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उदारवादियों का हौआ

अब चूंकि आपका प्रत्येक कृत्य गरीबों के नाम पर है, तो आपका कोई भी फैसला भला गलत कैसे हो सकता है और कोई भी आचार भ्रष्ट कैसे हो सकता है।

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Jun 29, 2018
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- प्रताप भानु मेहता, राजनीतिशास्त्री

यह दौर उदारपंथियों को गाली देने का है। कोई भी मर्ज हो, दोष लिबरल लोगों के सिर मढ़ दीजिए। आइए देखें, इतने सारे लिबरल आखिर कर क्या रहे हैं। ये बराबरी के हक में छोटी-छोटी जीत हासिल करने का षडयंत्र रच रहे हैं। बेचारे निजी स्वतंत्रता की रक्षा करने में जुटे हुए हैं। गिनते जाइए - अस्मितावादियों के जोर-जबर का प्रतिरोध, बहस-मुबाहिसों में तर्क का प्रयोग, धर्म के क्षेत्र में संशयवाद का प्रसार, वैज्ञानिक मूल्यों की रक्षा, विश्वबंधुत्व सुनिश्चित करने की कोशिश, सत्ता के केंद्रीकरण का विरोध, पर्यावरण की सुरक्षा, व्यष्टि और समष्टि के रहस्यों की मुक्त पड़ताल के लिए बची-खुची संभावनाओं का बचाव, इतिहास की जटिलताओं का संधान, उत्पीडऩ के खिलाफ संस्थाओं की चारदीवारी का सशक्तीकरण और यहां तक कि खाने-पीने के मामले में वर्जनाओं को तोडऩे की कोशिश।

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काश, ये लोग लुप्त हो जाते तो भारत का इतिहास सुधर जाता और देश की तमाम आर्थिक समस्याएं हल हो जातीं। चीन किसी पत्ते की तरह फडफ़ड़ाने लगता, कानून का राज कायम हो जाता और कोई भी जातीय या धार्मिक विभाजन भारत को बांटने की जुर्रत ही न कर पाता। ऐसा इसलिए क्योंकि अन्य किसी भी विचारधारा के अनुयायियों में तो लिबरल समाज की बुराइयां देखने को नहीं मिलती। मसलन, राष्ट्रवादी शुद्ध देसी घी की तरह हैं, सर्वगुण संपन्न, जिनके मलमल के सफेद कुर्ते पर एक भी लाल छींटे की गुंजाइश नहीं होती। उन्हें तो हिंसा का अर्थ तक नहीं समझ आता, फिर वे हिंसा कैसे कर सकते हैं?

दूसरी ओर माक्र्सवादी हैं, जो ऐतिहासिक अनिवार्यता के तर्क से संचालित हैं, लिहाजा उनका कोई भी कृत्य पाखंड या विश्वासघात की श्रेणी में नहीं आता। ये पहले से ही इतने लाल हैं, कि कोई भी लाल छींटा इस विचारधारा को और लाल नहीं कर सकता। बचे गैर-माक्र्सवादी वामपंथी, जो गरीबों के नाम पर क्रांतिकारी दावे तानते हैं। अब चूंकि आपका प्रत्येक कृत्य गरीबों के नाम पर है, तो आपका कोई भी फैसला भला गलत कैसे हो सकता है और कोई भी आचार भ्रष्ट कैसे हो सकता है।

आंबेडकरवादियों का मूल सरोकार न्याय से है। उनमें कुछ बुराइयां बेशक हो सकती हैं, लेकिन हमने तय कर दिया है कि ये इतने हाशिये के लोग हैं कि हमें उनकी चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है। भीतर की बात तो यह है कि इन्हें यदि किसी तरह से भरोसा दिला दिया जाए कि लिबरल लोग ब्राह्मणवादी होते हैं, तो इस दुनिया को लिबरलों से मुक्त करने के काम में वे सहयोगी बन सकते हैं। बच गए पूंजीवादी लोग, जिनके विजयरथ को उदारपंथियों ने हमेशा रोकने का काम किया है।

ये लिबरल सबके भीतर असुरक्षाबोध और सताए जाने का भाव भर देते हैं, चाहे प्रधानमंत्री हो या राष्ट्रपति। हिंदुओं में उत्पीडऩ का भाव जगाने के लिए ये अकेले जिम्मेदार हैं, जबकि इस देश की अस्सी फीसदी आबादी हिंदू है। लाखों की सदस्यता का दावा करने वाले आरएसएस जैसे संगठनों में ये उत्पीडि़त होने का बोध भर देते हैं। जो बीजेपी चौबीस राज्यों में सरकार चला रही है, उसके भीतर ये असुरक्षाबोध पैदा कर देते हैं। जिस प्रधानमंत्री के गुण और उपलब्धियां अकबर और नेहरू को एक साथ पीछे छोड़ डालें, उसके भीतर वे सताए जाने का भाव पैदा कर देते हैं।

ये लिबरल बड़े अनिष्टकारी हैं। इनके मुंह से निकला आलोचना का एक शब्द इस गौरवमय सभ्यता को घुटनों पर ला सकता है। उदारपंथ उत्पीडऩ का बोध पैदा करने वाला एक ऐसा कारगर कारखाना है कि सर्वाधिक दबंग समूह भी इसके सामने उत्पीडि़त हो जाते हैं।

ये लिबरल दंभी, खुराफाती और प्रभुत्ववादी भी हैं। इनके शब्द किसी भी हिंसा से ज्यादा हिंसक हैं। इनसे निपटने के कुछ तरीकों पर ध्यान दें - अगर ये नैतिकता का दिखावा कर रहे हों तो आप पाखंड को अपना लें। यदि ये निजी स्वतंत्रता का बचाव कर रहे हों तो आप सामूहिक अहंकार का प्रयोग करें। यदि ये एक शिष्ट और न्यूनतम कल्याणकारी राज्य की मांग कर रहे हों तो चरमपंथियों को उकसाने का इन पर आरोप मढ़ दें। अगर ये सामूहिक हत्या या ऐसी ही प्रवृत्तियों की निंदा कर रहे हों तो इन्हें असहिष्णु ठहरा दें। ये अगर एक हत्या की निंदा कर रहे हों तो कह दीजिए कि ये पक्षपात कर रहे हैं। ये अगर ज्ञान का दावा करें तो आप प्राचीन संस्कृति का हल्ला मचाना शुरू कर दें।

कहने का मतलब कि लिबरलों को किनारे धकेलने, बदनाम करने और कलंकित करने के आप जितने भी तरीके अपना सकें, सब जायज हैं। अगर इनमें से कुछ भी काम नहीं कर रहा, तो हिंसा भी जायज है। हमेशा याद रखें कि इन लोगों में ही छोटी-छोटी बुराइयां होती हैं। हमारे पास तो बड़े-बड़े उद्देश्य हैं। दरअसल, लिबरल को गाली देना काफी मनोरंजक काम है। गाली देने वालों को लगता है कि उदारपंथियों को बस एक बार नष्ट कर दें, यह दुनिया खुद-ब-खुद अपने सारे मर्ज, असुरक्षाओं और असंतोषों से मुक्त हो जाएगी।

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Published on:
29 Jun 2018 10:02 am
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