
मिलिंद कुमार शर्मा, (प्रोफेसर) , प्रदीप कुमार शर्मा, (असिस्टेंट प्रोफेसर)
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि जिसे आज हम कबाड़ अथवा कचरा समझकर त्याग देते हैं, वही वास्तव में भविष्य की अर्थव्यवस्था का एक अमूल्य संसाधन है। लंबे समय तक हमारी अर्थव्यवस्था 'लीनियर मॉडल' पर आधारित रही है, जिसमें प्राकृतिक संसाधनों का दोहन, उत्पादों का अनवरत निर्माण, उनका निरंतर उपयोग और अंतत: उनका निस्तारण सम्मिलित था। नि:संदेह इस मॉडल ने जहां एक ओर औद्योगिक विकास को तो गति प्रदान की, परंतु दूसरी ओर इसके परिणामस्वरूप प्राकृतिक संसाधनों का निरंतर क्षय, बढ़ता प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर वैश्विक चुनौतियां भी देखने को मिली। परंतु अब समय एक नई आर्थिक सोच की स्वीकार्यता का है, जहां किसी उत्पाद का जीवनकाल केवल उसके उपयोग तक ही सीमित नहीं रहता, अपितु उसकी मरम्मत, पुन: उपयोग, पुनर्निर्माण और पुनर्चक्रण के माध्यम से उसे पुन: उत्पादन प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जाता है। इसी सतत एवं संसाधन-कुशल आर्थिक मॉडल को 'सर्कुलर इकोनॉमी' भी कहा जाता है।
इसे प्रभावी, पारदर्शी और विश्वसनीय बनाने में ब्लॉकचेन तकनीक सशक्त डिजिटल आधार के रूप में उभर रही है। यह उत्पादों और कच्चे माल की पूरी यात्रा का सुरक्षित एवं अपरिवर्तनीय डिजिटल रेकॉर्ड तैयार कर संसाधनों की ट्रेसेबिलिटी, आपूर्ति शृंखला की पारदर्शिता और पुनर्चक्रण की विश्वसनीयता सुनिश्चित करती है। दूरसंचार विभाग, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, नीति आयोग और उद्योग जगत तक ने ब्लॉकचेन, एआइ और डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसी तकनीकों के प्रयोग को सर्कुलर इकोनॉमी के लिए प्रभावी बताया है। भारत में तेजी से बढ़ते औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और बढ़ती जनसंख्या के चलते संसाधनों पर दबाव महसूस किया जा रहा है। नीति आयोग एवं द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट के अनुसार, 2024 में 6.19 मिलियन मीट्रिक टन ई-कचरा उत्पन्न हुआ, जो 2030 तक 14 मिलियन मीट्रिक टन होने का अनुमान है। लिथियम-आयन बैटरियों की मांग 2035 तक 248 गीगावाट-घंटे हो सकती है। वहीं, अनुपयोगी वाहनों की संख्या 2030 तक 5 करोड़ से अधिक होने की संभावना है। इनका प्रबंधन एवं पुनर्चक्रण पर्यावरण संरक्षण के साथ आर्थिक संभावनाएं पैदा कर सकता है।
ब्लॉकचेन तकनीक सर्कुलर इकोनॉमी को पारदर्शी और विश्वसनीय बनाती है। यह उत्पादों के कच्चे माल से लेकर पुनर्चक्रण तक का सुरक्षित डिजिटल रेकॉर्ड रखती है, जिससे पुन: उपयोग, पुनर्चक्रण, संसाधनों का संरक्षण और कार्बन उत्सर्जन में कमी संभव होती है। नीति आयोग ने ई-कचरे और लिथियम-आयन बैटरियों के लिए सर्कुलर इकोनॉमी रोडमैप तैयार किया है। भारत सरकार द्वारा लागू एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी व्यवस्था के तहत कंपनियों को अपने उत्पादों के उपयोग के बाद उत्पन्न कचरे के संग्रह और पुनर्चक्रण का दायित्व दिया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस व्यवस्था को ब्लॉकचेन से जोड़ा जाए तो प्रक्रिया पारदर्शी बन जाएगी। परंतु भारत में छोटे एवं मध्यम उद्योगों के लिए इस तकनीक की उच्च लागत, प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी तथा विभागों के बीच डेटा मानकीकरण जैसी चुनौतियां हैं। नि:संदेह नीति निर्धारकों को इनके समाधान खोजने होंगे।