
मुकेश भूषण, वरिष्ठ पत्रकार
सावधान! भारत में अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआइ) निर्मित मनोरंजन की बाढ़ आने वाली है। बड़े कॉर्पोरेट घराने एआइ आधारित फिल्म निर्माण में भारी निवेश की तैयारी कर रहे हैं। रिलायंस और डिज्नी के संयुक्त वेंचर ‘जियोस्टार’ ने अपने पहले एआइ प्रयोग ‘महाभारत: एक धर्मयुद्ध’ की शानदार सफलता के बाद जियो-हॉटस्टार प्लेटफॉर्म पर एआइ कंटेंट को बड़े पैमाने पर बढ़ाने की योजना बनाई है। कमाई का गणित बिल्कुल साफ है- न्यूनतम लागत और अधिकतम मुनाफा। देश की अर्थव्यवस्था को इसका बड़ा फायदा होगा, जीडीपी बढ़ेगी। दर्शकों को भी सहूलियत कि मनोरंजन के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं, पूरा का पूरा सिनेमाघर ‘मोबाइल फोन’ के रूप में इंसान की हथेली में सिमट चुका है।
इंसानी भावनाएं नदारद
भारत से पहले अमरीका और चीन में यह बाढ़ आ चुकी है। अमरीका का प्रबुद्ध समाज इसे 'एआइ कचरा' कहकर खारिज कर रहा है। उनका मानना है कि ‘विजुअल’ शानदार होने के बावजूद इनमें इंसानी भावनाएं नदारद हैं। लेकिन अस्वीकृति से इसके वैश्विक बाजार को कोई फर्क नहीं पड़ता। विडंबना देखिए कि ‘कचरा’ बताने और ‘डिसलाइक’ करने के लिए भी लोगों को इसे ‘शेयर’ करना पड़ता है, जिससे इसके ‘व्यूज’ और ‘इंगेजमेंट’ लगातार बढ़ते जाते हैं। यही वह मूलमंत्र है जो इस बाजार को दिन-दुनी, रात-चौगुनी गति दे रहा है। इस तरह के मनोरंजन का कला-साहित्य और उसके शास्त्रीय उद्देश्यों से कोई वास्ता नहीं है। यही बात सर्वाधिक चिंता पैदा करने वाली है।
मांग के अनुरूप कथित रूप से नया रचने में कुशल
मनोरंजन की इस बदली हुई दुनिया को तुलसीदास और प्रेमचंद जैसे कालजयी रचनाकारों की जरूरत नहीं है और न ही दो पंक्तियों में जीवन का मर्म समझाने वाले कबीर और रहीम की। इन्हें जरूरत है तो सिर्फ बड़ा निवेश करने वाले कॉर्पोरेट दिग्गजों की। बाकी का काम ओटीटी और एआइ का 'डेडली कॉम्बिनेशन' आसानी से कर देता है- चाहे वह काम स्टीफन स्पीलबर्ग और सत्यजीत रे जैसे निर्देशकों का हो या दुनिया के महान सिनेमैटोग्राफरों या पटकथा लेखकों का। एआइ टूल अब तक लिखे जा चुके साहित्य को अपना ही ‘डेटा’ मानते हुए मांग के अनुरूप कथित रूप से नया रचने में कुशल है और ओटीटी तकनीक कस्टमाइज कंटेंट संबंधित हाथों तक पहुंचाने में।
एल्गोरिदम का कमाल
तकनीक ने ब्रॉडकास्ट और टेलीकास्ट के बाद अब स्ट्रीमिंग और स्क्रॉलिंग तक आते-आते यूजर को बांधना बेहद आसान कर दिया है। टेक कंपनियां यूजर के डिजिटल फुटप्रिंट को ट्रैक करके ऐसा एल्गोरिदम सेट करती हैं कि लोग एक के बाद एक क्लिपिंग्स देखते हुए घंटों गंवा देते हैं और अंत में हाथ आता है- केवल शून्य। नालायक बेटा, समझदार बहू से लेकर बेमेल जोड़ों की प्रेमकथाओं तक के अनगिनत शॉट्स यू-ट्यूब, इंस्टाग्राम इत्यादि पर परोसे जा रहे हैं, जो एआइ जनित भावी माइक्रो-फिल्म उद्योग का बाजार तैयार कर रहे हैं। फिलहाल इनमें थोड़ा इंसानी श्रम दिख रहा है, लेकिन जल्द ही यह पूरी तरह एआइ के हवाले हो जाएगा। मगर असली चिंता की बात यह नहीं, बल्कि कुछ और ही है।
‘कौन पूछेगा भला कविता?’
मनोरंजन प्राचीन काल से ही साहित्य और अध्यात्म की गर्भनाल से जुड़ा रहा है, जिसके बिना किसी जीवंत संस्कृति की कल्पना असंभव है। यदि मनोरंजन जगत को इस गर्भनाल से काटकर अलग कर दिया जाए, तो समाज का सांस्कृतिक चेहरा विद्रूप होना तय है। बेजान शब्द, नियंत्रित रेखाएं और मशीनी पुतले हमें सिर्फ वहीं ले जा सकते हैं- ‘जहां असली बात छिपा कर रखना ही हो असली बात…’ असमिया कवि अबनी चक्रवर्ती की इन पंक्तियों का मर्म जब तक हम समझेंगे तब तक इतनी देर हो चुकी होगी कि- ‘कौन पूछेगा भला कविता?’ फिर, ‘तुम हवाई किला बनाओ या बंद रखो अपनी आंखें, क्या फर्क पड़ेगा।’
क्या एआइ जनित कला में विमर्श कहां?
मनोरंजन को सिर्फ ‘टाइमपास’ समझना बड़ी भूल है। यह मूलत: व्यक्ति को समष्टि (संसार) से जोडऩे का माध्यम है। भक्तिकाल के महान रचनाकारों के हाथों में मौजूद तंबूरा, इकतारा, रबाब, करताल, मृदंग और वीणा आखिर यही तो कह रहे हैं। वाल्मीकि, वेदव्यास, गुरुनानक, सूरदास, रविदास, चैतन्य महाप्रभु और शंकरदेव से लेकर शेक्सपियर, टॉलस्टॉय और अज्ञेय जैसे महान रचनाकारों तक का उद्देश्य यदि जीडीपी बढ़ाना होता तो मानवता आज जहां है वहां नहीं होती। मनोरंजन हमेशा से सामूहिक प्रदर्शनों और मानवीय सहभागिता पर आधारित रहा है। लोक-कल्याण को ध्यान में रखनेवाला रचनाकार जब व्यक्तिगत अनुभवों का सामूहिक प्रदर्शन करता है तो विमर्श के बाद वह संसार का सच बन जाता है। उनकी प्रस्तुतियों का सामूहिक रसपान सामाजिक-वैचारिक चेतना को झकझोरता है, जिससे हमारा मूल्यबोध परिष्कृत होता है। 16वीं शताब्दी की 'मोनालिसा' पर आज भी बहस इसीलिए जारी है क्योंकि कला विमर्श पैदा करती है। क्या एआइ जनित कला ऐसा कर सकती है?
हरेक का अपना-अपना ‘आनंद’ और सबका कोना अलग
ओटीटी और एआइ ने ‘व्यक्तिनिष्ठ मनोरंजन’ का रास्ता खोल दिया है। एल्गोरिदम से व्यक्तिगत पसंद को भांपकर उसके हिसाब से चंद मिनटों में ऐसा कंटेंट तैयार हो सकता है, जो ‘यूजर’ को देर तक ‘इंगेज’ रख सके। यह एक ऐसा एकांत मनोरंजन होगा, जहां किसी संवाद या विमर्श की गुंजाइश ही नहीं बचेगी। हरेक का अपना-अपना ‘आनंद’ और सबका कोना अलग। यह बदलाव भविष्य की एक बेहद डरावनी तस्वीर पेश करता है। जो मनोरंजन जगत कभी व्यक्तिगत अनुभवों को संसार से जोड़ता था, वह अब सांसारिक अनुभवों को समेटकर मनुष्य को नितांत अकेला बनाने की यात्रा शुरू कर चुका है। इसके सामाजिक और मानसिक परिणाम कितने घातक हो सकते हैं, इसकी फिलहाल हम कल्पना भी नहीं कर सकते।