ओपिनियन

जिन्होंने सेवा को बनाया मिशन

गोकुल प्रसाद नि:स्वार्थ सेवाभावी थे। उन्हें जरूरतमंदों की मदद करने में आनंद महसूस होता था। ऐसे सेवाभावी व्यक्तित्व को भुलाना आसान नहीं होगा।
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Oct 31, 2018
gokul prasad sharma
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ज्ञानप्रकाश, पिलानिया टिप्पणीकार
सेवा और सादगी की प्रतिमूर्ति गोकुल प्रसाद शर्मा उन लोगों में थे जिनके लिए बापू का प्रिय भजन 'वैष्णव जन तो तेने कहिए जे पीड़ परायी...' मुफीद बैठता है। सचमुच वे गरीब और असहायों की निस्वार्थ सेवा में जुटे रहने वाले मनीषी थे। मुम्बई का बॉम्बे हॉस्पिटल तो जैसे उनके नाम का पर्याय ही हो गया था। लंबे समय तक राजस्थान में प्रशासनिक पदों पर रहे गोकुल प्रसाद शर्मा को बाद में बॉम्बे हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर के प्रशासक का दायित्व सौंपा गया, जो उन्होंने पूरी निष्ठा व सेवाभाव से निभाया।

देश के मूर्धन्य पत्रकार पं. झाबरमल्ल शर्मा के पुत्र गोकुल प्रसाद शर्मा ने कभी अपने पिता के नाम का इस्तेमाल नहीं किया। गत 26 अक्टूबर को उन्होंने अपनी नश्वर देह त्यागी। वे 10 नवंबर 1914 को जन्मे थे। शतायु से अधिक का उनका जीवन सेवा कार्यों की मिसाल है, जिन्हें शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता।

विधि की शिक्षा के बाद थोड़े समय के लिए उन्होंने वकालत भी की। राजस्थान प्रशासनिक सेवा के अधिकारी के रूप में कई अहम पदों पर कार्यरत रहे। जहां भी रहे, वहां जरूरतमंदों की सेवा को प्राथमिकता दी। प्रतिष्ठित महाराणा मेवाड़ पुरस्कार समेत कई अन्य पुरस्कार भी उन्हें मिले। लेकिन उनके सेवा कार्यों के आगे ये पुरस्कार गौण थे। उनका मुझ पर छोटे भाई सा स्नेह था। या यों कहूं कि उन्होंने मुझे उंगली पकड़कर चलना सिखाया तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

मेरा उनसे पहला परिचय वर्ष 1959 में हुआ, जब वे नाथद्वारा मंदिर बोर्ड में मुख्य कार्यकारी अधिकारी थे और मैं चित्तौडग़ढ़ पुलिस अधीक्षक के रूप में कार्यरत था। नाथद्वारा मंदिर के विकास के लिए भी उन्होंने हरसंभव प्रयास किए। नाथद्वारा में जिस बंगले में वे रहते थे वहां बगीची थी जिसमें संतरे के पेड़ लगे थे। एक संतरा पक गया तो उन्होंने सेवादार को इसे तोड़कर श्रीनाथजी को अर्पण करने के लिए कहा। मैं मौजूद था, पूछा द्ग इसे हम क्यों नहीं खा सकते? गोकुल प्रसाद जी का जवाब था द्ग यह श्रीनाथ जी की संपत्ति है इसलिए उन्हें ही अर्पित होनी चाहिए, हम तो रखवाले मात्र हैं।

बॉम्बे हॉस्पिटल में गरीबों के लिए तो जैसे उनके दरवाजे सदा खुले रहते थे। एक बात यह भी थी कि अस्पताल में उनका कहा पत्थर की लकीर होता था। बॉम्बे हॉस्पिटल के माध्यम से शायद यह सेवा कार्य उनके हाथों से होना ही था, इसीलिए तो किसी अस्पताल में प्रबंधकीय दायित्व की इतनी लंबी यात्रा जीवन के आखिरी समय तक जारी रही।

देखा जाए तो गोकुल प्रसाद नि:स्वार्थ सेवाभावी थे। उन्हें जरूरतमंदों की मदद करने में आनंद महसूस होता था। ऐसे सेवाभावी व्यक्तित्व को भुलाना आसान नहीं होगा।

(राजस्थान के पूर्व पुलिस महानिदेशक। फिर राज्यसभा सदस्य भी रहे।)

Updated on:
31 Oct 2018 07:49 pm
Published on:
31 Oct 2018 07:49 pm