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हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। प्राणी भी अर्द्धनारीश्वर है। वही स्त्री, वही पुरुष। दिन है तो रात भी है। मोक्ष है है तो तो नरक भी है। जीवन में प्रत्येक कर्म के दो स्वरूप होते हैं। अतएव, जीवन द्वन्द्वात्मक होता है। ब्रह्म में कर्ता भाव नहीं है, अतः वह अद्वैत है। कर्ता रूप में उसने माया की रचना की। माया के मूल रूप में दो कर्म थे-एक, ब्रह्म के अंश को लेकर उसको विवर्त बनाना, विस्तार करना तथा दूसरा, विस्तार के बाद ब्रह्मांश को पुनः ब्रह्म में मिला देना। हमारी वर्णव्यवस्था का निर्माण इसी दृष्टि से किया गया था। गृहस्थाश्रम की समाप्ति पर लौटने की तैयारी करना।
जन्म सदा अविद्या से होता है। तभी कर्मों के फल भी भोगने के लिए नया शरीर धारण करना पड़ता है। शिशु एक ओर जहां प्रकृति (सत्व, रज, तम) की गोद में पैदा होता है, वहां अविद्या उसके मूल में होती है। वह सदा नकारात्मक भावों की ओर सहजता से आकर्षित होता जाता है-जब तक उसको विद्या (धर्म-ज्ञान-वैराग्य-ऐश्वर्य) का बोध नहीं हो जाता। चूंकि अर्थ-काम तक ही सिमट गया, अतः धर्म और मोक्ष उसके पुरुषार्थ से ही बाहर हो गए। तब माया का कार्य ब्रह्म को एक देह से दूसरी देह में स्थानान्तरित करना ही रह गया।
आत्मा जीवन में सुप्त हो गया। न घर में, न शिक्षा में, और न ही धर्म में। धर्म किसके लिए और क्यों? जीवन जब देह के अतिरिक्त कुछ भी नहीं रह गया। माया का भोग साम्राज्य का ही पूर्ण विस्तार रह गया। तब गीता की माया का स्वरूप जो दिव्य है और हमें स्त्री रूप में उपलब्ध है, कैसे समझ में आयेगा? भोग का लालच तृष्णा बनकर हमें भ्रमित करता जाता है। माया को ब्रह्मांश के लिए मोक्ष की चिंता करनी ही नहीं है। गीता के ही कुछ श्लोक जो उसकी दिव्यता के परिचायक हैं-
दैवी होषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥ (7.14)
- मेरी यह तीन गुणों वाली माया दिव्य है (दैवी)। यह ईश्वर की अपनी शक्ति है, अतः पवित्र और दिव्य है। स्त्री को इसी माया का साक्षात प्रतीक माना है जो जगत का सृजन-संचालन करती है। स्त्री के स्वभाव में सात दिव्य गुण रहते हैं।
कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा। (10/34)
- कृष्ण कहते हैं कि स्त्रियों में कीर्ति (यश), श्री (लक्ष्मी), वाक् (मधुर वाणी), स्मृति, मेधा (बुद्धि), धृति (धैर्य), क्षमा-ये सभी साक्षात मेरा ही स्वरूप हैं।
एक सामान्य पुरुष को इन गुणों को जगाने के लिए वर्षों साधना करनी पड़ती है। स्त्री में यह भाव स्वाभाविक रूप में समाहित रहते हैं। उसके धैर्य-क्षमा उसको दिव्य बनाते हैं। सूजन शक्ति के कारण स्त्री दैवी माया की साक्षात मूर्ति है। यदि वह शरीर रूप में ही देखी जाए तो यह अज्ञान ही है। गुणों के रूप तो भगवान की विभूति है। उसका सामर्थ्य अद्भुत है। वह परा है, वह अपरा प्रकृति भी है। वह जड़-चेतन के मध्य का सेतु है। अर्थ काम के युग में उसके अपरा भाव का ही साक्षात हो पाता है। दिव्य-सूक्ष्म-परोक्ष स्वरूप चर्चा में ही नहीं है।
भक्ति उसकी प्रधान भूमिका है जहां माया बन्धन नहीं रहती, भगवान को अपनी ओर खींचने वाली शक्ति बन जाती है। एक स्पष्ट स्वरूप यह हुआ कि अपरा रूप में बांधती भी है, परा रूप में मुक्त भी करती है। स्वयं में वह तटस्थ शक्ति है। व्यक्ति के मन की गति के अनुसार आसक्ति/भक्ति भूमिका निभाती है। जो स्त्री तुम्हें बांध सकती है, वही तार भी सकती है। आप देखें कि वह शरीर-मन-बुद्धि भाव में त्रिगुणी बनकर मुक्त नहीं होने देती। वही आत्मरूप में गर्भस्थ शिशु की गुरु बनकर उसे संस्कारित करती है। उसका एक छोर पृथ्वी से जुड़ा है तो दूसरा छोर ईश्वर से जुड़ा है। सूक्ष्म शरीर चूंकि सदा ही कारण शरीर का हिस्सा बना रहता है (जहां पूर्व जन्मों का और प्रारब्ध का लेखा-जोखा रहता है) स्त्री ही गर्भस्थ शिशु के पूर्व जन्म एवं संस्कारों से परिचित हो सकती है। यही उसकी दिव्यता का बड़ा प्रमाण भी है। इसी प्रकार अपने शरीर और अन्न से शोणित के माध्यम से शिशु के स्थूल शरीर का निर्माण करती है। पति के हर एक अंश का शरीर के उपयोग हो जाता है। इस बीच उसकी माहवारी बन्द रहती है और शोणित पूर्णतः निर्माण में उपयोग हो रहा होता है।
जो शिशु पूर्णतः निष्क्रिय है, जिसकी सारी इन्द्रियां भी निष्क्रिय हैं, जिसके साथ सम्पर्क का कोई अन्य माध्यम भी नहीं है, उसको मानव रूप में संस्कारित करती है अपनी सूक्ष्म तथा परोक्ष दिव्य शक्तियों से। अपने भावों के प्राणात्मक स्पन्दनों से। देव-माताएं भी यही करती हैं। असुरों की भी माताएं ही इसी क्रम से संस्कारित करती हैं। यह माया ही मातृ रूप में सृष्टि का विकास करती है-स्त्री के माध्यम से।
कुछ ब्राह्मण ग्रन्थों में नारी को 'स्त्री हि ब्रह्मा' कहा गया है। उसे सावित्री कहा गया है। ब्रह्मा आग्नेय प्राण है, शोणित रूप है, अन्नाद है। इसीलिए ब्रह्मा सृजनकर्ता, स्रष्टा, स्त्रैण रूप ही है। इसी से आपः की प्रथम सृष्टि होती है।
सृष्टि को अग्नि-सोम रूप अंगिरा और भृगु चलाते हैं। अग्नि ही अंगिरा रूप नाद या शब्द सृष्टि है सरस्वती है। भृगु ही अर्थ सृष्टि का आधार है, लक्ष्मी है। सम्पूर्ण जगत इन दोनों धाराओं पर ही प्रतिष्ठित है-शब्दब्रह्म तथा अन्नब्रह्म। अन्न से सम्पूर्ण अर्थसृष्टि-अव्यय, अक्षर, क्षर का निर्माण होता है। स्त्री सौम्या है, अन्न है। शरीर का निर्माण करती है। स्त्री ही शब्द ब्रह्म है। दोनों शब्द और अर्थ सदा साथ रहते हैं। स्त्री की दिव्यता के मूल में लक्ष्मी-सरस्वती की स्त्री में प्रतिष्ठा ही है। दोनों ही देवियां हृदय में प्रतिष्ठित अक्षर प्राणों-ब्रह्मा तथा विष्णु की शक्तियां हैं। आगे ब्रह्मा बिन्दु भाव ही है। इसके केन्द्र में ही ब्रह्म (परात्पर रूप) की प्रतिष्ठा है।
स्त्री माया की ही प्रतिनिधि बनकर पुरुष के जीवन का संचालन करती है। उसके यज्ञ को पूर्ण करवाती है। यशवर्द्धन कराती है। रौद्र रूप भी उतना ही भयानक है। उसके सम्मान में ही देश का यश है।
वैदिक उद्घोष-यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।।
क्रमश:
gulabkothari@epatrika.com
Updated on:
10 Oct 2026 09:05 am
Published on:
10 Oct 2026 09:05 am
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