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उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों की कमी क्यों?

विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति हमेशा से राजनीतिक प्रभाव का क्षेत्र रही है। आरोप लगते रहे हैं कि सरकारें अपने अनुकूल विचारधारा वाले लोगों को ही उच्च पदों पर देखना चाहती हैं। कई संस्थानों में वर्षों से 'तदर्थ' आधार पर शिक्षक कार्यरत हैं।

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जयपुर

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Opinion Desk

Mar 25, 2026

प्रो. अशोक कुमार, पूर्व कुलपति (गोरखपुर विश्वविद्यालय)

भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों के रिक्त पदों का मुद्दा एक गंभीर राष्ट्रीय संकट बन चुका है। भारत के विभिन्न उच्च शिक्षण संस्थानों में रिक्तियों के आंकड़े न केवल चौंकाने वाले हैं, बल्कि यह शिक्षा की गुणवत्ता पर लगे प्रश्नचिह्न को भी दर्शाते हैं। भारत के राज्य एवं केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के पदों की भारी कमी है। प्रतिष्ठित संस्थानों में भी 30 प्रतिशत से 40 प्रतिशत तक पद खाली पड़े हैं। विश्वविद्यालयों में हजारों 'एड-हॉक' शिक्षक पिछले 10-15 वर्षों से काम कर रहे हैं, जिनकी नियमित नियुक्ति की प्रक्रिया राजनीतिक और कानूनी दांवपेंचों में फंसी रहती है। यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं है, बल्कि इसके पीछे जटिल कानूनी, आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक कारण छिपे हैं।

शिक्षण पदों पर नियुक्तियों में देरी का सबसे प्राथमिक तकनीकी कारण 'रोस्टर प्रणालीÓ रहा है। पिछले कुछ वर्षों में 'विभाग' बनाम 'विश्वविद्यालय' को आरक्षण की इकाई मानने पर लंबा कानूनी विवाद चला। इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले के बाद, यूजीसी ने विभाग को इकाई मानकर भर्तियां शुरू करने का निर्देश दिया था। इसका व्यापक विरोध हुआ क्योंकि इससे छोटे विभागों में आरक्षित वर्ग (अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/अन्य पिछड़ा वर्ग) के लिए पद सृजित होना लगभग असंभव हो गया था। भारी विरोध और अदालती कार्यवाही के बाद सरकार को अध्यादेश और फिर 'केंद्रीय विश्वविद्यालय (शिक्षक कैडर में आरक्षण) अधिनियम, 2019' लाना पड़ा, जिसने विश्वविद्यालय को एक इकाई के रूप में बहाल किया।

इस पूरी प्रक्रिया में लगभग 3-4 साल तक नियुक्तियां पूरी तरह ठप रहीं। सरकार के लिए नियमित नियुक्तियां करना एक बड़ा वित्तीय दायित्व होता है। एक नियमित प्रोफेसर की नियुक्ति का अर्थ है दशकों तक वेतन, भत्ते और सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन (पुरानी या नई योजना के तहत) का भुगतान। वित्तीय घाटे को कम करने के दबाव में सरकारें अक्सर 'राजस्व व्यय' को नियंत्रित करने की कोशिश करती हैं। नियमित भर्ती के बजाय, 'अतिथि शिक्षक' या 'तदर्थ' शिक्षकों से काम चलाना आर्थिक रूप से सस्ता पड़ता है। इन्हें न्यूनतम मानदेय दिया जाता है और कोई सामाजिक सुरक्षा लाभ (जैसे स्वास्थ्य बीमा या ग्रेच्युटी) नहीं मिलता। कई विश्वविद्यालयों में अब ऐसे कोर्स (सेल्फ-फाइनेंसिंग कोर्स) शुरू किए गए हैं जो अपने शिक्षकों का वेतन स्वयं छात्रों की फीस से निकालते हैं। इन पाठ्यक्रमों में नियमित पदों के सृजन को सरकार हतोत्साहित करती है।

विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति हमेशा से राजनीतिक प्रभाव का क्षेत्र रही है। आरोप लगते रहे हैं कि सरकारें अपने अनुकूल विचारधारा वाले लोगों को ही उच्च पदों पर देखना चाहती हैं। जब तक 'सही' उम्मीदवार नहीं मिलते, तब तक चयन समितियों के गठन या साक्षात्कारों को टाल दिया जाता है। कई संस्थानों में वर्षों से 'तदर्थ' आधार पर शिक्षक कार्यरत हैं। ये शिक्षक अक्सर स्थानीय राजनीतिक प्रभाव या आंतरिक संपर्कों के माध्यम से नियुक्त होते हैं। जब नियमित भर्ती का विज्ञापन निकलता है, तो ये समूह दबाव बनाते हैं कि उन्हें बिना किसी नई परीक्षा के नियमित किया जाए, जिससे पूरी भर्ती प्रक्रिया कानूनी विवादों में फंस जाती है। कॉलेजों की प्रबंधन समितियों में राजनीतिक नियुक्तियां होने के कारण अक्सर नियुक्तियों में पारदर्शिता का अभाव रहता है, जिससे योग्य उम्मीदवार चयन प्रक्रिया से बाहर हो जाते हैं। आइआइटी और मेडिकल कॉलेजों में रिक्तियों के कारण थोड़े भिन्न हैं।

आइआइटी जैसे संस्थानों में केवल पीएचडी होना पर्याप्त नहीं है। वहां उच्च गुणवत्ता वाले शोध पत्र और अंतरराष्ट्रीय शिक्षण अनुभव की मांग होती है। कई बार पर्याप्त संख्या में आवेदन आने के बावजूद चयन समिति 'उपयुक्त उम्मीदवार नहीं मिला' कहकर पद खाली छोड़ देती है। भारत के सर्वश्रेष्ठ मस्तिष्क अक्सर विदेशों (जैसे अमरीका या यूरोप) के विश्वविद्यालयों या निजी क्षेत्र की ओर रुख करते हैं, जहां उन्हें न केवल बेहतर वेतन मिलता है, बल्कि शोध के लिए बेहतर स्वायत्तता और संसाधन भी मिलते हैं। भारत में मेडिकल कॉलेजों की संख्या तो बढ़ी है, लेकिन शिक्षकों की भारी कमी है। एक योग्य विशेषज्ञ डॉक्टर के लिए सरकारी मेडिकल कॉलेज में पढ़ाने की तुलना में निजी अस्पताल में प्रैक्टिस करना 5 से 10 गुना अधिक लाभदायक होता है। सरकारी मेडिकल कॉलेजों में शिक्षकों को दूरदराज के इलाकों में स्थानांतरित कर दिया जाता है, जहां बुनियादी सुविधाओं की कमी होती है। इस कारण कई विशेषज्ञ शिक्षक इस्तीफा दे देते हैं या पद स्वीकार ही नहीं करते।

अक्सर भर्ती प्रक्रिया शुरू तो होती है, लेकिन उसे तार्किक अंत तक नहीं पहुंचाया जाता। विज्ञापन की शर्तों, आयु सीमा या अनुभव के मानदंडों को लेकर कोई न कोई पक्ष कोर्ट में याचिका दायर कर देता है। कुलपतियों और बाहरी विशेषज्ञों का समय न मिल पाना भी साक्षात्कार में देरी का एक प्रमुख कारण बनता है। शिक्षकों की इस कमी का सीधा असर देश के भविष्य पर पड़ रहा है। एक शिक्षक पर 100-150 छात्रों का बोझ होने से व्यक्तिगत ध्यान देना असंभव हो जाता है। जब शिक्षक का पूरा समय केवल क्लास लेने और प्रशासनिक काम में जाएगा, तो वह नया शोध नहीं कर पाएगा। यद्यपि हाल ही में 'मिशन मोड' भर्ती के तहत कुछ सुधार हुआ है, लेकिन जब तक पारदर्शी चयन प्रक्रिया, समयबद्ध भर्ती कैलेंडर और शिक्षकों के लिए आकर्षक कॅरियर ग्राफ नहीं बनाया जाएगा, तब तक यह समस्या बनी रहेगी। सरकार को 'न्यूनतम लागत' के बजाय 'उच्चतम गुणवत्ता' के सिद्धांत पर निवेश करने की आवश्यकता है।