
क्या सांस्कृतिक विविधता किसी देश के विकास में बाधक हो सकती है? और विकास की किसी परिभाषा के अनुसार यदि ऐसा हो भी तो, क्या 'जातीय एकता' के नाम पर इसे समाप्त करते हुए कथित विकास के नए-नए सोपान गढऩा बुद्धिमानी है? देश की मजबूती के नाम पर विभिन्न सांस्कृतिक अस्मिता को किसी एक बड़ी पहचान में समाहित करने का प्रयास क्या मानव सभ्यता की प्रगति के इतिहास और भावी संभावनाओं पर हमेशा के लिए पूर्ण-विराम लगाने जैसा नहीं होगा? ऐसे कई प्रश्न हैं जिन पर विचार करने का समय आ गया है क्योंकि कुछ देशों में सरकारों के सोचने का तरीका ऐसा ही होता जा रहा है। चीन में 'जातीय एकता' कानून की मंजूरी के बाद दुनियाभर में फिर से यह चर्चा शुरू हो गई है। चीन अमरीका को पछाड़कर दुनिया का 'नया दादा' बनने की इच्छा रखता है। इसके रास्ते की हर असुविधा को दूर करने का अतार्किक प्रयास वहां के अल्पसंख्यकों के लिए खतरे की घंटी बजा रहा है।
चीन की नेशनल पीपुल्स कांग्रेस ने 'जातीय एकता' कानून मंजूर किया है। इसका अघोषित उद्देश्य 1949 से मान्यता प्राप्त जातीय विविधता को खत्म करना है, ताकि अल्पसंख्यक समुदायों की अगली पीढ़ी अपनी भाषा और संस्कृति से अलग-थलग पड़ जाए और उन्हें बहुसंख्यक 'हान' जाति की संस्कृति के अनुरूप ढाला जा सके। चीन में 56 जातीय समूह हैं, जिनमें हान आबादी 91 फीसदी से अधिक है। अन्य 55 अल्पसंख्यक समूह (जैसे तिब्बती, उइगर, मंगोल, हुई, मांचू आदि) देश के लगभग आधे भू-भाग पर रहते हैं, जो प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है। नया कानून अल्पसंख्यकों को अपनी विशिष्ट पहचान छोडऩे और बहुसंख्यक 'हान' जीवनशैली को अपनाने के लिए मजबूर करने वाला है। स्कूली बच्चों के लिए मंदारिन पढऩा अनिवार्य किया गया है जबकि, पहले वे मातृभाषा में पढ़ते थे। उन माता-पिता पर भी मुकदमा चलेगा, जो अपने बच्चों को कानून के अनुसार 'जातीय एकता के लिए हानिकारक' शिक्षा देंगे।
राष्ट्रपति शी जिनपिंग अल्पसंख्यकों का कथित 'चीनीकरण' करना चाहते हैं। इसके तहत तिब्बत, शिनजियांग व इनर मंगोलिया जैसे क्षेत्रों में अल्पसंख्यकों के अधिकारों को प्रतिबंधित किया गया। तिब्बत में तो मठों को सरकारी नियंत्रण में लेते हुए हजारों बौद्ध भिक्षुओं को गिरफ्तार भी किया गया था। उइगर मुस्लिमों को भी बुनियादी अधिकारों से वंचित रखते हुए करीब 10 लाख गिरफ्तारियां की गईं। चीन सरकार एक ऐसा समरूप समाज बनाने की कोशिश कर रही है, जिसमें कम्युनिस्ट पार्टी और हान संस्कृति ही सर्वोपरि हो सके और अन्य समुदायों की परंपराएं, भाषा और पहचान खत्म हो जाए। यह निश्चित रूप से भारत सहित उस दुनिया के लिए चिंता की बात होनी चाहिए जो 'विविधता में एकता' के सिद्धांत के साथ प्रगति के रास्ते खोज रही है क्योंकि, अमानवीय सोच से 'मशीनी विकास' हो भी जाए तो उसका कोई मूल्य नहीं रहेगा।