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आधुनिक होने का अर्थ पाश्चात्य होना कतई नहीं

आधुनिकता को तकनीक, वस्त्र और व्यवहार तक सीमित न रखें, बल्कि अपने नैतिक मूल्यों, आत्मगौरव और सांस्कृतिक चेतना के साथ जोड़ें। यदि बच्चा आधुनिक शिक्षा ग्रहण करता है पर अपनी परंपरा का आदर नहीं करता, तो उसकी आधुनिकता अधूरी है।

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जयपुर

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Opinion Desk

Jan 14, 2026

-अविनाश जोशी, स्वतंत्र लेखक एवं स्तंभकार

आज के समय में 'आधुनिकता' शब्द का नाम लेते ही लोगों के मन में चमकदार जीवनशैली, भव्यता, ब्रांडेड परिधान, विदेशी त्योहार और डिजिटल सुविधाओं की छवि उभरती है। मानो आधुनिकता का अर्थ केवल पश्चिमी तौर-तरीकों को अपनाने से है। यह भ्रम हमारे समाज में गहराई तक फैल गया है। आधुनिक बनना अब संस्कृति त्यागने व पाश्चात्य जीवन की नकल करने का प्रतीक मान लिया गया है। परंतु प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में आधुनिक होने का अर्थ केवल पश्चिमी होना है? आधुनिकता का अर्थ अपने विचारों, दृष्टिकोण और जीवन में नवीनता लाना है, जो अपनी परंपरा में निहित हो। आधुनिकता का पश्चिमी रूप भौतिक प्रगति पर निर्भर है, जबकि भारतीय आधुनिकता का स्वरूप आत्मिक और बौद्धिक प्रगति पर आधारित है।

हमारे संत सबसे बड़े विचारक थे। ऋषि अगस्त्य पहली बार समुद्र पार कर दक्षिण भारत में सभ्यता का विस्तार करने वाले माने गए, वे जल प्रवाह और संतुलन के वैज्ञानिक सिद्धांत प्रस्तुत करने वाले थे। चरक और सुश्रुत ने चिकित्सा विज्ञान की नींव रखी, पतंजलि ने योग को संपूर्ण मनोविज्ञान के रूप में व्यवस्थित किया। यह सब आधुनिकता के आदर्श उदाहरण हैं- जिनमें ज्ञान, प्रयोग, विवेक और जीवन का संतुलन शामिल था। लेकिन हमने इन्हें भुला दिया और पश्चिम से आयातित हर चलन को अपनाना आधुनिकता समझ लिया। आधुनिकता का अर्थ कभी अपनी परंपरा को तिरस्कृत करना नहीं था। पर आज वातावरण ऐसा बन गया है कि परंपरा की रक्षा को पिछड़ापन और पश्चिमी बनावट को प्रगतिशीलता समझा जाता है। भारत का इतिहास बताता है कि यहां की संस्कृति सदैव स्वीकार करने वाली रही है। आधुनिकता का यही स्वरूप भारतीय दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ है जो अच्छा हो, उसे स्वीकार करो; जो अपनी आत्मा से मेल न खाए, उसे विनम्रता से छोड़ दो।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम आधुनिकता को तकनीक, वस्त्र और व्यवहार तक सीमित न रखें, बल्कि अपने नैतिक मूल्यों, आत्मगौरव और सांस्कृतिक चेतना के साथ जोड़ें। यदि बच्चा आधुनिक शिक्षा ग्रहण करता है पर अपनी परंपरा का आदर नहीं करता, तो उसकी आधुनिकता अधूरी है। आज का भारत यदि अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़कर विज्ञान, तकनीक और वैश्विक नागरिकता की दिशा में आगे बढ़ता है, तो वह दुनिया को नई दिशा दे सकता है। क्योंकि सच्ची आधुनिकता वही है जो परंपरा से पोषित होते हुए भविष्य की ओर देख सके। आधुनिकता वह है जो समय की चाल के साथ चले, पर अपनी आत्मा की धुन न भूले। इसलिए अब हमें निर्णय लेना होगा हम पश्चिम के बनाए आधुनिकता के सांचे में खुद को ढालेंगे या अपनी सांस्कृतिक धारा को साथ लेकर एक नई आधुनिकता का निर्माण करेंगे। सच्चा आधुनिक वही है जो अपने अतीत से शक्ति ले और भविष्य को दिशा दे।