
पत्रकारिता के पुरोधा कर्पूरचंद्र कुलिश जी की जन्मशती और पाठक। (फोटो: पत्रिका)
Karpoorchandra Kulish's birth centenary : राजस्थान पत्रिका के संस्थापक संपादक, मूर्धन्य पत्रकार, भाषाविद, वेद विज्ञानी और मनीषी कर्पूरचंद्र कुलिश जी (Karpoorchandra Kulish) का जीवन केवल एक व्यक्ति की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारतीय पत्रकारिता के उस सुनहरे अध्याय का दस्तावेज़ है, जहां 'पाठक' ही सर्वोपरि था। उनके जन्मशती वर्ष के पावन अवसर पर, उनके विचारों का संग्रह और उनकी आत्मकथात्मक शैली में रचित पुस्तक 'धाराप्रवाह' आज एक प्रकाश स्तंभ की तरह हमारे सामने है। यह पुस्तक पत्रकारिता के विद्यार्थियों और समाज के लिए एक मार्गदर्शिका है, जो बताती है कि कैसे शून्य से शिखर तक की यात्रा तय की जाती है, बशर्ते केंद्र में 'पाठक' का हित हो। कुलिश जी ने पत्रकारिता में साख, विश्वसनीयता और जन-सरोकार के जो कीर्तिमान स्थापित किए, वे आज के दौर में और भी अधिक प्रासंगिक हो गए हैं। यहां 'धाराप्रवाह' के माध्यम से उनके जीवन और पत्रकारिता के उन सिद्धांतों का सार प्रस्तुत है, जो पूरी तरह से 'पाठक-केंद्रित' है।
'धाराप्रवाह' कुलिश जी के जीवन की वह अविरल धारा है, जो अभावों के पहाड़ों से निकल कर पत्रकारिता के समुद्र में जा मिली। लेकिन इस समुद्र का पानी खारा नहीं, बल्कि मीठा था, क्योंकि इसमें जन-जन का प्यार मिला था। सोडा गांव (टोंक) के एक ग्रामीण परिवेश से निकल कर, मात्र "दो कुर्सी, एक मेज और 500 रुपये की उधार राशि" से शुरू हुआ सफर यदि 'राजस्थान पत्रिका' जैसा विशाल वटवृक्ष बन सका, तो उसमें खाद-पानी केवल और केवल 'पाठक का विश्वास' था। यह पुस्तक प्रमाण है कि मीडिया हाउस पूंजी से नहीं, बल्कि जन-मन के संकल्प और पाठक के आशीर्वाद से चलते हैं।
कुलिश जी का मानना था कि एक अख़बार और उसके पाठक के बीच एक अघोषित अनुबंध होता है-और वह अनुबंध है 'सत्य' का। अख़बार की 'साख' ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी है। यदि पाठक सुबह अख़बार हाथ में लेकर यह कहे कि "अगर इसमें छपा है, तो सच ही होगा," तो यही संपादक की सबसे बड़ी कमाई है। 'धाराप्रवाह' में वे कहते हैं कि ख़बरें केवल सूचना नहीं हैं, वे समाज के विश्वास का दर्पण हैं। उन्होंने अफ़वाहों से दूरी बनाने और तथ्यों की पुष्टि करने पर हमेशा ज़ोर दिया। उनका सिद्धांत था- "जल्दी ख़बर देने से ज़्यादा ज़रूरी है, सही ख़बर देना।" यह धैर्य केवल इसलिए था ताकि पाठक तक कभी कोई ग़लत जानकारी न पहुंचे।
आज के कॉरपोरेट दौर में जहां मीडिया हाउस प्रबंधन और मुनाफ़े से चलते हैं, कुलिश जी ने दशकों पहले यह क्रांतिकारी विचार दिया था कि- "अख़बार का असली मालिक उसका पाठक होता है, न कि उसका प्रबन्धन।" उन्होंने हमेशा इस बात पर ज़ोर दिया कि अखबार में वह छपना चाहिए जो पाठक के जीवन को प्रभावित करता है, न कि वह जो सरकार, सत्ता या विज्ञापनदाता चाहते हैं। उन्होंने पत्रिका को राजनीतिक दलों के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त रखा। उस दौर में जब कई अखबार किसी न किसी नेता या दल के अघोषित मुखपत्र हुआ करते थे, कुलिश जी ने तय किया कि उनका अखबार केवल 'जनता का पक्ष' रखेगा। इसी निष्पक्षता ने पाठक के मन में यह भरोसा जगाया कि यह "हमारा अख़बार" है।
कुलिश जी ने पत्रकारिता को एसी कमरों से निकाल कर चौपालों तक पहुंचाया। उन्होंने पाठकों के पत्रों, उनकी शिकायतों और उनकी समस्याओं को अख़बार में 'लीड स्टोरी' जैसा महत्व दिया। उनका मानना था कि जब एक आम पाठक अख़बार में अपनी टूटी सड़क, पानी की समस्या या सामाजिक अन्याय की ख़बर देखता है, तो उसे 'अपनापन' महसूस होता है। यह पाठक के प्रति उनका सम्मान ही था कि उन्होंने अख़बार को 'वन-वे कम्युनिकेशन' (एक तरफा संवाद) नहीं, बल्कि 'टू-वे कम्युनिकेशन' (द्विपक्षीय संवाद) का माध्यम बनाया।
कुलिश जी की मशहूर यात्रा श्रृंखला "मैं देखता चला गया" केवल एक यात्रा वृत्तांत नहीं थी, बल्कि यह ज़मीनी पत्रकारिता का एक उत्कृष्ट नमूना थी। उन्होंने पत्रकारों को अपनी मिट्टी से जुड़े रहने की प्रेरणा दी। उन्होंने सिखाया कि असली भारत गांवों में बसता है। वे पत्रकारों से कहते थे कि गांवों में जाओ, वहां की धूल-मिट्टी फांको और आम आदमी के संघर्ष को समझो। उनकी सोच थी कि जब तक एक पत्रकार उस ग्रामीण पाठक की पीड़ा को महसूस नहीं करेगा, वह उसके साथ न्याय नहीं कर पाएगा। उन्होंने अख़बार की भाषा को भी क्लिष्ट हिंदी के बजाय 'आम बोलचाल' की भाषा बनाया, ताकि एक रिक्शा चालक से लेकर विश्वविद्यालय का कुलपति-दोनों आसानी से समझ सकें। यह भाषा के स्तर पर पाठक का सम्मान था।
कुलिश जी का स्वभाव वज्र जैसा कठोर (कुलिश) और कपूर जैसा शीतल (कर्पूर) दोनों था। लेकिन जब बात पाठक के अधिकारों की आती थी, तो वे वज्र बन जाते थे। वे आंखों में आंखें डाल कर सत्ता से सवाल करने का साहस रखते थे। आपातकाल के दौर का ज़िक्र रोंगटे खड़े कर देता है। जब प्रेस पर पाबंदियां थीं और सच लिखना गुनाह था, तब उन्होंने संपादकीय ख़ाली छोड़ कर अपना विरोध दर्ज कराया। यह कोरे काग़ज़ से कोहराम मचाने का साहस था। यह साहस उन्होंने अपने लिए नहीं, बल्कि अपने पाठकों के लिए दिखाया था। वे चाहते थे कि उनका पाठक यह जाने कि देश में लोकतंत्र का गला घोंटा जा रहा है। उन्होंने सिखाया कि पत्रकार का धर्म सत्ता के साथ भोजन करना नहीं, बल्कि सत्ता की आंखों में आंखें डाल कर सवाल पूछना है, ताकि पाठक के हितों की रक्षा हो सके।
कुलिश जी ने पत्रकारिता को केवल ख़बरों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे सामाजिक दायित्व से जोड़ा। उन्होंने 'भगवान महावीर विकलांग सहायता समिति' के अभियान 'जयपुर फुट' को अपने अख़बार के माध्यम से वैश्विक पहचान दिलाई। यह मुहिम लाखों दिव्यांग पाठकों और नागरिकों के लिए जीवन की नई रोशनी बनी। यही नहीं, जब राजस्थान में भयानक अकाल पड़ा, तो उन्होंने सरकार के भरोसे रहने के बजाय, अख़बार के माध्यम से 'अकाल राहत कोष' की स्थापना की। उन्होंने पाठकों से आह्वान किया तो पाठकों ने अपने इस 'विश्वसनीय साथी' की पुकार पर दिल खोल कर दान दिया। यह इस बात का प्रमाण था कि पाठक उन पर कितना भरोसा करते थे। उनका कहना था कि पत्रकार को केवल मूकदर्शक नहीं, बल्कि एक सक्रिय कार्यकर्ता और समाज का सहभागी होना चाहिए।
कुलिश जी 'ज्ञान' और 'अनुभव' में गहरा फ़र्क़ बताते हैं। वे मानते थे कि अनुभव ठोकरें खाकर आता है, लेकिन ज्ञान अंतःप्रेरण या ईश्वरीय कृपा से प्राप्त होता है। उन्होंने पत्रकारिता में 'अंतःदृष्टि' को बहुत महत्वपूर्ण माना। यह अंतःदृष्टि ही थी जिससे वे समझ जाते थे कि आज के पाठक को कल क्या चाहिए। वे समय से आगे की सोच रखते थे, क्योंकि उनकी अंगुली हमेशा पाठक की नब्ज़ पर होती थी।
वे मानते थे कि पत्रकारिता एक 'तपस्या' है और इस तपस्या का फल 'साख' है। उन्होंने अपने जीवन से सिद्ध किया कि यदि नीयत साफ़ हो और केंद्र में 'पाठक' हो, तो एक साधारण व्यक्ति भी व्यवस्था को बदल सकता है।
कुलिश जी अक्सर कहा करते थे कि कंपनियों में शेयरहोल्डर (हिस्सेदार) होते हैं जो मुनाफ़ा देखते हैं, लेकिन एक अख़बार का ढांचा अलग होता है। उन्होंने अपनी यह सोच व्यक्त करते हुए, एक बार बहुत ही मार्मिक और ऐतिहासिक बात कही थी, जो आज हर पत्रकार और मीडिया हाउस के लिए एक मंत्र होनी चाहिए।
"अख़बार किसी एक व्यक्ति या मालिक का नहीं होता। इसके असली 'शेयरहोल्डर' (हिस्सेदार) तो इसके 'पाठक' ही होते हैं। इसलिए हमें जो भी लाभांश या जवाबदेही देनी है, वह इन्हीं पाठकों को देनी है, किसी और को नहीं।"
भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में कुछ अध्याय ऐसे हैं जो स्याही से नहीं, बल्कि एक संपादक के नैतिक साहस और उसकी आत्मा के ताप से लिखे गए हैं। पत्रकारिता के शलाका पुरुष, राजस्थान पत्रिका के संस्थापक कर्पूरचंद्र कुलिश केवल एक पत्रकार या संपादक नहीं थे; वे एक विचार, एक आंदोलन और भारतीय मूल्यों के सजग प्रहरी थे। उन्होंने शब्द और समाचार साधना का इतिहास रचा और राजस्थान पत्रिका के माध्यम से पत्रकारिता के विशिष्ट व उल्लेखनीय कीर्तिमान कायम किए। उनके दस्तावेज़ी अग्रलेखों का संकलन 'हस्ताक्षर' हमें उस दौर में ले जाता है जब एक संपादक ने अपनी लेखनी को सत्ता की 'चरण वंदना' का साधन बनाने के बजाय, लोकतंत्र की रक्षा के लिए 'वज्र' बना लिया था। आज जब हम आज़ादी के अमृतकाल में हैं, कुलिश जी के वे विचार—'यदि विपक्ष का सम्मान नहीं होगा तो लोकतंत्र का आधार ही ढह जाएगा'—पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक और चेतावनीपूर्ण प्रतीत होते हैं।
पत्रकारिता का सामान्य सिद्धांत यह है कि 'संपादकीय' (Editorial) किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि संस्था का मत होता है। इसीलिए वह अनाम होता है। लेकिन इतिहास गवाह है कि जब-जब देश पर संकट के बादल मंडराए, कुलिश जी ने इस परंपरा को तोड़ा। उन्होंने संस्था की आड़ लेने के बजाय, सीना तान कर अपने 'हस्ताक्षर' के साथ अग्रलेख लिखे।
यह सवाल आज की पत्रकारिता के लिए एक सबक है। सन 1975 के जून महीने में, जब देश में आपातकाल (Emergency) की भूमिका तैयार हो रही थी और सत्ता का चरित्र निरंकुश हो रहा था, तब मौन रहना सबसे सुरक्षित विकल्प था। लेकिन कुलिश जी ने उस 'नाज़ुक दौर' को भांप लिया था। उन्होंने 12 जून से 25 जून 1975 के बीच जो लिखा, वह केवल शब्द नहीं थे, बल्कि तानाशाही के खिलाफ लोकतंत्र की हुंकार थी। उन्होंने अपने नाम के साथ लिख कर यह संदेश दिया कि एक सच्चा संपादक अपने विचारों के लिए स्वयं जवाबदेह होता है और वह सत्य कहने के परिणामों से डरता नहीं है। यह 'हस्ताक्षर' करना, दरअसल सत्ता की आंखों में आंखें डाल कर यह कहना था कि "मैं देख रहा हूं और मैं बोलूंगा।"
कुलिश जी के चिंतन का सबसे सशक्त पक्ष उनकी लोकतांत्रिक दृष्टि थी। उनके लेखन में यह चेतावनी बार-बार उभरती है कि लोकतंत्र केवल बहुमत का शासन नहीं है, बल्कि यह अल्पमत और असहमति के सम्मान का नाम है। उन्होंने लिखा कि सत्ता का स्वभाव ही केंद्रीयकरण की ओर झुकना होता है। यदि इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने वाला विपक्ष मौजूद नहीं होगा, या यदि विपक्ष को सुनियोजित तरीके से कुचला जाएगा, तो शासन व्यवस्था निरंकुश तंत्र में बदल जाएगी। उनका कहना था "सत्ताएं आती-जाती रहती हैं, लेकिन देश और उसके लोकतांत्रिक मूल्य शाश्वत रहने चाहिए।"
आज के राजनीतिक परिदृश्य में, जहां विपक्ष को अक्सर 'राष्ट्र-निर्माण में बाधा' के रूप में चित्रित करने की कोशिश की जाती है, कुलिश जी का यह विचार एक मार्गदर्शक सूत्र है। वे मानते थे कि एक मज़बूत और सम्मानित विपक्ष ही सरकार को निरंकुश होने से रोकता है। विपक्ष का अपमान, वस्तुतः जनादेश के एक हिस्से का अपमान है।
कुलिश जी का वैचारिक धरातल लुटियंस दिल्ली के वातानुकूलित कमरों में नहीं, बल्कि राजस्थान के तपते रेगिस्तान और गांवों की धूल में था। उनकी प्रसिद्ध यात्रा श्रृंखला 'मैं देखता चला गया' इस बात का प्रमाण है कि उनकी पत्रकारिता की जड़ें ज़मीन में थीं। उनके अग्रलेखों में हम पाते हैं कि वे केवल राजनीतिक जोड़-तोड़ पर नहीं लिखते थे। जब वे अकाल, सूखे और भुखमरी पर क़लम चलाते थे, तो उसमें एक मानवीय संवेदना होती थी। उन्होंने स्थापित किया कि पत्रकारिता का धर्म केवल ख़बर देना नहीं, बल्कि 'लोक शिक्षण' है। उन्होंने सत्ताधीशों को यह एहसास कराया कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है, और यदि गांव रो रहा है, तो संसद के मुस्कुराने का कोई अर्थ नहीं है। उनका यह ग्रामीण चिंतन आज की 'कॉरपोरेट मीडिया' के लिए एक आईना है, जो टीआरपी की दौड़ में गांव की पगडंडियों को भूल चुकी है।
कुलिश जी ने अपने जीवन के उत्तरार्ध में वेदों की ओर रुख़ किया, लेकिन यह पलायन नहीं था। यह भारतीय समस्याओं का भारतीय समाधान खोजने की एक बौद्धिक यात्रा थी। उनका मानना था कि हम पश्चिम की नक़ल कर के भारत का नवनिर्माण नहीं कर सकते।
उनके लेखों में यह विचार नज़र आता है कि भारतीय संस्कृति में 'संवाद' और 'शास्त्रार्थ' की परंपरा रही है, 'विवाद' और 'विध्वंस' की नहीं। उन्होंने वेदों के माध्यम से समाज को यह संदेश देने की कोशिश की कि एक पत्रकार को ऋषि-तुल्य होना चाहिए, जो सत्य का अन्वेषण करे और समाज को सही दिशा दिखाए। उनकी पत्रकारिता 'संस्कृतिनिष्ठ' थी, जो आधुनिकता का विरोध तो नहीं करती थी, लेकिन अपनी जड़ों को काटने की इजाज़त भी नहीं देती थी।
आज 'फेक न्यूज़', 'पेड न्यूज़' और 'एजेंडा पत्रकारिता' का समय है। मीडिया घरानों पर यह आरोप आम है कि वे या तो सरकार के 'भोंपू' बन गए हैं या फिर किसी विशेष विचारधारा के गुलाम हैं। ऐसे समय में, कर्पूरचंद्र कुलिश जी के 'हस्ताक्षर' अग्रलेख हमें एक नई रोशनी दिखाते हैं। आज जब पत्रकार सवाल पूछने से डरते हैं, कुलिश जी की क़लम और उनके अग्रलेख याद दिलाते हैं कि पत्रकार का काम सत्ता के साथ 'सेल्फ़ी' लेना नहीं, बल्कि सत्ता से 'सवाल' करना है। कुलिश जी ने सिखाया कि अख़बार का असली मालिक उसका 'पाठक' होता है, विज्ञापनदाता या सरकार नहीं। आज मीडिया को अपनी खोई हुई साख पाने के लिए उसी नैतिक बल की आवश्यकता है।
कर्पूरचंद्र कुलिश जी ने अपने जीवन और लेखन से यह सिद्ध किया कि पत्रकारिता कोई व्यवसाय नहीं, बल्कि एक पवित्र मिशन है। उनके दस्तख़ती अग्रलेख उन परिस्थितियों के साक्षी हैं, जब देश की लोकतांत्रिक सांसें फूल रही थीं। उन्होंने तब बेबाकी से लिखा, जबकि ऐसा लिखना बहुत जोखिम भरा था। आज, जब उन दस्तावेज़ों को पलटते हैं, तो हमें महसूस होता है कि वे शब्द पुराने नहीं हुए हैं। वे आज भी हमारे सामने खड़े होकर पूछ रहे हैं—क्या हम अपनी ज़िम्मेदारी निभा रहे हैं? क्या हम विपक्ष और असहमति का सम्मान कर रहे हैं? क्या हम गांव के अंतिम व्यक्ति की आवाज़ बन पा रहे हैं?
बहरहाल, कुलिश जी का जीवन संदेश देता है कि क़लम की ताक़त तलवार से अधिक होती है, बशर्ते उसे थामने वाले हाथ में कंपन न हो और उसके पीछे एक सच्चा चरित्र खड़ा हो। उनकी नैतिक और वैचारिक विरासत हमें याद दिलाती है कि पत्रकारिता का अंतिम उद्देश्य सत्ता की 'चरणवंदना' नहीं, बल्कि 'जन-वंदना' है। उनका मानना था कि यही वह पाथेय है, जो लोकतंत्र को जीवित रखेगा।
(यह आलेख श्री कर्पूरचंद्र कुलिश जी के जन्म शताब्दी वर्ष में ज्वलंत मुद्दों पर आज भी प्रासंगिक विचारों की शृंखला के तहत पेश किया गया है।)
Published on:
04 Mar 2026 06:00 am
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