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संपादकीय:स्वच्छ वायु रैंकिंग के बीच चुनौतियां बरकरार

भारत में पीएम 10 के लिए वार्षिक औसत मानक 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है। इसलिए किसी शहर में प्रदूषण में 40 प्रतिशत कमी आना तभी पर्याप्त माना जा सकता है, जब वह हवा की गुणवत्ता को सुरक्षित स्तर तक पहुंचाने में भी सफल हो।
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Updated: 10 Sep 2026, 3:49 PM IST
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केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की ओर से जारी स्वच्छ वायु सर्वेक्षण-2026 के आंकड़े बताते हैं कि देशभर में प्रदूषण की रोकथाम के लिए किए जा रहे प्रयासों का असर जमीन पर दिखने लगा है। राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) के तहत देश के 130 शहरों में से 108 की वायु गुणवत्ता में सुधार दर्ज होना बताता है कि हम सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। कई शहरों में पीएम 10 (10 माइक्रोमीटर या उससे छोटे कण) के स्तर में 40 प्रतिशत से अधिक की कमी भी उत्साह बढ़ाने वाली है। हालांकि इस तस्वीर का दूसरा पहलू चिंता पैदा करता है। कई शहरों में प्रदूषण घटने के बावजूद पीएम 10 का स्तर राष्ट्रीय मानकों तक नहीं पहुंचा है। इसका अर्थ है कि सुधार हुआ है, लेकिन मंजिल अभी दूर है।

राजधानी दिल्ली का 11 पायदान ऊपर आकर 21वें स्थान पर पहुंचना और दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में लखनऊ का शीर्ष पर रहना उल्लेखनीय है। वहीं आठ वर्ष तक शीर्ष पर रहे इंदौर का दूसरे स्थान पर आना बताता है कि स्वच्छ हवा की दौड़ में शहरों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। मगर इन उपलब्धियों के बीच यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि क्या शहरों की हवा वास्तव में सांस लेने लायक हो गई है? दरअसल, इस सर्वेक्षण की उपयोगिता इसलिए भी अधिक है कि इसमें केवल वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआइ) को आधार नहीं बनाया गया है। सड़क की धूल पर नियंत्रण, कचरा प्रबंधन, वाहन उत्सर्जन में कमी, निर्माण एवं विध्वंस अपशिष्ट का निस्तारण, जन-जागरूकता और पीएम 10 के वार्षिक स्तर में सुधार जैसे जमीनी प्रयासों को भी आकलन का हिस्सा बनाया गया है। भारत में पीएम 10 के लिए वार्षिक औसत मानक 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है। इसलिए किसी शहर में प्रदूषण में 40 प्रतिशत कमी आना तभी पर्याप्त माना जा सकता है, जब वह हवा की गुणवत्ता को सुरक्षित स्तर तक पहुंचाने में भी सफल हो। सबसे बड़ी चुनौती मौसम बदलने के साथ सामने आएगी। सर्दियों में दिल्ली-एनसीआर समेत उत्तर भारत के अनेक शहरों में प्रदूषण का स्तर अचानक बढ़ जाता है। तापमान में गिरावट, हवा की धीमी गति, पराली जलाने की घटनाएं और स्थानीय उत्सर्जन मिलकर हवा को जहरीला बना देते हैं। इसलिए अनुकूल मौसम की सफलता को पूरे साल की उपलब्धि मान लेना उचित नहीं होगा।

सड़कों पर बढ़ते वाहन, निर्माण स्थलों से उड़ती धूल, औद्योगिक गतिविधियां और खुले में कचरा जलाने जैसी समस्याएं किसी एक मौसम की देन नहीं हैं। इन पर पूरे वर्ष लगातार काम करना होगा। सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना, इलेक्ट्रिक और स्वच्छ ईंधन आधारित वाहनों को बढ़ावा देना और कचरा प्रबंधन की व्यवस्था को भी प्रभावी बनाना जरूरी है। स्वच्छ वायु सर्वेक्षण की बेहतर रैंकिंग निश्चित रूप से स्वागत योग्य है, लेकिन इसे मंजिल नहीं, दिशा का संकेत माना जाना चाहिए।

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10 Sep 2026, 3:49 PM IST
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