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संपादकीय: कमेटियों के काम में देरी से बढ़ रहा अरावली का दर्द

भूजल, वनस्पति, जैव विविधता, धूल और मरुस्थलीकरण को रोकने से लेकर आसपास के शहरों की जलवायु तक इसका असर पहाड़ की सीमा से बहुत बाहर तक जाता है।
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Sep 09, 2026
aravali
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सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाडिय़ों की परिभाषा तय करने और इनके संरक्षण का सुझाव देने के लिए बनी हाई-पावर कमेटी को और समय देने से इनकार कर दिया है। कमेटी का समय बढ़ाने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की यह तल्ख टिप्पणी कि 'क्या आप इतनी लंबी तारीख मांगकर मेरे रिटायरमेंट का इंतजार कर रहे हैं' कमेटियों के कामकाज में होने वाले विलंब की प्रवृत्ति पर परोक्ष रूप से चोट है। हमारे यहां तो यह कहा भी जाता रहा है कि किसी समस्या के समाधान की राह निकालने के बजाय मुद्दे को लंबा खींचना हो तो कमेटी बना दो और मामला ज्यादा गंभीर हो तो कमेटी को 'हाई पावर' कर दो। काम पूरा न हो तो समय बढ़वाते रहो ताकि रिपोर्ट का इंतजार ही होता रहे।

अरावली को लेकर सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई ने ऐसी ही परिपाटी की विडंबनापूर्ण तस्वीर सामने रख दी है। मुख्य न्यायाधीश की यह टिप्पणी सिर्फ समय विस्तार की मांग पर नाराजगी ही नहीं है, बल्कि उस प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर भी सवाल है, जिसमें समय कभी-कभी समस्या के समाधान के बजाय उसे टालने का औजार बन जाता है। साथ ही यह आशंका भी सामने आती है कि कहीं व्यवस्था सही फैसले की जगह मनमाफिक फैसले के इंतजार में तो तारीखें नहीं बढ़वाती रहती। अरावली कोई कागज पर खींची जाने वाली एक रेखा नहीं है। यह देश की सबसे पुरानी पर्वत शृंखलाओं में से एक है, जो राजस्थान से होते हुए हरियाणा और दिल्ली तक पर्यावरणीय संतुलन की महत्वपूर्ण कड़ी है। भूजल, वनस्पति, जैव विविधता, धूल और मरुस्थलीकरण को रोकने से लेकर आसपास के शहरों की जलवायु तक इसका असर पहाड़ की सीमा से बहुत बाहर तक जाता है। एक तरफ अरावली की पहाडिय़ों पर अतिक्रमण और अवैध गतिविधियों का दबाव लगातार बना हुआ है और दूसरी तरफ चिंता इस बात की है कि उसे बचाने के लिए बनी हाई-पावर कमेटी को अपनी रिपोर्ट के लिए छह महीने और चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का कमेटी के समय विस्तार से इनकार करना महत्वपूर्ण है। पर्यावरण जैसे मामलों में 'तारीख पर तारीख' का सिलसिला नहीं चल सकता। सवाल सिर्फ किसी एक मामले से जुड़ी कमेटी का नहीं है। सवाल उस पूरी कार्यशैली का है, जिसमें 'हाई-पावर' नाम तो बड़ा होता है, लेकिन जवाबदेही अक्सर उतनी ही छोटी। जटिल विषयों पर विशेषज्ञों की राय जरूरी है लेकिन कमेटी टाइम पास करने वाली न हो।

जरूरत इस बात की है कि सरकार के हर स्तर पर नीति निर्धारक कमेटियों की पक्की जवाबदेही तय हो। समय मांगा जाए तो यह भी बताया जाए कि अब तक क्या हुआ और अतिरिक्त समय में क्या पूरा होगा। अरावली के मामले में तो सबसे ज्यादा जरूरत इस बात की है कि जब तक रिपोर्ट तैयार हो, तब तक यहां प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों पर कतई ढील न मिले। प्रकृति के पास नुकसान की भरपाई की कोई तारीख नहीं होती।

Updated on:
09 Sept 2026 05:14 pm
Published on:
09 Sept 2026 05:14 pm