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पत्रिका में प्रकाशित अग्रलेख – ज्ञान के साथ विज्ञान भी पढ़ाएं

हमारा जीवन दो स्तरों पर चलता है। एक शरीर का स्थूल स्तर, दूसरा आत्मा का धरातल। स्थूल प्रकाश रूप, क्षणिक जीवन है। सूक्ष्म अंधकार का शाश्वत साम्राज्य।

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editor-in-chief of Patrika Group Gulab Kothari

पत्रिका समूह के प्रधान सम्पादक गुलाब कोठारी (फोटो: पत्रिका)

हमारा जीवन दो स्तरों पर चलता है। एक शरीर का स्थूल स्तर, दूसरा आत्मा का धरातल। स्थूल प्रकाश रूप, क्षणिक जीवन है। सूक्ष्म अंधकार का शाश्वत साम्राज्य। अंधकार में हम भयभीत रहते हैं और प्रकाश में सहज रूप से। इस कारण अपने सूक्ष्म और मूल स्वरूप से सदा अनभिज्ञ ही रहते हैं। इतना ही नहीं, हमारी दृष्टि भी प्रत्येक विषय को स्थूल दृष्टि से ही देख पाती है।


प्रकृति की प्रत्येक प्राणवान वस्तु दो स्तरों पर ही जीती है। प्रकृति में कोई निष्प्राण वस्तु है ही नहीं। पत्थर में भी प्राण होते हैं। अहिल्या का उदाहरण ही इसका प्रमाण है। वृक्ष-लताओं में भी प्राण हैं। जहां भी प्राण है, वहां शरीर और प्राण दो स्तर स्वत: ही बन जाते हैं। वैसे प्राण मन से जुड़े रहते हैं। अत: मन-प्राण-वाक् साथ होते हैं। अग्नि का प्राण दाहकता है,ज्वाला शरीर है।


प्रत्येक वस्तु वाक् है-स्थूल वाक् , सूक्ष्म वाक्। स्थूल वाक् अर्थ वाक् है, लक्ष्मी है। सूक्ष्म वाक् सरस्वती है- शब्द-प्राण वाक् है। स्वयं शब्द एक शरीर भी है, प्राणभी है। वर्णमाला के अक्षर जो लिखे जाते हैं-शरीर हैं,तथा जो बोले जाते हैं-प्राण हैं। स्थूल दिखाई देता है, सूक्ष्म अदृश्य रहता है,आत्मा की तरह। ध्वनि शब्द का आत्मा है। बोलने वाले के आत्मा से भी जुड़ी है और सुनने वाले के आत्मा से भी।


हमारी शिक्षा शरीर से जुड़ी है। हम वर्णमाला सीख रहे हैं, लेखन सीख रहे हैं, व्याकरण सीख रहे हैं, साहित्य लिखा जा रहा किन्तु सारा कुछ स्थूल प्रपंच है। किसको ध्यान रहता है कि हर अक्षर के साथ उसकी ध्वनि भी जुड़ी रहती है। वर्ण मेरे देखने के काम आता है, ध्वनि सुनने के। ध्वनि आकाश का गुण है, आत्मा तक पहुंच जाता है, ऊर्जा रूप है। आत्मा भी प्राण ऊर्जा ही है। वहां पदार्थ नहीं पहुंच सकता।


हम मंत्र-जप करते हैं। बोलने में वैखरी वाणी का प्रयोग होता है। बाहर निकलती है। मध्यम स्वर-गुनगुनाने की ध्वनि मध्यमा है-उपांशु जप है-कान तक पहुंचता है। मानस जप या पश्यन्ति वाक् भीतर ही भ्रमण करती है। ध्वनि नहीं होती। यह क्रिया सूक्ष्म शरीर से जुड़ती है। तब इसका प्रभाव भीतर होता है। शरीर की ध्वनि शरीर तक, विचारों के स्पन्दन मन तक, बुद्धि के तर्क बुद्धि को पहुंचते है।


आज शिक्षा में वेद,उपनिषद्, गीता आदि ग्रन्थ पढ़ाए जाते हैं, रटाए जाते हैं। छात्र को कोई लाभ आत्मोत्थान में नहीं मिलता। आत्मा तक कुछ पहुंच ही नहीं पाता। एक मां की लोरियां गर्भस्थ शिशु को अभिमन्यु बना सकती हैं। छात्र का साहित्य से कोई सम्बन्ध नहीं बन पाता। गीता को कृष्ण-अर्जुन संवाद की भांति पढ़ा। परीक्षा दी, पास हो गया। गीता जीवन में जुड़ी ही नहीं। छात्र यह कार्य कर नहीं पाता। उसे अर्जुन बनकर गीता को मौन रहकर सुनना चाहिए। सूक्ष्म शरीर से सम्बन्ध बने।


जब आज आचार्य भी स्वयं को ‘प्रोफेसर’ कहलवाना चाहते हैं तब वे भाषा का क्या सम्मान करेंगे? शिक्षा का, शास्त्रों तक का- प्रचार मृतक(जड़) देह रूपी शब्दों से होता है। ज्ञान का प्राणवान पक्ष कभी मन को छू भी नहीं सकेगा। हृदय तक, जहां आत्मा का द्वार खुलता है, कैसे पहुंचें! आत्मा को ज्ञान चाहिए, कोरा साहित्य नहीं चाहिए। मनन और निदिध्यासन इसका मार्ग है। ज्ञान और विज्ञान साथ रहते हैं। कृष्ण ने गीता को ज्ञान-विज्ञान (कर्म) का शास्त्र कहा है।

‘ज्ञानं तेऽहं सविज्ञान मिदं…’
शिक्षा में सारा जोर दर्शन पर रहता है, कभी-कभी मनोविज्ञान बीच में आ जाता है। हमारे प्राचीन ग्रन्थ शुद्ध विज्ञान के ग्रन्थ है। देश में ‘विज्ञान’ शब्द तो है किन्तु ग्रन्थों में कहीं विज्ञान नहीं है। इसे समझने के लिए व्यक्ति को सूक्ष्म में उतरना पड़ेगा। आज सुविधाभोगी वातावरण में कौन भीतर जाकर ‘स्पन्दनों’ का अध्ययन करे। आत्मा को बाहर भी नहीं ला सकते।


जयपुर शहर ने वेद विज्ञान के क्षेत्र में एक विशेष स्थान बनाया था जो अन्यत्र नहीं बन पाया। पं.मधुसूदन ओझा, पं.गिरधर चतुर्वेदी, पं.मोतीलाल शास्त्री जैसे मनीषी हुए, प्रभूत साहित्य की रचना भी की, प्रचार भी कालानुसार हुआ, किन्तु आज न तो किसी परिवार में कोई वंशज इस ज्ञान से जुड़ा है, न ही किसी के विज्ञानपरक साहित्य को कहीं शिक्षा में स्थान ही मिला। जो हाल महर्षि अरविन्द के कृतत्व का हुआ, वही हाल यहां हुआ। कारण: नीतियां बनाने वाले दर्शन के आगे स्वयं नहीं जानते। शिक्षाधिकारी अंग्रेजी-दां होते है। कौन समझे, कौन पढ़ाए!

भारत ज्ञान में पुन: विश्वगुरु बनने के तो सपने तो देख रहा है, किन्तु दर्शन के बूते पर तो नहीं। दर्शन, विज्ञान की भांति सर्वमान्य नहीं हो सकता। विज्ञान समय के साथ बदलता भी नहीं है। यह संस्कृति का अंग होता है, सभ्यता का नहीं। देश की पहली अनिवार्यता यह है कि पुरातन ग्रन्थों को विज्ञान के रूप में पढ़ाया जाए, ताकि नई पीढ़ी इसे स्वीकार कर सके। दर्शन और सायण भाष्य का युग समाप्त हो गया। आज देश में गीता की इतनी टीकाएं उपलब्ध हैं, किन्तु विज्ञान भाष्य बस्तों में बंद है। विज्ञान-विशिष्ट ज्ञान ही विदेशी ज्ञान का मद चूर-चूर कर सकता है।

संस्कृत मातृभाषा नहीं है। इसमें अर्थ-ब्रह्म और शब्द-ब्रह्म दोनों ही सृष्टि सूत्रों के सिद्धान्त उपलब्ध हैं। अर्थ-ब्रह्म (लक्ष्मी) से सम्पूर्ण अर्थ सृष्टि (अव्यय अक्षर रूप) तथा शब्द-ब्रह्म (सरस्वती) से सम्पूर्ण प्राण सृष्टि (नाद) के सिद्धान्तों को समझा जा सकता है। चूंकि दोनों साथ ही रहते हैं, एक-दूसरे में परिवर्तित होते रहते हैं, तथा नष्ट नहीं होते, इसलिए एक के साथ दूसरे को समझा जा सकता है। वर्णमाला अर्थ-सृष्टि का सम्पूर्ण मानचित्र है, नियमों में एकरूपता है, अत: सम्पूर्ण सृष्टि विवर्त को ‘संस्कृत’ के माध्यम से समझा जा सकता है।

gulabkothari@epatrika.com