भिवाड़ी में अवैध पटाखा फैक्टरी में हुए विस्फोट और आग ने देश की सुरक्षा, प्रशासन और राजनीतिक संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। यह हादसा सिस्टम की खामियों को उजागर करता है, जिसमें अवैध फैक्टरियां, प्रशासनिक लापरवाही और मजदूरों का शोषण शामिल हैं। इस तरह के हादसों को रोकने के लिए कठोर कदम और प्रभावी जांच की आवश्यकता है।
भिवाड़ी की अवैध पटाखा फैक्टरी में हुए विस्फोट और अग्निकांड ने एक बार फिर देश की औद्योगिक सुरक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक निगरानी व राजनीतिक संवेदनशीलता- तीनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बंद शटरों के भीतर जलती सात जिंदगियां सिर्फ एक हादसा नहीं है; यह उस सिस्टम की भयावह तस्वीर है जिसमें नियम, कानून और मानवीय सरोकार- तीनों को लगातार ताक पर रखा जा रहा है।
यह कोई पहला मामला नहीं है। मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, बिहार और पश्चिम बंगाल ही नहीं, बल्कि देश के हर कोने में ऐसी अवैध फैक्टरियों, गोदामों और पटाखा इकाइयों में विस्फोट होते रहे हैं। ऐसे हादसों के बाद अधिकांश में जांच और कार्रवाई के नाम पर कुछ जिम्मेदार चिह्नित कर तबादले और एफआइआर की खानापूर्ति होती है, लेकिन एक न एक दिन पूरा मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। सवाल यह है कि क्या इससे व्यवस्था सुधरती है? जवाब साफ है- नहीं। देखा जाए तो यह हादसा सिस्टम की खामियों का पुलिंदा है।
प्रतिबंध के बावजूद अवैध पटाखा फैक्टरी आखिर कैसे संचालित हो रही थी? थाने से महज एक किलोमीटर दूर चल रही इस इकाई को न पुलिस और प्रशासन ने देखा, न ही श्रम और उद्योग विभाग ने। क्या यह महज लापरवाही है या सुनियोजित अनदेखी? क्या बिना संरक्षण के इतना खतरनाक कारोबार इतने समय तक चल सकता है?
यह सवाल केवल भिवाड़ी का नहीं, पूरे देश का है। हर हादसे के बाद फौरी कार्रवाई की जाती है। राहत राशि घोषित होती है, मुआवजा बांटा जाता है और जांच के आदेश दिए जाते हैं। लेकिन असली दोषियों तक पहुंचने का साहस बहुत कम दिखाई देता है। जिन अधिकारियों की निगरानी में यह सब चलता रहा, जिनकी आंखों के सामने अवैध उत्पादन, मजदूरों का शोषण और सुरक्षा मानकों की धज्जियां उड़ती रहीं- उन पर कानूनी शिकंजा कब कसेगा? केवल तबादला कोई सजा नहीं है; यह तो अपराध को ढकने का एक आसान रास्ता है।
सबसे दुखद पहलू यह है कि इन फैक्टरियों में काम करने वाले गरीब, असहाय और मजदूर तबके से आते हैं। रोजी-रोटी की तलाश में वे अपनी जान दांव पर लगाने को विवश होते हैं। न सुरक्षा उपकरण और प्रशिक्षण, न ही आपातकालीन इंतजाम- बस बारूद, चिंगारी और मौत के बीच उनका रोज का संघर्ष होता है।
जरूरत इस बात की है कि हर ऐसे हादसे के बाद अनदेखी के जिम्मेदारों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज किए जाएं। लाइसेंस प्रणाली, निरीक्षण व्यवस्था और स्थानीय पुलिस की भूमिका की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच हो। भिवाड़ी में सात जिंदगियों का खत्म होना चेतावनी है। सवाल यह नहीं कि हादसा क्यों हुआ, सवाल यह है कि हम ऐसे हादसे रोक क्यों नहीं पा रहे और इसका जवाब व्यवस्था की उस चुप्पी में छिपा है, जो बारूद से ज्यादा घातक बन चुकी है।