कई निर्णय पारिवारिक होते हैं। इन निर्णयों की कीमत भी वास्तविक होती है। यह फैसला केवल एक महिला की जीत नहीं है। यह उस विचार की जीत है जो श्रम को उसकी वास्तविकता में देखता है।
सोनम लववंशी, स्वतंत्र लेखिका एवं स्तंभकार
भारतीय समाज में एक अजीब भ्रम लंबे समय से पलता आ रहा है। घर अपने आप चलता है! रसोई अपने आप जलती है! बच्चे अपने आप बड़े हो जाते हैं! कपड़े अपने आप धुल जाते हैं! इस 'चमत्कार' का नाम है गृहिणी। वह हर जगह मौजूद रहती है। फिर भी आर्थिक गणना में उसका अस्तित्व शून्य रहता है। उसे 'काम' करते हुए देखा जाता है, किंतु उसे 'कमाते' हुए नहीं माना जाता। हाल ही दिल्ली हाईकोर्ट ने इस भ्रम को तोड़ दिया। अदालत ने कहा- नौकरी न करने वाली पत्नी को 'बेकार' नहीं कहा जा सकता। यह वाक्य केवल कानूनी टिप्पणी नहीं है। यह सामाजिक आईना है। इसमें वह चेहरा साफ दिखता है जिसे समाज देखने से बचता रहा है।
गृहिणी का श्रम भारतीय अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा अदृश्य स्तंभ है। वह सुबह की पहली रोशनी के साथ सक्रिय हो जाती है। उसका काम किसी टाइम कार्ड में दर्ज नहीं होता। उसे कोई अवकाश नहीं मिलता। उसे कोई बोनस नहीं मिलता। उसका प्रमोशन नहीं होता। उसका रिटायरमेंट नहीं होता। उसका काम जीवन भर चलता है। इस श्रम की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि यह सबसे अधिक आवश्यक है। फिर भी इसे सबसे कम महत्वपूर्ण माना जाता है। जब विवाह होता है, एक महिला केवल अपना घर नहीं बदलती, वह अपना समय बदलती है, अपनी प्राथमिकताएं बदलती है, कई बार अपना करियर छोड़ देती है।
वह यह निर्णय अकेले नहीं लेती। यह निर्णय सामाजिक अपेक्षाओं से आकार लेता है। परिवार की जरूरतें उसके सपनों से बड़ी बना दी जाती हैं। यह त्याग उस समय आदर्श कहलाता है। लेकिन बाद में निर्भरता कहकर खारिज कर दिया जाता है। अदालत ने इस दोहरे मापदंड को पहचानते हुए कहा- घरेलू काम को नजरअंदाज करना अन्याय है। यह काम वह आधार है जिस पर एक व्यक्ति का कॅरियर खड़ा होता है। पति की सफलता केवल उसकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं होती। उसके पीछे एक स्थिर घर होता है। उस घर के पीछे एक स्थिर महिला होती है। यह स्थिरता किसी वेतन से नहीं खरीदी जा सकती।
भारतीय समाज में आर्थिक योगदान की परिभाषा बहुत सीमित रही है। केवल वही श्रम मूल्यवान माना गया, जिसे बाजार ने स्वीकार किया। घर का श्रम बाजार के बाहर रहा। इसीलिए उसका मूल्य भी शून्य घोषित कर दिया गया। यह मूल्यांकन आर्थिक से अधिक मानसिक रहा है। यह सोच पितृसत्ता की गहराई से उपजी है। इस सोच ने श्रम को नहीं, श्रमिक को अदृश्य बना दिया। भरण-पोषण के मामलों में यह सोच और स्पष्ट दिखती है। एक महिला जब अपने अधिकार की मांग करती है, उससे उसकी योग्यता का प्रमाण मांगा जाता है। उससे पूछा जाता है, वह कमा क्यों नहीं रही। उससे यह नहीं पूछा जाता, उसने अब तक क्या दिया। उसके योगदान को भविष्य की संभावना से बदल दिया जाता है। उसकी वास्तविकता को उसकी संभावित क्षमता के पीछे छिपा दिया जाता है।
दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला इस मानसिकता पर सीधा प्रहार है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कमाने की क्षमता और कमाने की वास्तविकता अलग बातें हैं। यह अंतर केवल कानूनी नहीं है। यह जीवन की सच्चाई है। जीवन में हर निर्णय आर्थिक तर्क से नहीं लिया जाता। कई निर्णय भावनात्मक होते हैं। कई निर्णय पारिवारिक होते हैं। इन निर्णयों की कीमत भी वास्तविक होती है। यह फैसला केवल एक महिला की जीत नहीं है। यह उस विचार की जीत है जो श्रम को उसकी वास्तविकता में देखता है। यह उस मौन को आवाज देता है जो वर्षों से घर की दीवारों के भीतर कैद रहा। यह उस श्रम को पहचान देता है जिसे प्रेम और कर्तव्य के नाम पर मुफ्त में लिया गया।
भारतीय समाज एक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। महिलाएं शिक्षा प्राप्त कर रही हैं। वे कार्यस्थलों पर पहुंच रही हैं। फिर भी घर की जिम्मेदारी का बोझ उनके कंधों पर ही केंद्रित रहता है। यह दोहरा बोझ उनकी वास्तविक स्थिति को जटिल बनाता है। वे काम करें तो भी जिम्मेदार। वे घर संभालें तो भी जिम्मेदार। इस जिम्मेदारी का आर्थिक मूल्य फिर भी शून्य रहता है। अदालत ने इस शून्य को भरने की कोशिश की है। उसने कहा, घरेलू काम को बेकार नहीं कहा जा सकता। यह कथन एक कानूनी आदेश से अधिक है। यह सामाजिक घोषणा है। यह उस श्रम की स्वीकृति है जिसे लंबे समय तक स्वाभाविक मान लिया गया।
यह फैसला एक चेतावनी भी है। यह बताता है, समय बदल रहा है। घर चलाना केवल एक भावनात्मक कार्य नहीं है। यह एक संरचनात्मक कार्य है। यह एक आर्थिक कार्य है। यह एक सामाजिक कार्य है। इस कार्य का मूल्य धन से अधिक है। इस मूल्य की स्वीकृति न्याय की दिशा में पहला कदम है। समाज ने लंबे समय तक गृहिणी को सम्मान दिया। यह सम्मान अधूरा रहा। इसमें अधिकार शामिल नहीं थे। दिल्ली हाईकोर्ट ने इस सम्मान को अधिकार से जोड़ दिया है। यह जुड़ाव ही वास्तविक समानता की शुरुआत है।