
india and japan relation
स्वर्ण सिंह, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे के साथ शिखर सम्मेलन हाल ही अखबारों में सुर्खियों और विश्लेषणों का विषय बना रहा। इस मुलाकात में सबसे ज्यादा उभरकर सामने आने वाली बात दो नेताओं की व्यक्तिगत दोस्ती और गर्मजोशी रही। हाल के वर्षों में अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में उभरती हुई बड़ी शक्तियों के दबंग नेताओं का परस्पर सौहार्द्रपूर्ण प्रदर्शन महत्त्वपूर्ण होता जा रहा है। इसके चलते देखा जाता है कि मेजबान और मेहमान नेता न केवल अधिकतम समय साथ बिताते हैं बल्कि औपचारिकताओं से परे पारस्परिक विश्वास को सुदृढ़ करने की ओर केंद्रित नजर आते हैं।
विशेषज्ञ इसको अक्सर 'घनिष्ठता का प्रदर्शन' कहते हैं और इसकी संरचनात्मक वास्तविकता को नकार देते हैं। वो चाहे सितंबर 2017 में शिंजो आबे की भारत यात्रा के दौरान अहमदाबाद में उनका मोदी के साथ रोड शो हो या इस रविवार को प्रधानमंत्री शिंजो आबे की टोक्यो से 110 किलोमीटर पश्चिम में यामानाशी में स्थित अपने हॉलिडे होम में जापान के बड़े नेताओं के साथ दोपहर व रात्रिभोज हो, कुछ विश्लेषक इसको स्वप्रचार के साधन के तौर पर सीमित कर देते हैं।
संभवत: आज के तेजी से बदलते हुए भू-सामरिक परिप्रेक्ष्य में बड़े नेताओं की यह रणनीति और सामरिक तालमेल, अंतरराष्ट्रीय संरचना में बदलाव के लिए बड़े फैसलों की नींव रखने जैसा है। अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की 'अमरीका फस्र्ट' नीति के चलते वे न केवल कई अंतरराष्ट्रीय संस्थानों और व्यवस्थाओं से अपने आप को अलग करते जा रहे हैं, बल्कि दूसरे देशों से आयातित वस्तुओं पर अंधाधुंध एकतरफा व्यापार शुल्क बढ़ाकर व्यापार युद्ध थोपने में लगे हुए हैं। इसके चलते भारत व जापान जैसी अर्थव्यवस्थाओं की जिम्मेदारी आपसी संबंधों के अलावा क्षेत्र और विश्व की आर्थिक व्यवस्था और नियमबद्ध शासन बनाए रखने को लेकर और भी बढ़ जाती है। इसके लिए यह और भी जरूरी हो जाता है कि उनके व्यापारिक संबंध और प्रगाढ़ हों।
जापान व भारत, एशिया की दूसरी और तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं। लेकिन इनका आपसी व्यापार न केवल बहुत सीमित, बल्कि पिछले कुछ वर्षों में कम होते जाना चिंता का विषय रहा है। दोनों देशों के बीच आपसी व्यापार वर्ष 2014 में 16.8 अरब डॉलर से घटकर पिछले साल केवल 13.5 अरब डॉलर हो गया था। इसमें भारत का निर्यात वर्ष 2014 में 6.8 अरब डॉलर के स्तर से घटकर पिछले वर्ष केवल 3.8 अरब डॉलर रह गया। चीन के साथ जापान के 300 अरब डॉलर के व्यापार की तुलना में ये आंकड़े इस बात का सबब हैं कि साझा व्यापार के लिहाज से अभी पर्याप्त गुंजाइश है।
दोनों देशों के बीच व्यापार में कमी के कई कारण भी हैं। सबसे पहले यह कि जापान की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर भी पिछले एक दशक में काफी कमजोर रही। वर्ष 2009 में तो इसके 5 फीसदी तक सिकुडऩे से इसके व्यापार और निवेश पर सीधा असर पड़ा था। इसके अलावा भारतीय व्यापारी जापान में उपभोक्ता वस्तुओं और सेवा व्यापार के कड़े मानकों और विनियमों के सामने टिक नहीं पाते हैं। दूसरी ओर, वर्ष 2011 में भारत-जापान आर्थिक भागीदारी संधि के तहत रोजमर्रा की परेशानियों को दूर करने के उपाय सुझाए गए थे। उदाहरण के तौर पर, सेवा क्षेत्र में और खासकर आईटी क्षेत्र में शीघ्र वीजा देने की सुगमता का प्रस्ताव भी था। जबकि शिखर सम्मेलनों में बड़े नेताओं के बीच बड़ा अच्छा तालमेल नजर आता है, व्यापारिक संबंधों में रोजमर्रा की अड़चनों का कायम रहना आपसी व्यापार के बढऩे में बड़ी बाधा बनता है। भारत और जापान के मामले में निवेश और तकनीक हस्तांतरण पर ध्यान केंद्रित रहना भी आपसी व्यापार के कम होते जाने का एक कारण रहा है।
निवेश की दृष्टि से देखें तो चाहे मेक इन इंडिया हो, स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया या फिर स्मार्ट सिटीज की योजना, जापान आज भारत में अग्रिम श्रेणी का भागीदार बन चुका है। दिल्ली मेट्रो के बाद, दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर और अब अहमदाबाद-मुंबई बुलेट ट्रेन जापान की भारत में बड़ी परियोजनाएं हैं। इसके अलावा पूर्वोत्तर राज्यों से जापान का पुराना जुड़ाव रहा है। दूसरे विश्वयुद्ध में 70 हजार से भी ज्यादा जापानी सैनिक कोहिमा और इम्फाल की लड़ाइयों में मारे गए थे। अब जापान, वहां भी 'नॉर्थ ईस्ट रोड नेटवर्क कनेक्टिविटी' प्रोजेक्ट में बड़ा हिस्सेदार है। आज 1309 जापानी कंपनियां भारत में कार्यरत हैं, जिसके चलते भारत में जापान का कुल निवेश वर्ष 2007 के 850 लाख डॉलर से बढ़कर 50 अरब डॉलर से भी ज्यादा हो गया है।
इसमें दो राय नहीं, दोनों देशों के बीच साझा व्यापार पर छाई मंदी को दूर करना आवश्यक है, लेकिन यह भी झुठलाया नहीं जा सकता कि जापान का तकनीक हस्तांतरण व निवेश भारत के आधारभूत परिवर्तन में सराहनीय योगदान दे रहा है।
(जेएनयू, नई दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय राजनीति पढ़ाते हैं।)
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