धुरंधर के बाद धुरंधर द रिवेंज जैसी फिल्में परिस्थिति बदल रही है। अब सत्य घटनाओं पर आधारित फिल्में नैरेटिव भारत के पक्ष में तैयार कर सकती हैं। धुरंधर-2 की सबसे बड़ी बात यह है कि इसने देशवासियों को उन नायकों से मुलाकात कराई जिन्होंने अपने उस नाम तक का बलिदान कर दिया, जिसे अमर रखने के लिए लोग क्या नहीं कर गुजरते।
प्रो. अमिताभ श्रीवास्तव, सामाजिक विज्ञान संकाय अध्यक्ष (राज.केंद्रीय विवि)
'धुरंधर द रिवेंज' की कामयाबी के बाद वॉर ऑफ नैरेटिव्स पर चर्चा और गर्म हो गई है। जासूस किसी देश के सुरक्षा चक्र के सबसे गुप्त अस्त्र होते है। फिल्मों को दुनिया अब महज मनोरंजन नहीं, सॉफ्ट पॉवर मानती है जो बिना हथियार के इस्तेमाल के दुनिया के मन में यह बिठा देती है कि कौन कितना ताकतवर है और कौन कितना कमजोर। इस लिहाज से धुरंधर सीरीज की दोनों फिल्में अहम हो जाती हैं क्योंकि वे दोहरी पावर से लैस हैं: कंटेंट में जासूसी और इंपैक्ट में नैरेटिव सेटर। सबसे अहम यह कि वे भारतीय जासूसी के अद्भुत सत्य प्रकरणों से प्रेरित हैं। इस बात को गहराई से समझने के लिए अतीत की गलियों में जाना होगा। एक वक्त था जब जेम्स बांड और शर्लक होम्स जैसे जासूस अंतरराष्ट्रीय अपराधियों को गिरफ्त में लेकर कथित तौर पर दुनिया बचाया करते थे। वो किताबी योद्धा थे, जिनके जरिये अमरीका, ब्रिटेन जैसे देश नैरेटिव सेट कर अपने को दुनिया का मसीहा साबित कर रहे थे। या यों मान लीजिए लोग उन्हें मसीहा मान रहे थे।
उसके बाद नैरेटिव की जंग पर्दे पर पहुंची। और फिर सुपरमैन, ही मैन-स्पाइडरमैन को दुनिया का रक्षक दिखा कर फिर पश्चिमी देशों को दुनिया के तारणहार के रूप में पेश किया। पर धुरंधर के बाद धुरंधर द रिवेंज जैसी फिल्में परिस्थिति बदल रही है। अब सत्य घटनाओं पर आधारित फिल्में नैरेटिव भारत के पक्ष में तैयार कर सकती हैं। धुरंधर-2 की सबसे बड़ी बात यह है कि इसने देशवासियों को उन नायकों से मुलाकात कराई जिन्होंने अपने उस नाम तक का बलिदान कर दिया, जिसे अमर रखने के लिए लोग क्या नहीं कर गुजरते। ऐसे में यह सवाल बेमानी हो जाता है कि असल जिंदगी में धुरंधर का नाम क्या था। विश्लेषक बताते है कि वे एक से ज्यादा किरदार भी हो सकते हैं।
जासूसी की गुप्त दुनिया से संबंध रखने के कारण ऐसा संभव है कई तथ्य स्क्रिप्ट राइटर के पास उपलब्ध न हो पाए हों और उसने उसकी पूर्ति कल्पना से की हो। पर यह बात तो ऐतिहासिक पात्रों पर आधारित बायोपिक्स पर भी लागू होती हैं जहां एक सदी से ऊपर से यथार्थ के साथ कल्पनाओं का सहारा लिया जा रहा है। एक और प्रश्न हैं निर्माता निर्देशक की विचारधारा का, जिसके आधार पर एक वर्ग की ओर से फिल्म को प्रोपेगेंडा का लेबल चिपका कर इसे खारिज करने का प्रयास किया जा रहा है। पर ऐसी कोशिशों के समय जासूसी पर ही आधारित राजी जैसी फिल्मों को भी आंक लेना चाहिए, जिसने 1971 के युद्ध के दौरान भी पाकिस्तानी फौज को मानवीय और संवेदनशील साबित करने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ी थी। वास्तव में सिनेकारों के राजनीतिक रुझान होते हैं, इस तथ्य से कोई इनकार नहीं कर सकता पर इस आड़ में भारतीय जासूसों के शानदार कारनामों से आंख बंद कर लेना कहां की समझदारी है?