
सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियां किस तरह मूल्यों को तहस-नहस करके किसी व्यक्ति को पतन की ओर ले जाती हैं और कैसे किसी एक की बदहाली किसी अन्य के लिए अवैध कमाई का ‘मौका’ बन जाती है, इसे समझने के लिए दिल्ली के रोहिणी स्थित एक अस्पताल की करतूत को देखा जा सकता है। दिल्ली पुलिस ने शिशुओं की तस्करी करने वाले रैकेट का पर्दाफाश किया है। यह रैकेट राजस्थान-गुजरात सहित देश के सुदूर आदिवासी क्षेत्रों में जरूरत की मारी महिलाओं को अपना बच्चा बेचने के लिए प्रोत्साहित करता था तो नि:संतान दंपतियों को बच्चा खरीदने के लिए भी। पूरी प्रक्रिया में महिला डॉक्टर ऐसे नि:संतान दंपतियों को असली माता-पिता साबित करने के उद्देश्य से अपने 'हीरा मल्टी स्पेशलिटी हॉस्पिटल' का इस तरह इस्तेमाल कर रही थी कि सारे कागजी सबूत खरीदे गए शिशुओं को वैध साबित कर सके और बांझ महिलाओं को सामाजिक तानों से भी बचा सके। देखने वाली बात तो यह भी है कि कैसे आम नागरिक की थोड़ी-सी सजगता अपराध के संगठित नेटवर्क को नेस्तनाबूद कर सकती है।
पहाडग़ंज रेलवे स्टेशन क्षेत्र में एक आम नागरिक ने एक महिला को एक शिशु के साथ जाते देखा था और दो सप्ताह के बाद उसी को किसी दूसरे शिशु के साथ जाते देखा तो संदेह हुआ और उसने पुलिस को सतर्क कर दिया। पुलिस ने महज 15 दिन बाद बड़े रैकेट का भंडाफोड़ कर दिया। तेरह लोगों को गिरफ्तार कर पांच शिशुओं को बचा लिया गया। आशंका है कि अब तक 30 शिशुओं की तस्करी हो चुकी है। जांच में सामने आया कि रैकेट से जुड़े लोग संतान के लिए तरस रहे जोड़ों की पहचान के लिए आइवीएफ केंद्रों और फर्टिलिटी क्लीनिकों पर नजर रखते थे। इन जोड़ों को शिशुओं की पेशकश के साथ-साथ धोखाधड़ी का तरीका भी सिखाते थे। ऐसी महिलाएं अपने नाते-रिश्तेदारों के सामने गर्भवती होने का नाटक करती थीं और अस्पताल में उनकी औपचारिक फाइल खुल जाती थी। सारे कागजी सबूत असली की तरह तैयार किए जाते और समय आने पर तस्करी से लाए गए शिशु उन्हें सौप दिए जाते।
इस पूरे प्रकरण में दो अलग-अलग सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि में निवास करने वाली महिलाओं की त्रासदी को संवेदनशील नजरिए से देखने की जरूरत है। एक तरफ पढ़ी-लिखी संभ्रांत और धनी परिवार की महिलाएं हैं जिन्हें कथित बांझपन के उलाहने से इतना डर लगता है कि इससे मुक्ति के लिए उन्हें आपराधिक षड्यंत्र में शामिल होना भी मंजूर है। दूसरी तरफ, गरीब और अनपढ़ आदिवासी महिलाएं हैं जिन्हें अपने कलेजे के टुकड़े को किसी और के हवाले करने से भी परहेज नहीं है। अपने गर्भ में पल रहे 'अजन्मे' की बोली लगाने के उनके निर्णय में कहीं न कहीं बच्चे का भविष्य सुरक्षित रखने की 'ममता' भी शामिल है। यह कहने से गुरेज नहीं करना चाहिए कि दोनों ही पृष्ठभूमि की महिलाएं मानवीय मूल्यों के पतन का 'आसान शिकार' हैं।
Published on:
21 Jun 2026 08:20 pm
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