
के.एस. तोमर, सामरिक मामलों के स्तंभकार एवं वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक
अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के बीच हुआ शांति समझौता उस समय सामने आया जब पश्चिम एशिया युद्ध की लपटों में घिरकर वैश्विक स्थिरता के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका था। कई सप्ताह तक चली लड़ाई ने क्षेत्र को ऐसे ज्वालामुखी में बदल दिया था, जिसकी हर नई विस्फोटक घटना दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिला रही थी। तेल बाजारों में भारी उथल-पुथल थी, निवेशकों में घबराहट बढ़ रही थी और वैश्विक मंदी की आशंकाएं गहराने लगी थीं। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो विश्व अर्थव्यवस्था एक संकरे पुल पर खड़ी हो, जिसके नीचे अनिश्चितता और संकट की गहरी खाई हो। ऐसे में यह समझौता दुनिया को बड़े आर्थिक और सामरिक तूफान से मिली अस्थायी राहत है। यदि संघर्ष और लंबा खिंचता, तो ऊर्जा आपूर्ति, व्यापारिक गतिविधियों और महंगाई पर उसका असर पूरी दुनिया को नई आर्थिक उथल-पुथल की ओर धकेल सकता था। समझौते ने फिलहाल उस खतरे को टाल दिया है, लेकिन इसके राजनीतिक और सामरिक प्रभाव दूरगामी होंगे।
ईरान को बड़ी रणनीतिक बढ़त
सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि इस समझौते ने ईरान को बड़ी रणनीतिक बढ़त दिलाई है, अमरीका की वैश्विक प्रतिष्ठा पर प्रश्नचिह्न लगाए हैं, इजराइल को असहज स्थिति में पहुंचाया है और इराक जैसे देशों को लगभग मझधार में छोड़ दिया है। इस समझौते से सबसे अधिक लाभ पाने वाले देशों में भारत प्रमुख है। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए पश्चिम एशिया पर अत्यधिक निर्भर है। युद्ध के दौरान तेल आपूर्ति बाधित होने और कीमतों में भारी वृद्धि की आशंका ने नई दिल्ली की चिंता बढ़ा दी थी। तेल की कीमतों में कुछ ही दिनों के अंतराल में थोड़ी-थोड़ी बढ़ोतरी भी करनी पड़ी थी। शांति समझौते के बाद तेल कीमतों पर दबाव कम होगा, आयात बिल नियंत्रित रहेगा और मुद्रास्फीति के प्रबंधन में सरकार को मदद मिलेगी। खाड़ी देशों में कार्यरत लाखों भारतीयों की सुरक्षा को लेकर बनी चिंताएं भी कम होंगी। इसलिए यह समझौता भारत के लिए आर्थिक और सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
अमरीका की अजेयता की छवि कमजोर
युद्ध के परिणामों का विश्लेषण किया जाए तो सबसे बड़ा लाभार्थी ईरान है। अमरीका और इजरायल के सैन्य दबाव, आर्थिक प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय अलगाव के बावजूद तेहरान न केवल अपने राजनीतिक ढांचे को बचाने में सफल रहा बल्कि उसने अपने विरोधियों को वार्ता की मेज पर आने के लिए भी मजबूर कर दिया। ईरान अब अपने नागरिकों के सामने यह दावा कर सकता है कि उसने दुनिया की सबसे शक्तिशाली सैन्य ताकत के दबाव के सामने घुटने नहीं टेके। ईरानी नेतृत्व इसे प्रतिरोध की जीत के रूप में पेश करेगा। पश्चिम एशिया और विकासशील देशों में यह धारणा मजबूत होगी कि ईरान ने सैन्य शक्ति से अधिक राजनीतिक धैर्य और रणनीतिक दृढ़ता का परिचय दिया। इस समझौते ने अमरीका की अजेयता की छवि को अवश्य कमजोर किया है। वियतनाम युद्ध, इराक अभियान और अफगानिस्तान से अव्यवस्थित वापसी के बाद यह एक और ऐसा अवसर है जिसने दुनिया को दिखाया कि केवल सैन्य शक्ति हमेशा राजनीतिक परिणाम सुनिश्चित नहीं कर सकती। वाशिंगटन ने दबाव बनाया और अपनी ताकत का प्रदर्शन किया, लेकिन अंतत: उसे समझौते का रास्ता अपनाना पड़ा। इससे दुनिया के कई देशों में यह संदेश गया है कि अमरीका अब पहले की तरह अपनी शर्तों पर परिणाम थोपने में सक्षम नहीं रहा। चीन और रूस जैसे प्रतिद्वंद्वी देश इस घटनाक्रम को अमरीकी प्रभाव में आई गिरावट के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करेंगे। यह समझौता केवल एक शांति दस्तावेज नहीं बल्कि बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन का संकेत भी है। डॉनल्ड ट्रंप इस समझौते को अपनी बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि के रूप में पेश करेंगे। वह दावा कर सकते हैं कि उन्होंने एक बड़े युद्ध को रोका, वैश्विक अर्थव्यवस्था को संकट से बचाया और अमरीकी सैनिकों को लंबे संघर्ष में फंसने से रोक दिया। यदि समझौता सफल रहता है तो इसका राजनीतिक लाभ उन्हें आगामी मध्यावधि चुनावों में भी मिल सकता है।
नेतन्याहू के लिए स्थिति राजनीतिक रूप से असहज
इस पूरे घटनाक्रम में यदि कोई देश सबसे अधिक निराश दिखाई देता है तो वह इजरायल है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू लंबे समय से यह तर्क देते रहे हैं कि ईरान की परमाणु और मिसाइल क्षमताएं इजरायल के लिए अस्तित्व खतरा हैं। इजरायल को उम्मीद थी कि युद्ध के परिणामस्वरूप ईरान की सामरिक शक्ति को निर्णायक रूप से कमजोर किया जाएगा। लेकिन समझौते के बाद ईरान न केवल कायम है बल्कि स्वयं को विजेता के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। इससे इजरायल के भीतर यह बहस तेज हो सकती है कि क्या अमरीका ने क्षेत्रीय स्थिरता को उसकी सुरक्षा चिंताओं से अधिक महत्त्व दिया। नेतन्याहू के लिए यह स्थिति राजनीतिक रूप से असहज हो सकती है। इस समझौते का एक महत्त्वपूर्ण पहलू इजरायल की स्थिति है। पूरे संघर्ष के दौरान इजरायल पर दबाव था कि वह अमरीका और ईरान के बीच संतुलन बनाए रखे। उसके भूभाग और राजनीतिक व्यवस्था पर युद्ध के प्रभाव स्पष्ट दिखाई दे रहे थे। लेकिन अंतिम समझौते में इजरायल की चिंताओं को विशेष महत्त्व मिलता नहीं दिखता। इससे इजरायल में यह भावना पैदा हो सकती है कि बड़ी शक्तियां अपने हितों के अनुसार समझौते कर लेती हैं जबकि क्षेत्रीय देशों की चिंताएं पीछे छूट जाती हैं।
संघर्ष समाप्त नहीं, नए चरण में प्रवेश
इस समझौते में पाकिस्तान ने एक अप्रत्याशित मध्यस्थ की भूमिका निभाई। इससे पाकिस्तान की कूटनीतिक प्रतिष्ठा को कुछ लाभ अवश्य मिलेगा। चीन भी इस समझौते का स्वागत करेगा क्योंकि पश्चिम एशिया में स्थिरता उसके ऊर्जा और व्यापारिक हितों के लिए आवश्यक है। हालांकि समझौते पर हस्ताक्षर हो चुके हैं, लेकिन इसकी सफलता अभी सुनिश्चित नहीं है। दशकों की शत्रुता एक दस्तावेज से समाप्त नहीं हो सकती। दोनों पक्ष एक-दूसरे की गतिविधियों पर कड़ी नजर रखेंगे और किसी भी छोटे उल्लंघन से तनाव दोबारा भडक़ सकता है। दोनों देशों के भीतर मौजूद कट््टरपंथी समूह भी समझौते को कमजोर करने का प्रयास करेंगे।
फिलहाल इतना निश्चित है कि दुनिया को युद्ध से राहत मिली है, भारत को ऊर्जा सुरक्षा का भरोसा मिला है, ट्रंप को राजनीतिक उपलब्धि प्राप्त हुई है और ईरान ने स्वयं को क्षेत्रीय शक्ति के रूप में और मजबूती से स्थापित कर लिया है। लेकिन पश्चिम एशिया का संघर्ष समाप्त नहीं हुआ, बल्कि एक नए चरण में प्रवेश कर गया है। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि यह समझौता स्थायी शांति की नींव बनता है या केवल एक लंबे संघर्ष का अस्थायी विराम साबित होता है।
Published on:
21 Jun 2026 08:32 pm
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