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सड़कों को न बनने दें ‘मौत का गलियारा’

वाहनों की गति सीमा, लेन सिस्टम, सीट बैल्ट जैसे प्रावधान व शराब पीकर वाहन चलाने वालों के लिए सख्त सजा का प्रावधान होने के बावजूद जब सड़कें ‘मौत का गलियारा’बनती दिखे तो साफ लगता है कि ये सब कागजों की शोभा ज्यादा बढ़ा रहे हैं।

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Rajasthan Roadways Bus Crash

patrika file photo

वाहनों की गति सीमा, लेन सिस्टम, सीट बैल्ट जैसे प्रावधान व शराब पीकर वाहन चलाने वालों के लिए सख्त सजा का प्रावधान होने के बावजूद जब सड़कें ‘मौत का गलियारा’बनती दिखे तो साफ लगता है कि ये सब कागजों की शोभा ज्यादा बढ़ा रहे हैं। राजधानी जयपुर में सीकर रोड पर नींदड़ मोड़ पर हुए हादसे की तस्वीरें सचमुच विचलित करने वाली हैं। जिस ट्रेलर ने बाइक सवार मां-बेटे को कुचला उसके चार माह में ही तीन चालान हो गए थे। इसके बावजूद जिम्मेदारों की लापरवाही से वह सडक़ों पर दौड़ाया जा रहा था। नींदड़ मोड़ पर जहां हादसा हुआ वहां सडक़ इंजीनियरिंग के पैमाने न जाने कहां हवा हो गए थे। यातायात प्रबंधन में सुधार तो दूर की बात है।

नियम-कायदों की अनदेखी जहां भी होगी वहां हादसे होने तय है। प्रदेश भर में आए दिन हो रहे सडक़ हादसे साफ बताते हैं कि सडक़ सुरक्षा के ठोस प्रयासों की दरकार है। तेज रफ्तार वाहन सडक़ों पर यमदूतों की तरह दौड़ते हैं। संकट यह भी कि हादसों के ब्लेक स्पॉट तो तय हो जाते हैं लेकिन यहां हादसे न हो इस बात के इंतजाम या तो होते ही नहीं या फिर आधे-अधूरे।

जो जिम्मेदार हैं उनके लिए ये हादसे महज आंकड़ों में बदल जाते हैं और हादसों में मरने वालों के परिजनों की पीड़ा सरकारी फाइलों में बंद होकर रह जाती है। राजमार्ग ही नहीं बल्कि शहरों के अंदरुनी इलाकों में भी हादसों की रफ्तार कम नहीं। पैदल चलने वालों की तो ज्यादा मुसीबत है।

पिछले दिनों ही नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़े सामने आए थे जिसमें बताया गया था कि पैदल यात्रियों के लिए जिस जेब्रा क्रॉसिंग को सबसे सुरक्षित माना जाता है वहां भी अकेले राजस्थान में ही हादसों में मौतों की संख्या में 74 फीसदी तक की वृद्धि हुई है। इस वर्ष की शुरुआत में ही ये चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए थे कि पिछले दो वर्ष में ही राजस्थान की सडक़ों पर 23 हजार से ज्यादा लोग कुचले गए।

हैरत की बात यह है कि प्रदेश में भारी वाहन चालकों का लाइसेंस बनाने के लिए ट्रेनिंग ट्रैकर तक नहीं और धड़ल्ले से लाइसेंस बनाए जाते हैं। जब कोई हादसा होता है तब ही सडक़ सुरक्षा नियमों की परवाह की जाती है और फिर वही ढाक के तीन पात। हादसे थामने है तो यातायात नियमों की सख्ती से पालना सुनिश्चित करनी ही होगी।

हरीश पाराशर