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वैचारिक पूर्वाग्रह व राजनीतिक नैरेटिव से दूर रहे शिक्षा प्रणाली

दक्षिण एशिया पर शोध करने वाले अनेक भारतीय, पाकिस्तानी, बांग्लादेशी और श्रीलंकाई विद्वानों का साझा अनुभव रहा है कि उन्हें अक्सर सूत्र या फील्ड नॉलेज प्रोवाइडर की भूमिका तक सीमित कर दिया जाता है।

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जयपुर

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Opinion Desk

Mar 04, 2026

अश्विनी शर्मा - स्कॉलर, येल विश्वविद्यालय अमरीका,

जर्मन शिक्षा प्रणाली को विश्व की सबसे अनुशासित, अनुसंधान उन्मुख और सार्वजनिक रूप से वित्तपोषित प्रणालियों में गिना जाता है। यहां की विश्वविद्यालय परंपरा, अकादमिक स्वतंत्रता और शोध संस्कृति को लंबे समय से एक आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। विशेष रूप से क्षेत्रीय अध्ययन के क्षेत्र में जर्मनी ने एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमरीका को समझने के लिए सशक्त संस्थागत ढांचे विकसित किए। इसी परंपरा में साउथ एशिया इंस्टीट्यूट जैसे संस्थानों की भूमिका ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण रही है।

लेकिन आज एक गंभीर और असहज प्रश्न खड़ा होता है क्या जर्मन व्यापक रूप से पश्चिमी शिक्षा प्रणाली में दक्षिण एशिया, विशेषकर भारत को लेकर अध्ययन निष्पक्ष, आलोचनात्मक और अकादमिक ईमानदारी से संचालित हो रहा है? या फिर यह अध्ययन वैचारिक पूर्वाग्रह, राजनीतिक नैरेटिव और संरचनात्मक नस्लवाद से धीरे-धीरे ग्रस्त होता जा रहा है? दुर्भाग्य से, आज भी कई जर्मन और यूरोपीय विश्वविद्यालयों में दक्षिण एशिया पर होने वाला अध्ययन भारत को एक समस्या ग्रस्त समाज, विफल लोकतंत्र या स्थायी मानवाधिकार संकट के फ्रेम में देखने की प्रवृत्ति से मुक्त नहीं हो पाया है। आलोचना आवश्यक है, बल्कि अनिवार्य है लेकिन जब आलोचना एकांगी हो जाए, जब उपलब्धियों, ऐतिहासिक जटिलताओं, सामाजिक विविधताओं और आंतरिक बहसों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाए, तब वह अकादमिक आलोचना नहीं रह जाती, बल्कि वैचारिक अभियोग में बदल जाती है। यह कहना असुविधाजनक हो सकता है, किंतु सच्चाई यह है कि कई जर्मन अकादमिक संस्थानों में नस्लवाद आज भी एक मौन और अदृश्य संरचना के रूप में मौजूद है।

दक्षिण एशिया पर शोध करने वाले अनेक भारतीय, पाकिस्तानी, बांग्लादेशी और श्रीलंकाई विद्वानों का साझा अनुभव रहा है कि उन्हें अक्सर सूत्र या फील्ड नॉलेज प्रोवाइडर की भूमिका तक सीमित कर दिया जाता है। यह समस्या केवल जर्मनी तक सीमित नहीं है। अमरीकी विवि विशेषकर येल और वैश्विक संस्थानों में दक्षिण एशिया अध्ययन का अनुभव भी इस व्यापक संरचनात्मक संकट की पुष्टि करता है। जर्मन और अमरीकी शिक्षा प्रणालियों की आलोचना करना उनका निषेध नहीं है। इन दोनों देशों ने शिक्षा और शोध के क्षेत्र में ऐतिहासिक योगदान दिया है। लेकिन किसी भी अकादमिक प्रणाली की परिपक्वता इसी में है कि वह आत्मालोचन को स्वीकार करे। दक्षिण एशिया, विशेषकर भारत को केवल अध्ययन की वस्तु नहीं, बल्कि ज्ञान निर्माण का समान और सम्मानजनक साझेदार माना जाना चाहिए। अब समय है कि भारत इस विमर्श को गंभीरता से ले। न रक्षात्मक होकर, न आत्महीन होकर बल्कि आत्मविश्वास और बौद्धिक स्पष्टता के साथ।