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बदलना होगा विरोध का तरीका

प्रदर्शन व आंदोलन हमारे देश में कोई नई बात नहीं। लेकिन गत सत्तर वर्षों में पीढिय़ां बदल गई हैं। अब विरोध किसी विदेशी सत्ता के विरुद्ध नहीं बल्कि व्यवस्था के विरुद्ध होता है।

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Sunil Sharma

Jun 29, 2018

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- महेश भारद्वाज, विश्लेषक

देश में पिछले कुछ बरसों में विरोध प्रदर्शन और आंदोलनों में जिस तरह से तेजी आई है, वह नीति निर्धारकों व समाजशास्त्रियों के बीच चिंता का विषय बना हुआ है। आम तौर पर विरोध प्रदर्शनों को राजनीतिक गतिविधियों से जोडक़र देखा जाता है। पिछले दिनों में ऐसे प्रदर्शनों की संख्या ज्यादा देखने को मिली है, जिनकी शुरुआत तो गैर राजनीतिक रूप में हुई लेकिन बाद में कई राजनीतिक दल भी स्वार्थवश इनमें कूद पड़े।

मेघालय में सिख व खासी समुदाय के बीच हुई हिंसा हो या फिर तमिलनाडु में प्रदूषण फैला रहे कारखाने के खिलाफ हुआ स्थानीय जन-आंदोलन। राजस्थान, हरियाणा व उत्तरप्रदेश में आरक्षण के समर्थन या विरोध में आंदोलन हों या फिर क्षेत्रवाद पर आधारित कोई आंदोलन। सब शुरू में वर्ग-समुदाय विशेष ने शुरू किए, लेकिन बाद में राजनीतिक रोटियां सेंकने का काम भी खूब हुआ।

एक अध्ययन के मुताबिक कम से कम चुनाव के महीने में तो ऐसे आंदोलनों में तेजी नही देखी गई। हां, चुनाव से पहले या बाद के महीनों में जरूर ये प्रदर्शन उफान पर होते रहे हैं। विरोध प्रदर्शनों और आंदोलनों का होना हमारे देश में कोई नई बात नहीं। हमें आजादी भी लंबे आंदोलन से ही मिली। लेकिन गत सत्तर वर्षों में पीढिय़ां बदल गई हैं। अब विरोध किसी विदेशी सत्ता के विरुद्ध नहीं बल्कि व्यवस्था के विरुद्ध होता है। लेकिन ऐसे आंदोलनों में जान-माल संबंधी नुकसान चिंता का विषय है।

राष्ट्रीय क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के वर्ष २०१६ के आंकड़े बताते हैं कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान उस वर्ष देश भर में 11 हजार 196 मामले आगजनी के दर्ज हुए जो वर्ष 2015 के 9710 मामलों से ज्यादा हैं। इसी तरह 2016 के दौरान शांतिभंग के 72 हजार 829 मामले दर्ज हुए। इन मामलों में सार्वजनिक संपत्ति को भारी नुकसान हुआ और वर्ष 2016 में 5825 मुकदमे सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के दर्ज हुए। इस दौर के विरोध प्रदर्शनों की खासियत यह है कि ज्यादातर प्रदर्शन राजधानियों या बड़े शहरों के इर्द-गिर्द हो रहे हैं।

आखिर सार्वजनिक संपत्ति को बर्बाद करने से हासिल क्या होता है? देश के तमाम करदाताओं के साथ-साथ प्रदर्शनकारियों का भी पैसा इनमें लगा होता है। आंदोलनों में पुलिस और सुरक्षा दल भी निशाने पर होते हैं। सबको अपनी बात कहने का हक है, लेकिन लोकतंत्र में विरोध के कुछ दूसरे तरीकों की तलाश करनी चाहिए ताकि देश के संसाधनों को नुकसान से बचाया जा सके।