कुछ अंतरराष्ट्रीय शोध संस्थानों और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से जुड़े वैज्ञानिकों की ओर से किए गए अध्ययनों से यह संकेत मिलता है कि बढ़ता तापमान, विशेषकर गर्भावस्था के दौरान लड़कों के जन्म की संभावना को प्रभावित कर सकता है।
नृपेन्द्र अभिषेक नृप, स्वतंत्र लेखक एवं स्तंभकार
जलवायु परिवर्तन पर अब तक मुख्य रूप से पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और समाज पर पडऩे वाले प्रभावों के संदर्भ में चर्चा होती रही है। लेकिन हाल के वर्षों में किए गए शोधों ने इसके एक नए और अप्रत्याशित पहलू को सामने रखा है। यह पहलू है बढ़ते तापमान का जन्म के समय लिंग अनुपात पर प्रभाव। लिंग अनुपात से आशय उस संख्या से है, जिसमें यह देखा जाता है कि जन्म लेने वाले बच्चों में लड़कियों की संख्या लड़कों की तुलना में कितनी है। यह किसी भी समाज का एक महत्वपूर्ण जनसांख्यिकीय संकेतक होता है, जो जैविक, पर्यावरणीय और सामाजिक परिस्थितियों को दर्शाता है। कुछ अंतरराष्ट्रीय शोध संस्थानों और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से जुड़े वैज्ञानिकों की ओर से किए गए अध्ययनों से यह संकेत मिलता है कि बढ़ता तापमान, विशेषकर गर्भावस्था के दौरान लड़कों के जन्म की संभावना को प्रभावित कर सकता है। यह तथ्य इस बात को स्पष्ट करता है कि जलवायु परिवर्तन केवल मौसम और पारिस्थितिकी तंत्र को ही नहीं बदल रहा, बल्कि यह मानव जनसंख्या के स्वरूप को भी धीरे-धीरे प्रभावित कर सकता है।
एक बड़े अध्ययन में पांच मिलियन से अधिक जन्म के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया कि अधिक तापमान और लड़कों के जन्म की संख्या में कमी के बीच एक संबंध दिखाई देता है। इस शोध में भारत और उप-सहारा अफ्रीका के 33 देशों के आंकड़ों का अध्ययन किया गया। अध्ययन से यह निष्कर्ष निकला कि जब लंबे समय तक तापमान लगभग 20 डिग्री सेल्सियस से अधिक रहता है, तो लड़कों के जन्म की संभावना में थोड़ी कमी देखी जाती है। यह शोध एक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित हुआ और इसने काफी ध्यान आकर्षित किया, क्योंकि इसमें पहली बार पर्यावरणीय परिस्थितियों को सीधे जैविक परिणामों से जोड़कर देखा गया। भले ही यह बदलाव अल्पकाल में बहुत छोटा दिखाई देता हो, लेकिन बड़ी आबादी वाले देशों में यह छोटे-छोटे परिवर्तन भी लंबे समय में महत्वपूर्ण जनसांख्यिकीय प्रभाव डाल सकते हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार इसके पीछे एक संभावित कारण पुरुष भ्रूण की जैविक संवेदनशीलता हो सकती है। चिकित्सा विज्ञान के कई अध्ययनों में यह पाया गया है कि गर्भावस्था के दौरान पुरुष भ्रूण, महिला भ्रूण की तुलना में बाहरी तनाव और प्रतिकूल परिस्थितियों के प्रति अधिक संवेदनशील होता है। जब तापमान अधिक होता है, तो गर्भवती महिलाओं के शरीर पर अतिरिक्त शारीरिक दबाव पड़ता है। इससे शरीर में पानी की कमी, चयापचय प्रक्रिया में बदलाव और सामान्य स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है। इस प्रकार की परिस्थितियां गर्भ के शुरुआती चरणों में पुरुष भ्रूण के लिए अधिक जोखिम पैदा कर सकती हैं। इस प्रकार देखा जाए तो जलवायु परिवर्तन अप्रत्यक्ष रूप से लड़कों और लड़कियों के प्राकृतिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है। गर्भावस्था के दौरान गर्मी के संपर्क का समय भी इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
अध्ययन के अनुसार गर्भावस्था का पहला त्रैमासिक यानी शुरुआती तीन महीने पर्यावरणीय परिस्थितियों के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील होते हैं। यदि इस अवधि में गर्भवती महिला लंबे समय तक अधिक गर्मी के संपर्क में रहती है, तो गर्भपात या भ्रूण के विकास में समस्याओं की संभावना बढ़ सकती है। विशेष रूप से पुरुष भ्रूण इस स्थिति में अधिक प्रभावित हो सकता है। इसका यह अर्थ नहीं है कि गर्मी सीधे बच्चे का लिंग निर्धारित करती है, बल्कि यह उन गर्भधारणों को प्रभावित कर सकती है जो अंतत: सुरक्षित रूप से जन्म तक पहुंच पाते हैं। हालांकि यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि तापमान और लिंग अनुपात के बीच संबंध अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुआ है। जन्म के परिणामों को कई कारक प्रभावित करते हैं, जैसे आनुवंशिकी, मातृ स्वास्थ्य, पोषण और चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता। इसलिए तापमान को इस प्रक्रिया का एकमात्र कारण नहीं माना जा सकता। यद्यपि अभी तक देखे गए परिवर्तन बहुत बड़े नहीं हैं, फिर भी वे हमें यह समझने के लिए प्रेरित करते हैं कि जलवायु परिवर्तन मानव समाज को कितने सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण तरीकों से प्रभावित कर सकता है।