ओपिनियन

प्रत्यक्ष : सहमति

महाराज द्रुपद और धृष्टद्युम्न को भी इससे कोई विरोध नहीं होगा।Ó 'यदि इन सब बातों को महत्व दिया जाए तो मेरा विचार है कि प्रधान सेनापति का पद धृष्टद्युम्न को दिया जाना चाहिए।

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Jul 15, 2015
महाराज द्रुपद और धृष्टद्युम्न को भी इससे कोई विरोध नहीं होगा।Ó 'यदि इन सब बातों को महत्व दिया जाए तो मेरा विचार है कि प्रधान सेनापति का पद धृष्टद्युम्न को दिया जाना चाहिए।Ó

अर्जुन ने भीम की उग्रता के ठीक विपरीत मंद और मधुर स्वर में कहा, 'वैसे तो सबसे पहले महाराज द्रुपद का नाम आना चाहिए था किंतु समर्थ होने पर भी वे वृद्ध हैं उन पर इतने बड़े युद्ध का भार नहीं डाला जाना चाहिए। यह उनके लिए कष्टकर हो सकता है। हम अपनी विजय के लिए उनके प्राणों को दांव पर लगाना नहीं चाहेंगे। धृष्टद्युम्न अभी युवक हैं, समर्थ हैं। आचार्य द्रोण के वध के लक्ष्य से अग्निकुंड में से जन्मे हैं। प्रतिशोध की भावना उनमें भी कम नहीं है।Ó

'मैं भी समझता हूं कि सबसे पहले यह अधिकार महाराज द्रुपद का ही है।Ó नकुल ने कहा, 'वे अवस्था में बड़े हैं। वीर और अनुभवी हैं। मूल विरोध तो उनका ही है। उनकी आज्ञा के अधीन रहकर युद्ध करने में किसी का स्वाभिमान आहत नहीं होगा।Ó'तुम्हारा क्या विचार है बुद्धिमान सहदेव?Ó

युधिष्ठिर ने पूछा। 'मैं समझता हूं कि हम लोग मत्स्यराज विराट की भूमि पर स्थित हैं और उनकी सेना तथा परिवार की हमें पूरी सहायता है।Ó सहदेव ने कहा, 'वे युद्ध में कुशल और वीर हैं। हमें उनकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।Ó

'महाराज विराट के प्रति, मेरे मन में पूर्ण सम्मान है, किंतु सहदेव ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि मत्स्य सेना की सारी वीरता तो कीचक के कारण थी। सुशर्मा कीचक से पीडि़त था, मत्स्यराज से नहीं।Ó

भीम ने कहा, 'भावना अपने स्थान पर है किंतु हम को यह युद्ध जीतना है, मात्र अपनी कृतज्ञता का प्रदर्शन नहीं करना है। मैंने मत्स्यराज को सुशर्मा से युद्ध करते देखा है। मुझे नहीं लगता कि वे सात अक्षौहिणी सेना का, ग्यारह अक्षौहिणी सेना के विरुद्ध नेतृत्व कर पाएंगे।Óसब मौन थे। 'हमारे पास अभी तीन नाम और भी है।Ó युधिष्ठिर बोले, 'सात्यकी, चेकितान और भीम।Ó

'यद्यपि मध्यम पांडव के नेतृत्व में आगे बढ़ने वाला सैनिक विजय के प्रति सबसे अधिक आश्वस्त हो सकता है किंतु उनका नाम मैं प्रधान सेनापति के लिए प्रस्तावित नहीं कर रहा।Ó कृष्ण बोले, 'मैं चाहता हूं कि वे प्रधान सेनापति का भी अनुशासन करें। सात्यकी के शौर्य के विषय में मुझे तनिक भी संदेह नहीं है किंतु वह अवस्था में छोटा है और उसमें धैर्य का अभाव हो सकता है। उसके गुरु उसकी आज्ञा के अधीन होकर लड़ें, यह बहुत न्यायसंगत व्यवस्था नहीं है। फिर उसके सेनापति बनने से यादवों की राजनीति आपके लिए घातक हो सकती है। चेकितान के पास भी व्यक्तिगत शौर्य ही है जो पांडवों की सेना का प्रधान सेनापति बनने के लिए पर्याप्त नहीं है।Ó

'तो फिर कृष्ण ही प्रधान सेनापति का नाम बताएं।Ó युधिष्ठिर बोले सबने कृष्ण की ओर देखा। 'मैं समझता हूं कि प्रधान सेनापति पद के लिए धृष्टद्युम्न ही सर्वश्रेष्ठ योद्धा हैं।Ó कृष्ण बोले, 'प्रधान सेनापति में आप जितने गुण चाहते हैं, वे सब उनमें हैं।

और उनके प्रधान सेनापति बनने से आपकी सेना और सेनानायकों में किसी प्रकार का रोष भी नहीं जागेगा तथा कुरुवंशियों के मन में उतना ही आतंक उत्पन्न होगा जितना भीम के नाम से दु:शासन के मन में हो सकता है।Óयुधिष्ठिर ने एक-एक कर अपने सारे भाइयों की ओर देखा: सब सहमत प्रतीत होते थे।

कहीं किसी के चेहरे पर असंतोष नहीं था।

'तो हमारा सर्वमान्य निर्णय है कि धृष्टद्युम्न हमारे प्रधान सेनापति हों।Ó युधिष्ठिर बोले, 'अब हम अपनी सेना को प्रयाण का आदेश दे सकते हैं।Ó

'युद्धभूमि का चयन हो गया क्या?Ó अर्जुन ने पूछा।

'उसका चयन दुर्योधन ने कर लिया है।Ó कृष्ण बोले, 'उसकी सेनाएं कुरुक्षेत्र में अपना स्कंधावार बना रही हैं। वह वहीं व्यूहबद्ध होकर हमारी सेना पर आक्रमण करेगा।Ó

युधिष्ठिर ने भीम की ओर देखा, 'ठीक है?Ó
'मेरे लिए सारे स्थान ठीक हैं।Ó भीम ने कहा, 'मुझे तो दुर्योधन की जंघा तोड़नी है, और वह कार्य कहीं भी हो सकता है।...Ó

'तो फिर ठीक है। धृष्टद्युम्न को सूचित करो। उपप्लव्य के दुर्ग की रक्षा के लिए खाइयों, परकोटों और रक्षक प्रहरियों की समुचित व्यवस्था करो, ताकि हमारी अनुपस्थिति में उपप्लव्य के दुर्ग में रहने वाली स्त्रियों, बालकों तथा धन को लूटने का कोई प्रयत्न न कर सके।Ó युधिष्ठिर बोले, 'रथों, अश्वों तथा हाथियों को चलने के लिए तैयार किया जाए। सबके आगे मध्यम पांडव भीमसेन, प्रधान सेनापति धृष्टद्युम्न के साथ चलेंगे और प्रभद्रकगण उनकी रक्षा के लिए उन्हें घेर कर चलेंगे।

उनके साथ नकुल, सहदेव, अभिमन्यु और पांचों द्रौपदेय जाएंगे। उनके पश्चात् शकट्, हाट, डेरे, तंबू इत्यादि चलेंगे। कोष को विश्वस्त योद्धाओं की रक्षा में सावधानी से ले जाया जाए। शस्त्रास्त्रों का परिवहन भी कुशल योद्धाओं के संरक्षण में हो। चिकित्साकुशल वैद्य साथ चलें।Ó युधिष्ठिर रुके, 'उसके पश्चात् मेरे साथ पांचों कैकेय कुमार, धृष्टकेतु, अभिभू, श्रेणिमान, वसुदान और शिखंडी चलेंगे।

सेना के पिछले भाग में मत्स्यराज विराट, पंचालराज द्रुपद, महाराज कुंतिभोज, सुधर्मा और धृष्टद्युम्न के पुत्र चलेंगे। श्रीकृष्ण और अर्जुन सबकी देखभाल करते हुए, स्वेच्छा से चलेंगे और उनकी रक्षा के लिए अनाधृष्टि, चेकितान तथा सात्यकि उनको घेरकर चलेंगे।Ó
'ऐसा ही होगा धर्मराज!Ó भीम ने कहा।

'स्कंधावार के लिए हिरण्वती नदी के तट पर कोई समतल प्रदेश देखना, जहां घास और ईंधन का बाहुल्य हो। न हमारे पशुओं को खाद्य और जल का अभाव हो और न हमारे सैनिकों को। जल तो हिरण्वती से ही आएगा, किंतु अन्न का पर्याप्त भंडार साथ लेकर चलो।

वहां घास मिल जाए तो ठीक, अन्यथा हमारे पास घास और भूसी का पर्याप्त भंडार होना चाहिए। शिविरों के लिए भूमि सात्यकि नापें, खाई इत्यादि खुदवाने का कार्य श्रीकृष्ण करें। स्कंधावार निर्माण में ध्यान रहे कि विभिन्न शिविरों के मध्य आवागमन के लिए सुरक्षित मार्ग हों, ताकि खाद्य तथा शस्त्रास्त्रों के परिवहन में किसी प्रकार की बाधा न हो।...Ó

'और यदि हमारे कार्य में दुर्योधन के सैनिक बाधा उपस्थित करें?Ó भीम ने पूछा।

'तो बल प्रयोग कर सकते हो।Ó युधिष्ठिर बोले, 'युद्ध करना है तो स्कंधावार का निर्माण करना ही होगा। सुरक्षित तथा सुविधाजनक स्कंधावार का अर्थ है, विजय की अधिक संभावना। अत: सैनिकों के लिए उचित व्यवस्था करो।Ó भीम ने प्रसन्न मुद्रा में हाथ जोड़कर आज्ञा स्वीकार की।

क्रमश: - नरेन्द्र कोहली
Published on:
15 Jul 2015 03:15 am
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