखाती है कि हम अपने रवैये पर पुनर्विचार करें- कम फैसले सुनाने वाला, कम दोष देने वाला और अधिक संवेदनशील रवैया अपनाएं।

अपर्णा पीरामल राजे',(केमिकल खिचड़ी: हाउ आइ हैक्ड माय मेंटल हेल्थ' पुस्तक की लेखिका)