पिछले दिनों मंत्री से लेकर नौकरशाह तक साइकिल से कार्यालय आते-जाते दिखे, लेकिन ऐसा न हो कि यह मात्र दिखावा बन कर रह जाए। सबसे बड़ी परेशानी यह है कि हमारे यहां सडक़ बनाने की मौजूदा अवधारणा में न तो पैदल चलने वालों की चिंता की जाती है और न ही साइकिल जैसे सर्वसुलभ साधन से आवागमन की राह बनाई जाती है। हकीकत तो यह है कि हमारे यहां सडक़ों को सिर्फ चौपहिया वाहनों के हिसाब से ही डिजाइन किया जाता है। हां, कुछ महानगरों में साइकिल को प्रोत्साहन देने के लिए अलग ट्रेक भी बने हैं लेकिन वे भी जरूरत के हिसाब से नाकाफी हैं।
वैश्विक ऊर्जा संकट को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर विभिन्न स्तरों पर पेट्रोल-डीजल की खपत में मितव्ययिता के प्रयास शुरू हो गए हैं। जनप्रतिनिधियों के काफिलों में वाहनों की संख्या कम करने से लेकर, कार पूल करने, सरकारी व निजी दफ्तरों में वर्क फ्रॉम होम को बढ़ावा देने व साइकिल सवारी जैसे प्रयास भी शुरू हुए हैं। भारत ही नहीं दुनिया भर के शहरों में सडक़ों पर वाहनों की रेलमपेल ने यातायात की समस्या तो खड़ी की ही है, प्रदूषण की समस्या भी बढ़ी है। जाहिर है वाहनों का हवा में घुलता धुआं लोगों की सेहत के लिए भी बड़ा खतरा बनकर सामने आता रहा है। ऐसे में जब वाहनों की बढ़ती संख्या के आगे सडक़ें छोटी पड़ती जा रही हों तब वैकल्पिक साधनों में साइकिल की सवारी सबसे मुफीद नजर आती है। चिंता की बात यह है कि ‘गरीबों की सवारी’ मानते हुए सरकारी स्तर पर साइकिल से आवागमन को बढ़ावा देने के प्रयास मन से कभी हुए ही नहीं।
प्रधानमंत्री मोदी पांच देशों की अपनी यात्रा के दौरान नीदरलैंड भी पहुंचे थे। वही नीदरलैैंड जहां चाहे कोई आम हो या खास, यथासंभव आवागमन में साइकिल की सवारी पसंद करता है। यहां आम जनता ही नहीं देश के प्रधानमंत्री व दूसरे राजनेता तक साइकिल चलाते नजर आ जाएंगे। सत्तर के दशक के पहले तक नीदरलैंड में भी सडक़ों पर कारों की भरमार थी। वर्ष 1973 के वैश्विक तेल संकट का मुकाबला करने के लिए साइकिल को बढ़ावा दिया गया और नतीजा यह है कि आज नीदरलैंड में हजारों किलोमीटर लंबे साइकिल ट्रेक हैं। भारत जैसे देश में जहां सडक़ें साइकिल सवारों के लिए असुरक्षित समझी जा रही हों वहां साइकिल को बढ़ावा देना इतना आसान नहीं लगता। पिछले दिनों मंत्री से लेकर नौकरशाह तक साइकिल से कार्यालय आते-जाते दिखे, लेकिन ऐसा न हो कि यह मात्र दिखावा बन कर रह जाए। सबसे बड़ी परेशानी यह है कि हमारे यहां सडक़ बनाने की मौजूदा अवधारणा में न तो पैदल चलने वालों की चिंता की जाती है और न ही साइकिल जैसे सर्वसुलभ साधन से आवागमन की राह बनाई जाती है। हकीकत तो यह है कि हमारे यहां सडक़ों को सिर्फ चौपहिया वाहनों के हिसाब से ही डिजाइन किया जाता है। हां, कुछ महानगरों में साइकिल को प्रोत्साहन देने के लिए अलग ट्रेक भी बने हैं लेकिन वे भी जरूरत के हिसाब से नाकाफी हैं।
लोगों को सेहत की फिक्र है और वे यह भी जानते हैं कि साइकिल सवारी व्यायाम का बेहतरीन माध्यम है। लेकिन चाहते हुए भी सडक़ों पर साइकिल उतारने से कतराते हैं। अभिभावक अपने बच्चों को घर के पास भी स्कूल जाने के लिए साइकिल नहीं देना चाहते क्योंकि उन्हें सडक़ें सुरक्षित नहीं लगतीं। जरूरत इस बात की है कि सुरक्षित और बेहतर साइकिल लेन बने। साथ ही, सामाजिक स्तर पर भी साइकिल सवारी को सम्मान के नजरिए से देखा जाए तो सेहत की रक्षा के साथ ईंधन बचत की दिशा में बड़ा काम हो सकता है।